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=== शीर्षस्थ का संघर्ष और संदेश === सन् 1955 में आर॰के॰ फिल्म्स की '[[श्री ४२० (1955 फ़िल्म)|श्री 420]]' ने फिर से राज कपूर को सबसे बढ़कर बना दिया। इस फिल्म को सफलता तो मिली ही, देश-विदेश में सराहना भी हुई। और इन दोनों से बढ़कर यह कि 'श्री 420' अपने समय की सबसे अलग फिल्म थी बिल्कुल नए मिजाज की। दर्शकों को इसमें नया स्वाद मिला। उन्होंने इसकी संवेदनशील भाषा में सामाजिक जिन्दगी का नया अर्थ पहचाना। तब देश आजाद हुए कुल 8 वर्ष हुए थे। जनमानस पर आजादी का नशा छाया हुआ था। उस समय 'श्री 420' में सभ्यता और प्रगति की आड़ में पनप रही खोखली नैतिकता को पहचानने की कोशिश के साथ ही उसके संभावित खतरों से आगाह किया गया था। इस फिल्म में राज कपूर का अभिनय बेमिसाल है। इसमें वे मजाक ही मजाक में बहुत बड़ी बातें कहते हैं। यह एक ऐसी फिल्म थी जो अपने समय की जरूरत को पूरा करती है। हर वर्ग के दर्शक के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेती है। सन् 1956 राज कपूर के जीवन का महत्त्वपूर्ण वर्ष रहा। इसी वर्ष वे एक ओर कलात्मक ऊँचाइयों के चरमोत्कर्ष तक पहुँचे और दूसरी ओर लोकप्रियता के उच्चतम शिखर तक भी। वे हिन्दी सिनेमा में अपने ढंग का अलग व्यक्तित्व बन गये, जिसका कोई मुकाबला नहीं। इस वर्ष उनकी दो फिल्में प्रदर्शित हुईं-- '[[जागते रहो (1956 फ़िल्म)|जागते रहो]]' और '[[चोरी चोरी (1956 फ़िल्म)|चोरी-चोरी]]'। इनमें से व्यावसायिक दृष्टि से 'चोरी-चोरी' अधिक सफल रही थी तथा अत्यधिक लोकप्रिय भी। 'जागते रहो' को आरंभ में अधिक व्यवसायिक सफलता नहीं मिली; परंतु यह एक महान फिल्म थी। इस फिल्म को कार्लोरीवेरी अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का 'ग्रैंड प्रीं' पुरस्कार मिला। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत होने के उपरान्त हिन्दी दर्शक इस फिल्म का नाम सुनकर चौंके और दोबारा प्रदर्शित होने पर पहले की अपेक्षा 'जागते रहो' को अधिक सफलता प्राप्त हुई। उस समय तक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भारतीय फिल्म को इतना बड़ा पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ था। यह पुरस्कार मिलने के बाद हिन्दी जगत ने 'जागते रहो' का भरपूर स्वागत किया। कला समीक्षकों ने इसे हिन्दी सिनेमा की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना। फिल्म विशेषज्ञ एवं लेखक प्रदीप चौबे के अनुसार :{{quote|"ऑस्कर अवार्ड यदि सचमुच ही वैश्विक श्रेष्ठता का मापदण्ड हो तो ''जागते रहो'' आज भी उसकी हकदार है। हालांकि भारतीय सिनेमा के वातावरण को इस सबकी जरूरत नहीं क्योंकि पुरस्कारों की नियति खुद भी बहुत दरिद्र होती आयी है। उधर राजकपूर को भी शायद ही कभी पुरस्कारों की ऐषणा रही हो। जनता की लगातार तालियों से बड़ा और कौन-सा पुरस्कार हो सकता है! ''जागते रहो'' सिर्फ अपने समय का नहीं बल्कि हर समय का विराट सच है और आधुनिक समाज के परिदृश्य में तो इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ती जाती है! इसीलिए मैं इसे कालजयी फिल्म स्वीकार करता हूं। इसके निर्माण के 53 वर्ष बाद भी यह फिल्म एक ताजा गुलाब की तरह जहनो दिल में महकती है।"