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===शिक्षा के उद्देश्य तथा आदर्शवाद=== आदर्शवादियों के अनुसार मनुष्य-जीवन का अन्तिम उद्देश्य आत्मा-परमात्मा के चरम स्वरूप को जानना है, इसी को आत्मानुभूति, आदर्श व्यक्तित्व की प्राप्ति, ईश्वर की प्राप्ति तथा परम आनन्द की प्राप्ति कहा जाता है। आत्मा-परमात्मा के चरम स्वरूप को जानने के लिए आदर्शवादियों के अनुसार मनुष्य को चार सोपान पार करने होते हैं। प्रथम सोपान पर उसे अपने ‘प्राकृतिक स्व’ का विकास करना होता है। दूसरे सोपान पर उसे अपने ‘सामाजिक स्व’ का विकास करना होता है। तीसरे सोपान पर उसे अपने ‘मानसिक स्व’ का विकास करना होता है तथा अन्तिम सोपान पर उसे ‘आध्यात्मिक स्व’ का विकास करना होता है। आदर्शवादी विचारधारा के अनुसार मानव प्राणी ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना है जिसको उसने असीमित शक्तियाँ प्रदान की हैं। इन्हीं विभिन्न शक्तियों एवं क्षमताओं के योग से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसीलिए आदर्शवादी विचारक व्यक्तित्व को ऊंचा उठाना अथवा उसमें निहित विभिन्न सर्वोच्च शक्तियों एवं क्षमताओं का प्रकटीकरण एवं अच्छे मार्ग की ओर ले जाना ही शिक्षा का उद्देश्य मानते हैं। स्पष्ट है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण होता है और व्यक्ति के भौतिक शरीर की अपेक्षा ‘आत्मा’ का विशेष महत्व होता है। इसलिए आदर्शवाद के अनुसार मानव-जीवन का उद्देश्य इसी ‘आत्मा’ का बोध करना है। आत्मानुभूति के लिए आत्म-प्रकाशन भी आवश्यक है। आत्म प्रकाशन के लिए ‘सामाजिक स्व’ को विकसित करना आवश्यक है। सामाजिक स्व के विकास का अर्थ है-मनुष्य समाज द्वारा स्वीकृत नियमों का पालन करता है, उसकी पसन्द सामाजिक स्वीकृति-अस्वीकृति पर निर्भर करती है। आदर्शवादी यह मानते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी संस्कृति है, रहन-सहन, रीति रिवाज, भाषा साहित्य, कला संगीत एवं मूल्य हैं। ये ही उसे प्राकृतिक ‘स्व’ से सामाजिक स्व की ओर अग्रसर करते हैं, समाज एवं वातावरण के साथ भलीभाँति समायोजन स्थापित करने के लिए व्यक्ति को ‘आत्म प्रकाशन’ का अवसर मिलना आवश्यक है। आत्म प्रकाशन के लिए ‘बौद्धिक स्व’ का विकास आवश्यक है। यह वह स्थिति होती है जब मनुष्य का व्यवहार सामाजिक स्वीकृति-अस्वीकृति से नियंत्रित न होकर उसकी बुद्धि एवं विवेक से नियंत्रित होता है। प्लेटो का विचार है कि मनुष्य की बुद्धि एवं विवेक उसके समस्त आदर्शों, कृत्यों एवं आध्यात्मिक चेष्टाओं का आधार होते हैं। बिना बुद्धि के ज्ञान नहीं हो सकता, बिना ज्ञान के विवेक नहीं हो सकता और बिना विवेक के सत्य-असत्य, शिव-अशिव एवं सुन्दर-असुन्दर में भेद नहीं किया जा सकता है तथा सत्यं शिवं सुन्दरम् की प्राप्ति नहीं की जा सकती है। आत्मानुभूति से हम वास्तविक सत्य का दर्शन करते हैं। आदर्शवादियों का विश्वास है कि जब मनुष्य अपने ‘प्राकृतिक स्व’ एवं ‘सामाजिक स्व’ से ऊपर उठकर अपने ‘बौद्धिक स्व’ में नियंत्रित होने लगता है तो वह धीरे-धीरे स्वतः ‘आध्यात्मिक स्व’ के क्षेत्र में प्रवेश करने लगता है। प्लेटो का विचार है कि मनुष्य की प्रवृत्ति सत्यं, शिवं तथा सुन्दरम् की तरफ झुकी होती है। वह सदैव सत्य की खोज में तत्पर रहता है और जो कल्याणकारी एवं सुन्दर है, उसे स्वीकार करता है तथा जो कल्याणकारी एवं सुन्दर नहीं है, उसका त्याग करता है। आदर्शवादी मनुष्य को इस प्रक्रिया में प्रशिक्षित करने पर बल देते हैं। उपर्युक्त लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शनैः शनैः दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना आवश्यक है। इस भौतिक जगत के नानात्व से मुक्ति ही शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए। कहा भी गया है- : ''सा विद्या या विमुक्तये'' अर्थात् विद्या (ज्ञान) वह है जो मुक्ति प्रदान करे। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे व्यक्तित्व का चरम विकास ही आदर्शवादी शिक्षा का उद्देश्य है जिसमें व्यक्ति आत्मानुभूति कर [[सत्यं शिवं सुन्दरम|सत्यं, शिवं तथा सुन्दरं]] की प्राप्ति कर सके। आत्मानुभूति का बोध प्राकृतिक देन नहीं है इसलिए व्यक्ति को सतत अभ्यास एवं प्रयत्न द्वारा इसे प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिये।
सारांश:
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