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=== उषा अर्घ्य === [[चित्र:सूर्यदेव को अर्घ्य देते छठव्रती .jpg|अंगूठाकार|212x212पिक्सेल|सूर्यदेव को अर्घ्य देते छठव्रती ]] चौथे दिन [[कार्तिक शुक्ल सप्तमी]] की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्योदय से पहले ही व्रती लोग घाट पर उगते सूर्यदेव की पूजा हेतु पहुंच जाते हैं और शाम की ही तरह उनके पुरजन-परिजन उपस्थित रहते हैं। संध्या अर्घ्य में अर्पित पकवानों को नए पकवानों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है परन्तु कन्द, मूल, फलादि वही रहते हैं। सभी नियम-विधान सांध्य अर्घ्य की तरह ही होते हैं। सिर्फ व्रती लोग इस समय पूरब की ओर मुंहकर पानी में खड़े होते हैं व सूर्योपासना करते हैं। पूजा-अर्चना समाप्तोपरान्त घाट का पूजन होता है। वहाँ उपस्थित लोगों में प्रसाद वितरण करके व्रती घर आ जाते हैं और घर पर भी अपने परिवार आदि को प्रसाद वितरण करते हैं। व्रति घर वापस आकर गाँव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहाँ जाकर पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। व्रती लोग खरना दिन से आज तक निर्जला उपवासोपरान्त आज सुबह ही नमकयुक्त भोजन करते हैं। <ref>{{Cite web|url=https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-second-day-kharana.html|title=छठ पूजा का चौथा दिन - उषा अर्घ्या|website=Chhath Parv|access-date=22 अक्तूबर 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20191022034042/https://www.chhathparv.com/p/chhath-puja-second-day-kharana.html|archive-date=22 अक्तूबर 2019|url-status=dead}}</ref>
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