<ref>प्रदीप चौबे, हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक ([[वसुधा|प्रगतिशील वसुधा]], अंक-81, अप्रैल-जून, 2009; {सिनेमा विशेषांक}), संपादक- प्रहलाद अग्रवाल, (पुस्तक रूप में 'साहित्य भंडार', 50, चाहचंद रोड, इलाहाबाद से प्रकाशित) पृष्ठ-128.</ref><ref>{{cite book |last1=प्रहलाद अग्रवाल |first1=(सं॰) |title=हिंदी सिनेमा : आदि से अनंत..., भाग 1 |date=2014 |publisher=साहित्य भंडार |location=50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद |isbn=978-81-7779-354-3 |page=201 |edition=प्रथम}}</ref>}} सन् 1957 में दक्षिण भारत के प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक [[एल॰ वी॰ प्रसाद]] की पहली हिन्दी फिल्म '[[दुर्गा|शारदा]]' में राज कपूर के साथ नायिका रूप में [[मीना कुमारी]] आयीं। यह फिल्म भी सफल हुई तथा इसने [[रजत जयंती|रजत जयन्ती]] मनायी। 'शारदा' में मीना कुमारी ने उस त्यागमयी भारतीय नारी की भूमिका निभायी है जो परिस्थितिवश उसी व्यक्ति के पिता से विवाह करने के लिए मजबूर हो जाती है, जिससे वह प्यार करती है। जिसे पति के रूप में पाना चाहिए था उसे बेटे के रूप में पाती है। वह दृश्य जिसमें राज कपूर मीना कुमारी को पहली बार माँ कह कर संबोधित करते हैं, दिल को दहला देने वाला है। सन् 1958 में राज कपूर की दो फिल्में प्रदर्शित हुईं-- '[[परवरिश]]' और '[[फिर सुबह होगी]]' इन दोनों ही फिल्मों में उनकी नायिका [[माला सिन्हा]] थीं। ये दोनों ही फिल्में व्यावसायिक दृष्टि से सफल नहीं हो पायीं। 'परवरिश' एक सामान्य फिल्म थी भी, परन्तु [[फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की|दोस्तोयेव्स्की]] के सुप्रसिद्ध उपन्यास 'अपराध और दण्ड' पर आधारित 'फिर सुबह होगी' वस्तुतः एक उत्तम फिल्म थी। प्रहलाद अग्रवाल के शब्दों में :{{quote|" '58 में ही प्रदर्शित होने वाली रमेश सहगल की 'फिर सुबह होगी' निश्चित ही एक उम्दा फिल्म थी, लेकिन टिकिट-खिड़की पर बुरी तरह असफल हो गयी। हिन्दी सिनेमा में कभी-कभी कुछ चमत्कार भी होते हैं। 'फिर सुबह होगी' की असफलता एक ऐसा ही चमत्कार थी। इसमें राज कपूर और माला सिन्हा ने उत्कृष्ट अभिनय किया था। रमेश सहगल का निर्देशन भी सक्षम था और इसके साथ ही [[साहिर लुधियानवी]] के सारगर्भित भावनापूर्ण गीतों को संगीतकार खय्याम ने मधुर धुनों से सजाया था।... 'फिर सुबह होगी' में राज कपूर ने अपनी प्रचलित छवि से हटकर संजीदा भूमिका की थी। पर इस फिल्म की असफलता ने उन्हें बाद में पुनः अपने छवि के दायरे में वापस कर दिया।"