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== प्रमुख परिवर्तन == === साम्यवाद के प्रति बढ़ा रुझान === साम्यवादी राष्ट्र होने के नाते सोवियत संघ ने खुद को पूंजीवादी व्यवस्था से काटकर रखा था। पूंजीवादी देश भी उसके साथ संबंध नहीं रखना चाहते थे। लेकिन इससे सोवियत संघ को फायदा ही हुआ और वह उस महामंदी से बच निकला जिसने पूंजीवादी देशों की कमर तोड़कर रख दी थी। इस दौरान सोवियत संघ में औद्योगिक विस्तार हुआ। इससे मार्क्सवाद को प्रतिष्ठा मिली और उसे पूंजीवाद के विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा। यही कारण था कि कई प्रभावित देशों मंे इससे प्रेरित होकर सामाजिक व साम्यवादी प्रदर्शन व आंदोलन हुए। === फासीवाद को बढ़ावा === कई विशेषज्ञों का मानना है कि फासीवाद को बढ़ावा देने में इस महामंदी का भी हाथ रहा। फासीवादी नेताओं ने संबंधित देशों में इस बात का प्रचार शुरू कर दिया कि लोगों की खराब स्थिति के लिए उनके पूंजीवादी नेता ही जिम्मेदार है जिनसे फासीवाद ही बचा सकता है। जर्मनी में हिटलर ने इसी महामंदी के बहाने अपनी पकड़ मजबूत बनाई। जापान में हिदेकी तोजो ने चीन में घुसपैठ कर मंचुरिया में इस आधार पर खदानों का विकास किया कि इससे महामंदी से राहत मिलेगी। लेकिन इसका एक ही नतीजा निकला-द्वितीय विश्वयुद्ध। === शस्त्र अर्थव्यवस्था का उदय === इस महामंदी का सबसे बड़ा नतीजा यह हुआ कि अमेरिका जैसे देशों को अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए एक बड़ा फंडा हाथ लग गया। अमेरिका सहित विभिन्न देशों में सैन्य प्रसार-प्रचार से न केवल नौकरियों के द्वार खुले, बल्कि हथियारों के उत्पादन से अर्थव्यवस्थाओं में भी जान आ गई। इससे 1930 के दशक के उत्तरार्ध में महामंदी से निकलने में सहायता मिली। बाद में अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने इसे ही अपना खेवनहार बना लिया। आज हथियारों की बिक्री से इन देशों को भारी मुनाफा होता है। === पूंजीवाद मजबूत हुआ === महामंदी के दौर में पूंजीवाद से मोहभ्रम की स्थिति को समझते हुए अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी देशों को मजबूत बनाने की योजना क्रियान्वित की। ‘मार्शल प्लान’ नामक इस योजना का कागजों पर उद्देश्य तो विश्व युद्ध से पीड़ित देशों के पुनर्निर्माण में मदद करना था, लेकिन असली मकसद साम्यवाद के संभावित विस्तार को रोकना था। इसके तहत यूरोपीय देशों को 17 अरब डॉलर की वित्तीय व प्रौद्योगिकी सहायता दी गई। हालांकि इसके बावजूद सोवियत संघ की बढ़ती ताकत नहीं रोकी जा सकी।
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