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=== आवेश सिद्धान्त (Pooh-Pooh Theory or Interjectional theory)=== इस सिद्धान्त को मनोभावाभिव्यंजकतावाद अथवा ‘मनोरागाभिव्यंजक शब्द मूलकतावाद’ कहा जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार आदि युग के भावुक मानव ने भावावेग में हर्ष, शोक, क्रोध, विस्मय, घृणा आदि को व्यंजित करने के लिए जिन ‘आहा’, ‘ओहो’, ‘फिक्’ ‘छिः’ पूह (Pooh), ‘पिश (Pish) ‘फाई’ (Fie) आदि ध्वनियों को उत्पन्न किया आगे चल कर उन्हीं से भाषा का विकास हुआ। जिस प्रकार ‘धिक्’ से ‘धिक्कार’, ‘धिक्कारना’, ‘धिक्-धिक्’ करना आदि शब्द बने हैं ठीक इसी प्रकार सारी भाषा बनी है। '''समीक्षा''' इस सिद्धान्त में अनेक प्रकार की कमियाँ हैं, जैसे- * भाव-व्यंजक शब्दों को वाक्य के पहले अलग से जोड़ा जाता है वे हमारी भषा का मुख्य अंग या सम्पूर्ण अस्तित्व नहीं है। * ‘बेनफी’ के अनुसार इस प्रकार के शब्द भाषा की असमर्थता को प्रकट करते हैं फिर वे भाषा कैसे बन सकते हैं। * भाषा सोच विचार कर उत्पन्न की गई ध्वनियों का व्यवस्थित रूप है परन्तु ये आवेशजनित निकलने वाले शब्द विचार और व्यवस्था से रहित होते हैं। ये तो स्वतः ही मुख से निकलने वाले आवेग हैं। * इस प्रकार के शब्दों की संख्या किसी भी भाषा में इतनी थोड़ी होती है कि उसके आधार पर सम्पूर्ण भाषा के निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती। * ये शब्द जो आवेगों को प्रकट करते हैं सभी भाषाओं में एक समान रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं जैसे- पीड़ा को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी ओह, (Oh), जर्मन ‘आउ’ (Au), फ्रांसीसी ‘आहि’ (Ahi) भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग करते हैं। हिन्दी में इसके लिए ‘हाय’, ‘दैया’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है। '''निष्कर्ष''' इस सिद्धान्त के अनुसार जोथोड़े से शब्दों का समाधान हो पाता है उनका भाषा में कोई विशेष महत्त्व नहीं है। जैसे खेद या सहानुभूति व्यक्त करने के लिए ‘च-च’, ‘त-त’ आदि का रूप संदेहात्मक है इसलिए उसे कुछ भी अध्ययन-विश्लेषण का आधार नहीं बनाया जा सकता।
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