<ref>{{cite book |last1=प्रहलाद |first1=अग्रवाल |title=राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना |date=2007 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |isbn=978-81-267-1405-6 |pages=94, 95 |edition=प्रथम {परिवर्धित}}}</ref>}} सन् 1959 में राज कपूर अभिनीत पाँच फिल्में प्रदर्शित हुईं-- '[[अनाड़ी (1959 फ़िल्म)|अनाड़ी]]', '[[दो उस्ताद (1959 फ़िल्म)|दो उस्ताद]]', '[[कन्हैया (1959 फ़िल्म)|कन्हैया]]', '[[मैं नशे में हूँ (1959 फ़िल्म)|मैं नशे में हूँ]]', तथा '[[चार दिल चार राहें (1959 फ़िल्म)|चार दिल चार राहें]]'। इनमें से किसी के निर्माता-निर्देशक स्वयं राज कपूर नहीं थे। इनमें से ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित 'चार दिल चार राहें' असफल हो गयी तथा 'अनाड़ी' को छोड़कर शेष तीन फिल्में औसत रूप में ही सफल रहीं। 'अनाड़ी' का निर्माण एल॰बी॰ लछमन तथा निर्देशन सुप्रसिद्ध निर्देशक [[ऋषिकेश मुखर्जी|हृषिकेश मुखर्जी]] ने किया था। यह फिल्म राज कपूर के लिए एक सुखद घटना बन गयी। 1956 में नरगिस के अलग हो जाने के बाद 1959 में आकर 'अनाड़ी' ने राज कपूर को फिर अनोखे रूप में प्रस्तुत किया। निराशा का एक दौर समाप्त हुआ और सृजनात्मकता का नया अध्याय आरंभ। इसमें उत्कृष्ट अभिनय के लिए राज कपूर को [[फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार|सर्वश्रेष्ठ अभिनेता]] का '[[फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार|फिल्मफेयर पुरस्कार]]' भी प्राप्त हुआ। सन् 1960 में राज कपूर की तीन फिल्में प्रदर्शित हुईं-- '[[छलिया (1960 फ़िल्म)|छलिया]]', '[[श्रीमान सत्यवादी (1960 फ़िल्म)|श्रीमान् सत्यवादी]]' तथा '[[जिस देश में गंगा बहती है]]'। इनमें से 'श्रीमान् सत्यवादी' असफल साबित हुई, जबकि भारत-पाक-विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित 'छलिया' सफल हुई। 'जिस देश में गंगा बहती है' का निर्माण भी राज कपूर ने ही किया था। यह फिल्म काफी उत्तम तथा सफल सिद्ध हुई। इसमें उत्तम अभिनय के लिए राज कपूर को तो [[फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार|सर्वश्रेष्ठ अभिनेता]] का 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार' मिला ही, इस फिल्म को भी [[फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार|सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म]] का 'फिल्म फेयर पुरस्कार' प्राप्त हुआ। सन् 1961 में राज कपूर की एकमात्र फिल्म प्रदर्शित हुई '[[नज़राना (1961 फ़िल्म)|नज़राना]]' तथा 1962 में '[[आशिक (1962 फ़िल्म)|आशिक]]'। 'नज़राना' मद्रास के सुप्रसिद्ध निर्माता निर्देशक श्रीधर की पहली हिन्दी फिल्म थी। इसमें राज कपूर की नायिका थी [[वैजयन्ती माला]]। प्रेम और कर्तव्य के अंतर्द्वंद को प्रस्तुत करने वाली 'नज़राना' में राज कपूर ने लम्बे समय के बाद गंभीर भूमिका निभाई थी। यह अभिनय की दृष्टि से उनकी महत्त्वपूर्ण फिल्म है। 'आशिक' हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन के बावजूद अस्त-व्यस्त पटकथा के कारण अधिक सफल साबित नहीं हो पायी। सन् 1963 में प्रदर्शित '[[दिल ही तो है (1963 फ़िल्म)|दिल ही तो है]]' तथा '[[एक दिल सौ अफ़साने (1963 फ़िल्म)|एक दिल सौ अफ़साने]]' एवं 1964 में प्रदर्शित '[[दूल्हा दुल्हन|दूल्हा-दुल्हन]]' सामान्य रूप से ही सफल हुईं। 