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== उन्नीसवीं सदी == 19वीं सदी के प्रारंभ में इतालवी से साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। प्राचीन कृतियों का प्रकाशन बिब्लियोतेका दे" क्लास्सीची इतालियानी (1804-14) तथा इतालवी विचारधारा को समझने का प्रयास हो रहा था। इस कार्य का केंद्र मिलान था जो इटली के हर भाग के कवियों, लेखकों तथा विचारकों का कार्यकेंद्र था। माक्यावेल्ली, सारपी, वीको की विचारधारा का मंथन किया जा रहा था और साहित्यिक तथा राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र इटली की नींव डाली जा रही थी। इन विचारकों में फ्रांचेस्को लोमोनाको (1772-1810), विचेंसो कुओको (1770-1823), दोमेनीको रोमान्योसी (1761-1835) प्रमुख हैं। काव्यसमीक्षा के क्षेत्र में अभिनव प्राचीन (नेओक्लासिक) रुचि स्थापित की जा रही थी जिसमें आसन्न स्वच्छंदतावाद के बीज भी दिखते हैं। कविता के अतिरिक्त कलात्मक गद्य लिखने की परिपाटी का सूत्रपात आंतोनियो चेसारी (1760-1828) कर रहा था जिसने प्राचीन इतालवी साहित्य से शब्द छाँट छाँटकर अपनी कृति बेल्लेज्जे दी दाँते (दांते का सौंदर्य) रची, कूस्का के कोश का पुन: संपादन किया तथा इसी शैली में अनेक अन्य कृतियाँ लिखीं। विंचेंसो मोंती तथा उसके सहयोगियों ने और जूलियो पेरतीकारी (1779-1832) ने भी भाषाशैली को विशुद्ध रूप देने का प्रयास किया। शैलीकार के रूप में पिएतरो ज्योर्दानी (1774-1848) का स्थान ऊँचा है। उसकी शैली में ओज तथा राष्ट्रीय महानता की गूँज है। सारे जीवन वह गद्य का सरल तथा उत्कृष्ट रूप देने का प्रयास करता रहा। नेओक्लासिक पीढ़ी का प्रतिनिधि कवि विंचेंसो मोंती (1754-1828) हैं। मोंती की विचाधारा बदलती रही, पोप के यहाँ रहते हुए उसने बास्वील्लीयाना नामक कृति लिखी जिसमें नरेशवाद की ओर झुकाव है। मिलान में रहते हुए नेपोलियन की विजय से उत्साहित हो प्रोमेतेओ लिखी। मोंती कल्पना और श्रुतिमधुर शब्दों का कवि है। हृदयपक्ष गौण है। होमर की कृति इलियड का मोंती ने स्वतंत्र अनुवाद भी किया था। इस धारा के अन्य छोटे कवियों में चेसारे अरीची तथा फीलीपो पान्नी का उल्लेख किया जा सकता है। सारे यूरोप और विशेषकर इटली में साहित्यिक क्षेत्र में जब एक प्रकार की अनिश्चितता का वातावरण फैला था उस समय ऊगो फोस्कोलो (1778-1827) की प्रतिभा ने सभी महत्वपूर्ण और अच्छे पक्षों को ग्रहण करके भविष्य के लिए अच्छी परंपरा तैयार की। इतालवी काव्य को फोस्कोलो ने नवीन स्फूर्ति, नई गीतिकविता तथा कई नई दृष्टि प्रदान की। कवि, पत्रकार, लेखक सभी रूपों में फोस्कोलो ने अपनी छाप छोड़ी है उसने यूरोपीय स्वच्छंदतावाद की विशेषताओं को आत्मसात् किया तथा इतालवी सांस्कृतिक परंपरा से भी संबंध बनाए रखा। सॉनेट, ओड, सेपोल्क्री, ग्रात्जिए फ़ोस्कोलो की काव्यकृतियाँ हैं। इतालवी काव्यसाहित्य में सेपोल्क्री का नई भाषा, हृदय स्पर्श करने की शक्ति, व्यंजना, प्रस्तुत अप्रस्तुत का स्वाभाविक संबंध आदि अनेक