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== वेदों का महत्व == प्राचीन काल से भारत में वेदों के अध्ययन और व्याख्या की परम्परा रही है। वैदिक सनातन वर्णाश्रम (हिन्दू) धर्म के अनुसार [[वैदिक सभ्यता|वैदिक काल]] में [[ब्रह्मा]] से लेकर [[वेदव्यास]] तथा [[जैमिनि]] तक के [[ऋषि]]-[[मुनि]]यों और दार्शनिकों ने [[शब्द]], [[प्रमाण]] के रूप में इन्हीं को माना है और इनके आधार पर अपने ग्रन्थों का निर्माण भी किया है। पराशर, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, व्यास, पाणिनी आदि को प्राचीन काल के वेदवेत्ता कहते हैं। वेदों के विदित होने यानि चार ऋषियों के ध्यान में आने के बाद इनकी व्याख्या करने की परम्परा रही है <ref>[[शतपथ ब्राह्मण]] के अनुसार - '''अग्नेर्वाऋग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात् सामवेदः'', यानि अग्नि ऋषि से ऋक्, वायु ऋषि से यजुस् और सूर्य ऋषि से सामवेद का ज्ञान मिला। अंगिरस ऋषि को अथर्ववेद का ज्ञान मिला। इससे [[ब्रह्मा]] जैसे ऋषियोंने चारो वेदौंकी शिक्षाको स्वयं साक्षात्कार कर अन्य विद्वानों में फैलाया। श्रुतिपरंपरा में वेदग्रहणकालमें ब्रह्मा के चतुर्मुख होने का वर्णन आया है </ref>। अतः फलस्वरूप एक ही वेद का स्वरुप भी मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् के रुप में चार ही माना गया है। इतिहास (महाभारत), पुराण आदि महान् ग्रन्थ वेदों का व्याख्यान के स्वरूप में रचे गए। प्राचीन काल और मध्ययुग में शास्त्रार्थ इसी व्याख्या और अर्थांतर के कारण हुए हैं। मुख्य विषय - देव, अग्नि, रूद्र, विष्णु, मरुत, सरस्वती इत्यादि जैसे शब्दों को लेकर हुए। वेदवेत्ता [[महर्षि]] [[दयानन्द सरस्वती|स्वामी दयानन्द सरस्वती]] के विचार में ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान वेदों के विषय हैं। [[जीव]], [[ईश्वर]], [[प्रकृति]] इन तीन अनादि नित्य सत्ताओं का निज स्वरूप का ज्ञान केवल वेद से ही उपलब्ध होता है। वेद में मूर्ति पूजा को अमान्य कहा गया है [[कणाद]] ने "तद्वचनादाम्नायस्य प्राणाण्यम्"<ref> वैशेषिक दर्शन, प्रथम अध्याय, प्रथम माह्नक, तृतीयश्लोक </ref> और "बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे" कहकर वेद को दर्शन और विज्ञान का भी स्रोत माना है। हिन्दू धर्म अनुसार सबसे प्राचीन नियम विधाता [[महर्षि]] [[मनु]] ने कहा ''वेदोऽखिलो धर्ममूलम्'' - खिलरहित वेद अर्थात् समग्र [[संहिता]], [[ब्राह्मण]], [[आरण्यक]] और [[उपनिषद्|उपनिषद]] के रूप में वेद ही [[धर्म]] व [[धर्मशास्त्र]] का मूल आधार है। न केवल धार्मिक किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से भी वेदों का असाधारण महत्त्व है। वैदिक युग के आर्यों की संस्कृति और सभ्यता को जानने का वेद ही तो एकमात्र साधन है। मानव-जाति और विशेषतः वैदिकों ने अपने शैशव में धर्म और समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान केवल वेदों से मिलता है। विश्व के वाङ्मय में इनको प्राचीनतम ग्रन्थ (पुस्तक) माना जाता है। <ref>ऋंगवेद संहिता प्रथम भाग में ख्याति प्राप्त प्रोफेसर [[मैक्स मूलर]] लिखते हैं (प्राक्कथन, पृष्ठ १०) कि वे इस बात से आश्वस्त हैं कि ये दुनिया की प्राचीनतम ग्रन्थ (पुस्तक) हैं। </ref> [[भारतीय भाषाओं]] का मूलस्वरूप निर्धारित करने में वैदिक भाषा अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई है। [[युनेस्को|यूनेस्को]] ने ७ नवम्बर २००३ को [[वेदपाठ]] को मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृतियाँ और मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया। === विवेचना === प्राचीन काल में, भारत में ही, इसकी विवेचना के अंतर के कारण कई मत बन गए थे। मध्ययुग में भी इसके [[भाष्य]] (व्याख्या) को लेकर कई शास्त्रार्थ हुए। वैदिक सनातन वर्णाश्रमी इसमें वर्णित चरित्रों ''देव'' को पूज्य और मूर्ति रूपक आराध्य समझते हैं जबकि [[दयानन्द सरस्वती]] सहित अन्य कईयों का मत है कि इनमें वर्णित चरित्र (जैसे ''अग्नि'', ''इंद्र'' आदि) एकमात्र ईश्वर के ही रूप और नाम हैं। इनके अनुसार ''देवता'' शब्द का अर्थ है - (उपकार) देने वाली वस्तुएँ, विद्वान लोग और सूक्त मंत्र (और नाम) न कि मूर्ति-पूजनीय आराध्य रूप।
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