'दिल ही तो है' में ही [[मन्ना डे]] की आवाज में गाया गया सुप्रसिद्ध गीत था 'लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे'। 26 जून 1964 को अखिल भारतीय स्तर पर '[[संगम (फ़िल्म)|संगम]]' प्रदर्शित हुई। इसके 100 से अधिक प्रिंट एक साथ रिलीज किये गये थे। यह निर्माता, निर्देशक तथा अभिनेता सभी रूपों में राज कपूर की पहली रंगीन फिल्म थी। 'संगम' में राज कपूर अपनी बहुआयामी प्रतिभा के साथ उपस्थित हुए। 'संगम' के निर्माता, निर्देशक, संपादक और नायक वे स्वयं थे।<ref>सतीश बिरथरे, हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक, पूर्ववत्, पृष्ठ-278.</ref> इस फिल्म के लिए उन्हें '[[फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार]]' और '[[फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सम्पादक पुरस्कार]]' भी प्राप्त हुए। यद्यपि यह राज कपूर की पहली फिल्म थी जिसमें कोई संदेश नहीं था; फिर भी रागात्मक सम्मोहन, नयनाभिराम दृश्यांकन और मधुर संगीत ने मिलकर इसे घनघोर लोकप्रिय बना दिया। भारत में ही नहीं, यूरोप के अनेक देशों में भी 'संगम' को बहुत सफलता मिली। 'संगम' ने राज कपूर को '''एशिया का सबसे बड़ा शो मैन''' बना दिया।<ref>आधी हकीकत आधा फसाना, प्रहलाद अग्रवाल, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम (परिवर्धित) संस्करण-2007, पृष्ठ-121.</ref> 'संगम' में राज कपूर की नायिका सुप्रसिद्ध नर्तकी-अभिनेत्री [[वैजयन्ती माला]] थी तथा सह अभिनेता [[राजेन्द्र कुमार]] थे, जिनकी भूमिका को अपने उदार स्वभाव के अनुरूप ही राज कपूर ने स्वयं की भूमिका से भी अधिक महत्व दिया था। सन् 1966 में राज कपूर तथा [[वहीदा रहमान]] अभिनीत '[[तीसरी कसम]]' प्रदर्शित हुई। यह हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध कथाकार [[फणीश्वर नाथ "रेणु"|फणीश्वर नाथ 'रेणु']] रचित इसी नाम की लम्बी कहानी पर केंद्रित थी। इसका निर्माण कवि-गीतकार [[शैलेन्द्र]] ने किया था। साहित्यिक कृति पर बनी फिल्म होने से आरंभ में इसे मुश्किल से वितरक मिले और बॉक्स ऑफिस पर भी आरंभ में इसे सफलता नहीं मिली। इसी दुःख में शैलेन्द्र दुनिया से चल बसे। परंतु बाद में लोगों ने इसका महत्व समझा और सिनेमा हॉल हाउसफुल रहने लगे। यह वह फिल्म थी जिसमें राज कपूर ने अपने जीवन की सर्वोत्कृष्ट भूमिका अदा की;<ref name="अग्र">आधी हकीकत आधा फसाना, प्रहलाद अग्रवाल, पूर्ववत्, पृष्ठ-135.</ref><ref>अरुण कुमार मिश्र, हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक, पूर्ववत्, पृष्ठ-287.</ref> हालाँकि इस फिल्म के लिए पारिश्रमिक स्वरूप उन्होंने अपने मित्र कवि-गीतकार शैलेन्द्र से मात्र एक रुपया लिया था। 'तीसरी कसम' यदि एकमात्र नहीं तो चन्द उन फिल्मों में से है जिन्होंने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया हो। 'तीसरी कसम' को बाद में 'राष्ट्रपति स्वर्ण पदक' मिला, बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फिल्म और कई अन्य पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया। मास्को फिल्म फेस्टिवल में भी यह फिल्म पुरस्कृत हुई। इसकी कलात्मकता की काफी प्रशंसा की गयी।