दृष्टियों से ऊँचा स्थान है। गद्य रचनाओं में कथाकृतियाँ आर्तीस और लाउरा प्रसिद्ध हैं। स्वच्छंदतावाद (रोमांटिसिज्म) के सिद्वांतो का प्रवेश इटली में 19वीं सदी के दूसरे तीसरे दशकों में हुआ। इसका प्रधान केंद्र उत्तरी इटली, विशेष रूप से मिलान था। लुदोवोको दी ब्रेमे (1780-1820) वेरशेत, बोरसिएरी, मांजोनी, मात्सीनी के लेखों द्वारा स्वच्छंदतावाद का प्रारंभ हुआ। काफ्फे, कोंचिलियातोरे पत्रों में अनेक लेख इस धारा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए निकले। ज्यूसेफे मात्सीनी (1805-1862) सबसे अधिक इस धारा से प्रभावित हुए। उनके व्यक्तित्व और विचारों का इटली के पुनरुत्थान आंदोलन पर तथा कला के क्षेत्र में भी बहुत प्रभाव पड़ा। उनके साहित्यिक लेखों-देल्ल" आमोर पात्रियों दी दांते (दांते का मातृभूमि प्रेम), दी उना लेत्तेरात्तूरा इउरोपा (एक यूरोपीय साहित्य पर)-से बहुत साहित्यिक प्रभावित हुए। इतिहास को राष्ट्रीय दृष्टि से लिखनेवालों ने भी इतालवी एकता की राष्ट्रीय भावना को जगाया। चेस्तरे वाल्दो जीनो काप्पोनी आदि इसी प्रकार के लेखक हैं। इतालवी साहित्य का नवीन दृष्टि से इतिहास लिखनेवाले फ्रांचेस्को दे सांक्टीस की कृति स्तोरिया देल्ला लेत्तेरातूरा इतालियाना महत्वपूर्ण है। साहित्य को समाज का प्रतिबिंब समझने का दृष्टिकोण तथा अनेक साहित्यिक समस्याओं को नए ढंग से परखने का नवीन प्रयास दे सांक्टीस की कृति में मिलता है। इसी प्रकार का दृष्टिकोण लूइजी सेतेंबरीनी की कृति लेत्सियोनी दी लेत्तेरात्तूरा इतालियाना में भी मिलता है। पुनरुत्थानयुग की कृतियों में सिल्वीको पेल्लीको (1789-1854) की कृति मिए प्रिज्योनी भी उल्लेखनीय है जिसमें उस युग की आशा निराशाओं का वर्णन है। मास्सीमो दाजेल्यो के संस्मरण इ मिएई रिकोर्दी भी रोचक हैं। स्वच्छंदतावादी धारा में अनेक भावुकताप्रधान गद्य-पद्य-कृतियाँ लिखी गईं। इन साधारण कवियों में अलेआरदो आलेआरदी (1812-1878) की कृतियाँ मोंते चीरचेल्लो, ले प्रीमे स्तोरिए तथा ऐतिहासिक उपन्यासों में तोमास्सो ग्रोसी का मार्को वीस्कोंती, दाजेल्यो का एत्तोरे फिएरामोस्का तथा ज्योनान्नी बेरशेत (1783-1851) की गीतिकविताएँ सुंदर हैं। नीकोलो तोम्मासेओ के शब्द कोश, दांते की कृति की टीका तथा आत्मकथात्मक दियारियो इंतीमो, पद्यबद्ध कथा उना सेरवा तथा ग्रीक के अनुवाद उसे महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हैं। अन्य कवियों में बोलियों में रचना करनेवाले कारलो पोर्ता तथा जी.जी. वेल्ली उल्लेखनीय हैं। इतालवी रोमांटिक संस्कृति युग के दो महान साहित्यकार हैं मांजोनी तथा लियोपार्दी। दोनों ही 17वीं सदी के फ्रांसीसी वातावरण से प्रभावित इलुमिनिस्टिक युग में पलकर क्रमश: रोमांटिक अर्थो में भावुक तथा धार्मिक अनुभूतियों से प्रभावित होते गए। मांजोनी उदार कैथोलिक प्रवृत्ति का था। लियोपार्दी में सृष्टि के प्रति खिन्नता की प्रवृत्ति दिखती है। दोनों ही नवीन काव्यधारा से प्रभावित थे ओर उसके आधारभूत सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं। मांजोनी में लोंबार्द प्रांत की सजीव उन्मुक्त प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। लियोपार्दी प्रतिक्रियावादी रूढ़िवादी वातावरण में पले थे अत: इनकी छाप उनमें मिलती है। मांजोनी की कृतियों में वर्णन की पूर्णता, वास्तविक कविता, नई उन्मुक्त भाषा तथा अधिक प्रेषणीयता मिलती है। लियोपार्दो अपनी अपार करुणा के लिए अकेले हैं। आलेसांद्रो मांजोनी (1775-1873) ने अनेक ऐतिहासिक ग्रंथ लिखे। काव्यशास्त्र पर भी उसकी कृतियाँ हैं। उसने गीति कविताएँ और नाटक लिखे। उसकी एक महत्वपूर्ण कृति उसका उपन्यास ई प्रोयेस्सी स्पोस्सी है जिसमें मिलान के जीवन का चित्रण है तथा जो इतालवी भाषा का बहुत ही सुंदर आदर्श रूप प्रस्तुत करता है। ज्याकोमो लियोपार्दी (1798-1830) ने स्तोरिया देल्ल अस्त्रोनोमिया, पुराने लोगों की भ्रांतियों पर निबंध, भारतीय गुण तथा ईजिप्ट में पोंपेया, दार्शनिक वार्ताएँ आदि नाना विषयों पर गद्य कृतियाँ लिखीं जिनमें 18वीं सदी की रुचि दिखती है। किंतु धीरे धीरे उसका स्वभाव बदला और वह काल्पनिक कविता छोड़ अनुभूतिप्रधान कविता करने लगा। आसिल्विया (सिल्विया से), सेरा देल दी दि फेस्ता (उत्सव के दिन की संध्या), अला लूना (चंद्र से) उसकी सुंदर कविताएँ हैं। जीवाल्दोने में उसकी अनेक प्रकार की गद्य कृतियाँ संगृहीत हैं। दोनों ही लेखक यूरोपीय प्रसिद्धि के लेखक हैं। इन दोनों ने इतालवी साहित्य को समय से साथ पहुँचा दिया। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में मांजोनो और लियोपार्दी से प्रभावित होकर रचनाएँ होती रहीं तथा कुछ लोग स्वच्छंदतावाद को हल्के अर्थ में लेकर रचनाएँ करते रहे। स्वतंत्र व्यक्तित्ववाले महत्वपूर्ण कवियों में जोसूए कारदूच्ची (1835-1906) का स्थान ऊँचा है, किंतु मांजोनी की तुलना में उनका व्यक्तित्व भी प्रांतीय जैसा लगता है। उनकी काव्यकृतियों में से कुछ ज्यांबी एद एपोदी, रीमे नुओवे, ओदी, बारवारे, नोस्ताल्जिया, सान मारतीनो, सूई काम्मी दी मारेंगो, आले फोंती देल क्लितुन्नो है। कारदूच्ची की भाषा व्यक्तिगत छाप लिए हुए हैं। मृत्यु से कुछ समय पहले उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था। मांजोनी का अनुसरण करते हुए गद्य पद्य लिखनेवालों में एदमोंदो दे अमीचीस दी ओनेल्या (1846-1908), शिशुओं के लिए प्रसिद्ध कृति पिनोक्यो के लेखक कोल्लोदी फोगाज्जारो तथा स्वतंत्र कथा साहित्य लिखनेवालों में ज्योवान्नी वेरगा (1840-1922) प्रसिद्ध हैं। वेरगा की प्रसिद्ध कृतियाँ वीतादेई कांपी, मालावोल्या, नोवेल्ले रूस्तीकाने तथा नाटक कावाल्लेरिया रूस्तीकाना हैं। सामान्य जनसमूह को लेकर वेरगा ने अपनी यथार्थवादी कृतियाँ लिखी हैं। अनेक उपन्यासों तथा काव्यग्रंथों की रचना करनेवाली नोबेल पुरस्कार प्राप्त करनेवाली सारदेन्या की महिला ग्रात्जिया देलेद्दा (1871-1936) की रचनाओं में स्थानीय रंग बहुत मिलता है।
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