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=== कला की ऊँची-नीची डगर === सन् 1952 में नायक के रूप में राज कपूर की चार फिल्में प्रदर्शित हुईं-- '[[अंबर (1952 फ़िल्म)|अम्बर]]', '[[अनहोनी (1952 फ़िल्म)|अनहोनी]]', '[[बेवफ़ा (1952 फ़िल्म)|बेवफ़ा]]' और '[[आशियाना (1952 फ़िल्म)|आशियाना]]'। इन चारों में ही उनकी नायिका [[नरगिस]] थीं। इतना ही नहीं सन् '51से '56 के बीच राज कपूर की जितनी भी फिल्में आयीं, उनमें नायिका नरगिस ही थीं। यह भी अपने-आप में एक रिकॉर्ड है। इस वर्ष की जयन्त देसाई निर्देशित 'अम्बर' सबसे सफल फिल्म थी और [[ख़्वाजा अहमद अब्बास]] निर्देशित 'अनहोनी' सबसे असफल। एम॰एल॰ आनन्द के निर्देशन में बनी 'बेवफा' इस वर्ष की एक महत्त्वपूर्ण फिल्म थी, जिसमें राज-नरगिस के साथ [[अशोक कुमार (राजनीतिज्ञ)|अशोक कुमार]] भी थे। अशोक कुमार ने बेवफा में एक भावुक चित्रकार की भूमिका में मर्मस्पर्शी अभिनय किया था। सन् 1953 राज कपूर के लिए दुर्भाग्यपूर्ण वर्ष साबित हुआ। इस वर्ष उनकी आर॰के॰ फिल्म्स की तीन फिल्में रिलीज हुईं-- '[[आह (1953 फ़िल्म)|आह]]' '[[धुन (1953 फ़िल्म)|धुन]]' और '[[पापी (1953 फ़िल्म)|पापी]]'। ये तीनों ही फिल्में असफल हो गयीं। हालाँकि इनमें से 'आह' की असफलता एक आश्चर्यजनक बात थी। इसमें राज कपूर ने टीबी के मरीज के रूप में एक निराश प्रेमी की भूमिका निभायी थी, जिसे दर्शक स्वीकार नहीं कर पाये। सुप्रसिद्ध फिल्म समालोचक प्रहलाद अग्रवाल के अनुसार :{{quote|"अपने दौर की सभी विशेषताओं को लिए हुई थी 'आह'। इसका संगीत तो बेहद लोकप्रिय हुआ था। उसकी गुरुता और मोहनी-शक्ति 'बरसात' और 'आवारा' से उन्नीस नहीं, बीस थी। 'राजा की आएगी बारात, रंगीली होगी रात, मगन मैं नाचूँगी', 'आजा रे अब मेरा दिल पुकारा' और 'जाने न नज़र पहचाने जिगर' आदि गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे।... फिर भी 'आह' इसलिए असफल हो गयी, क्योंकि 'आवारा' ने राज कपूर की इमेज एक बिल्कुल अलग किस्म के मस्तमौला, फक्कड़ नौजवान की बना दी थी। उस फ्रेम में राज कपूर का यह निराशावादी व्यक्तित्व कहीं नहीं अँटता था।"<ref>{{cite book |last1=प्रहलाद |first1=अग्रवाल |title=राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना |date=2007 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |isbn=978-81-267-1405-6 |page=55 |edition=प्रथम (परिवर्धित)}}</ref>}} सन् 1953 की उक्त तीनों फिल्मों की असफलता से राज कपूर की लोकप्रियता को गहरा धक्का लगा। राज कपूर के पास उस समय कोई फिल्म नहीं थी। लेकिन वे हार मानने वाले व्यक्तित्व नहीं थे। 'आह' की असफलता के तुरंत बाद आर॰के॰ फिल्म्स के अंतर्गत एक ऐसी फिल्म बनायी गयी जिसने पूरे फिल्म उद्योग को चौंका दिया। यह फिल्म थी '[[बूट पॉलिश (1954 फ़िल्म)|बूट पॉलिश]]', जिसमें राज कपूर स्वयं नायक भी नहीं थे और नरगिस भी नहीं थी। इसमें थे दो बाल कलाकार-- बेबी नाज और रतन कुमार और प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता अब्राहम डेविड। बाल फिल्मों की सफलता हमेशा ही संदिग्ध रही है। परन्तु राज कपूर के महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व के अनुरूप 'बूट पॉलिश' एक ऐसा करिश्मा साबित हुई जिसने उनकी प्रतिष्ठा पर लगे धक्के के एहसास तक को नष्ट कर दिया। इसकी रजत-जयंती सफलता ने पूरे फिल्म उद्योग को अचंभे में डाल दिया।
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