<ref name="अग्र" /> 1967 में राज कपूर अभिनीत 'अराउंड द वर्ल्ड' और 'दीवाना' तथा 1968 में 'सपनों का सौदागर' प्रदर्शित हुईं। ये तीनों ही फिल्में असफल हो गयीं। इनमें से किसी के निर्माता-निर्देशक राज कपूर नहीं थे। 'दीवाना' और 'सपनों का सौदागर' के निर्देशक महेश कौल थे। सक्षम निर्देशक होने के बावजूद इन फिल्मों में वे अपनी सक्षमता का परिचय नहीं दे पाये और राज कपूर की उत्तम अभिनय क्षमता का सटीक उपयोग नहीं कर पाये।<ref>आधी हकीकत आधा फसाना, प्रहलाद अग्रवाल, पूर्ववत्, पृष्ठ-142.</ref> ==== मेरा नाम जोकर : असफल परन्तु कालजयी ==== सन् 1970 के दिसंबर में आर॰के॰ फिल्म्स की अपने समय की सबसे महँगी फिल्म '[[मेरा नाम जोकर]]' अखिल भारतीय स्तर पर एक साथ प्रदर्शित हुई। यह राज कपूर के जीवन की सबसे महत्त्वाकांक्षी फिल्म थी। फिल्म समालोचक प्रहलाद अग्रवाल के शब्दों में :{{quote|"...निश्चय ही राजकपूर इसके माध्यम से (बाजार) लूटने के लिए नहीं, अपने कलाकार की मुक्ति की उद्दाम आकांक्षा से उद्वेलित होकर निकले थे।... एक निर्देशक और एक कलाकार के रूप में राजकपूर ने अपनी जिन्दगी का सब-कुछ 'जोकर' को दिया। एक निर्माता के रूप में उन्होंने अंगरेजी की 'लेफ्ट नो स्टोन अनटर्न्ड' कहावत चरितार्थ की। 'मेरा नाम जोकर' राजकपूर के सपनों का एक ऐसा तमाशा था जिसे वह एक साथ कलात्मक और व्यावसायिक ऊँचाइयों तक पहुँचाना चाहते थे।... 'जोकर' असफल हो गयी। राजकपूर की जिन्दगी का सबसे बड़ा सपना मिट्टी में मिल गया। वह सपना जिसके लिए उसने अपना पूरा अस्तित्व दाँव पर लगा दिया था। इस सब के बावजूद 'जोकर' राजकपूर की महानतम कलाकृति है जिसमें उसने अपने व्यक्तित्व, अपने रचनात्मक कौशल और कलाकार की पीड़ा को अत्यन्त मार्मिक और सघन अभिव्यक्ति दी है।"<ref>{{cite book |last1=प्रहलाद |first1=अग्रवाल |title=राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना |date=2007 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |isbn=978-81-267-1405-6 |pages=147, 151, 154 |edition=प्रथम (परिवर्धित)}}</ref>}} फिल्म विशेषज्ञ एवं लेखक प्रदीप चौबे ने संस्मरणात्मक शैली में लिखा है कि "...1970 में ''मेरा नाम जोकर'' देख चुका था। वह भी मजबूरी में। ''..जोकर'' के साथ ही बाजार में उतरी थी-- ''[[जॉनी मेरा नाम (1970 फ़िल्म)|जॉनी मेरा नाम]]''। ठीक ''..जोकर'' के साथ ही रिलीज हुई थी। ''जॉनी..'' की धूम मची हुई थी। फिर [[देव आनन्द|देव]] हमारा सुपर हीरो। ''जॉनी..'' ने ''..जोकर'' को पछाड़ दिया था। [[रायपुर]] (छत्तीसगढ़) में दोनों फिल्में आमने-सामने लगी थीं। ''जॉनी मेरा नाम'' का टिकिट जब ब्लैक में भी नहीं मिला तो मन मारकर दोस्तों का टोला ''..जोकर'' में घुसा। टिकिट खिड़की खाली पड़ी थी। टिकिट लेकर हॉल में घुसे तो वह भी खाली पड़ा था, बहुत निराशा हुई।... बहुत अन्यमनस्क मूड में हम लोग ''..जोकर'' में घुसे थे परंतु पौने चार घंटे की यह फिल्म देखने के बाद जब हम लोग हॉल से बाहर निकले तो राजकपूर लगातार मेरे भीतर-बाहर थे। रायपुर से अपने कस्बे की दो घंटों की बस यात्रा में ''..जोकर'' मेरे भीतर से निकलने को तैयार न था। फिल्म की कहानी, विदूषक का जीवन-दर्शन, भव्य फिल्मांकन, महान करुणा प्रधान संगीत, उदासी भर देने वाली टेक्नीकल रंग-प्रस्तुति आदि सभी तत्वों ने मुझे झकझोर दिया। ''..जोकर'' के माध्यम से राजकपूर ने मेरी फिल्म चेतना पर हमला कर दिया था। लगभग सप्ताह भर मैं ''..जोकर'' की खुमारी में रहा। राज कपूर एक झटके में मेरी समझ में आ गए। वह अचानक ही मेरे लिए [[दिलीप कुमार|दिलीप]] और देव से बहुत बड़े हो गए।... रायपुर में ''..जोकर'' देखने के एक सप्ताह बाद यह मेरे लिए एक सुखद प्रसंग हुआ कि रायपुर के सिनेमा हॉल से उतरकर फिल्म मेरे छोटे से कस्बे की टूरिंग टॉकीज में लगी।... फिल्म वहाँ सिर्फ दस दिनों के लिए आई थी।... आप इसे मेरा अतिरेक कहें या पागलपन कि लगातार मैंने और दोस्तों ने हर रात वह फिल्म, टाइटल्स से लेकर दी एण्ड तक बिलानागा देखी। हर शो उसी तन्मयता से, उसी मुग्धता से और हर बार किसी नयी खोज के साथ। संक्षेप में यह कि यहीं से, बिल्कुल यहीं से राजकपूर मेरा महानायक बना।"<ref>प्रदीप चौबे, हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक, पूर्ववत्, पृष्ठ-121-122.</ref><ref>{{cite book |last1=प्रहलाद अग्रवाल |first1=(सं॰) |title=हिंदी सिनेमा : आदि से अनंत..., भाग 1 |date=2014 |publisher=साहित्य भंडार |location=50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद |isbn=978-81-7779-354-3 |pages=195-196 |edition=प्रथम}}</ref> 'आवारा', 'श्री 420' तथा 'मेरा नाम जोकर' राज कपूर के सृजन के तीन शिखर भी हैं तथा उनके जीवन-दर्शन को प्रस्तुत करने के महत्वाकांक्षी माध्यम भी। यही कारण है कि राज कपूर ने 'आवारा' तथा 'श्री 420' इन दोनों फिल्मों को किसी न किसी रूप में मेरा नाम जोकर से सम्बद्ध किया है। 'मेरा नाम जोकर' में 'आवारा' का प्रसिद्ध गीत 'आवारा हूँ' दोहराया गया है तथा 'श्री 420' के कई दृश्यों की झलक दिखलायी गयी है। इसलिए 'मेरा नाम जोकर' को समझने के लिए यह आवश्यक है कि उसे देखने से पहले 'श्री 420' को अवश्य देख लिया गया हो। 'मेरा नाम जोकर' जब रिलीज हुई तो इसका रनिंग टाइम 4 घंटे 43 मिनट था।<ref>हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक, पूर्ववत्, पृष्ठ-328.</ref> दो सप्ताह बाद ही इसे संपादित कर 4 घंटे 9 मिनट का किया गया और बाद में इसे काफी छोटा कर लगभग 3 घंटे (178 मिनट) का संस्करण तैयार किया गया। 1986 में पुनः संपादित यह संस्करण व्यवसाय की दृष्टि से बहुत सफल रहा। इसमें सबसे अधिक फुटेज तीसरे भाग के ही काटे गये थे।<ref name="चौकसे" /> कहानी तो वही थी, सिर्फ दूसरे और तीसरे भाग की लंबाई कम हो गयी थी। इन सोलह सालों में 'जोकर' की महानता और तकनीकी गुणवत्ता के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका था और जनता को लगा कि हमने अपने प्रिय राजू के साथ इंसाफ नहीं किया है। फिल्मों से प्रत्यक्षतः जुड़े सुप्रसिद्ध लेखक जयप्रकाश चौकसे के अनुसार :{{quote|"युवा पीढ़ी के दर्शकों ने तुलना कर देखा और उन्हें अपनी पीढ़ी के फिल्मकार इस 'प्यारे बूढ़े जोकर' के सामने बहुत फीके लगे।"<ref name="चौकसे">{{cite book |last1=जयप्रकाश |first1=चौकसे |title=राजकपूर : सृजन प्रक्रिया |date=2010 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |isbn=978-81-267-1957-0 |page=54 |edition=प्रथम (संशोधित-परिवर्धित)}}</ref>}} हिन्दी सिनेमा में दो असफलताओं की बड़ी हसरत से चर्चा की जाती है। [[गुरुदत्त]] की '[[कागज़ के फूल (1959 फ़िल्म)|कागज के फूल]]' और राज कपूर की '[[मेरा नाम जोकर]]'। ये दोनों ही फिल्में इनकी सबसे महत्त्वाकांक्षी फिल्में थीं जिन्हें दर्शकों ने नकार दिया। लेकिन दो-दो पीढ़ियाँ गुजर जाने के बावजूद वे आज भी मौजूद हैं। उन्हीं दर्शकों को, उनकी अगली पीढ़ी को अचंभित कर रही हैं। आनंदित कर रही हैं।<ref>हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक ([[वसुधा|प्रगतिशील वसुधा]], अंक-81, अप्रैल-जून, 2009; {सिनेमा विशेषांक}), संपादक- प्रहलाद अग्रवाल, (पुस्तक रूप में 'साहित्य भंडार', 50, चाहचंद रोड, इलाहाबाद से प्रकाशित) पृष्ठ-327.</ref> ==== नायक की विदाई : चरित्र अभिनय ==== 'मेरा नाम जोकर' के साथ ही राज कपूर ने नायक के रूप में फिल्मों से विदा ले ली। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में चरित्र अभिनेता के रूप में भूमिकाएँ निभायीं। वे पहली बार आर॰के॰ फिल्म्स के ही बैनर तले निर्मित 'कल आज और कल' में चरित्र अभिनेता के रूप में प्रस्तुत हुए। इसके निर्देशक थे उन्हीं के ज्येष्ठ पुत्र [[रणधीर कपूर]]। बाद में रणधीर कपूर निर्देशित 'धरम-करम' के अलावा उन्होंने [[दारा सिंह]] की फिल्म 'मेरा देश मेरा धर्म', दुलाल गुहा निर्देशित 'खान दोस्त', [[ऋषिकेश मुखर्जी]] की 'नौकरी', [[संजय खान]] की 'चाँदी सोना' तथा 'अब्दुल्ला' में भी चरित्र अभिनय किया। नरेश कुमार के 'दो जासूस' तथा 'गोपीचंद जासूस' में अपेक्षाकृत उन्होंने मुख्य भूमिका निभायी। प्रहलाद अग्रवाल के शब्दों में :{{quote|"लेकिन उनके बारे में इतना ही कहना काफी है कि राजकपूर ने ये फिल्में स्वीकार न की होतीं तो वही ज्यादा उपयुक्त होता। पर राजकपूर ईमानदारी से दोस्ती निभाने वाले लोगों में-से हैं। उन्होंने किसी का एहसान कभी नहीं भुलाया। मुहब्बत की हमेशा कद्र की। प्यार के एक कतरे से बढ़कर अजीज तो उनकी जिन्दगी में कुछ है ही नहीं। इसीलिए दोस्ती की खातिर, मुहब्बत की खातिर उन्होंने कई ऐसी फिल्मों में भूमिकाएँ कीं जिनमें उन्हें कतई काम नहीं करना चाहिए था।"<ref>{{cite book |last1=प्रहलाद |first1=अग्रवाल |title=राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना |date=2007 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |page=162}}</ref>}} 'वकील बाबू' उनके द्वारा अभिनीत अंतिम फिल्म थी।
सारांश:
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