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== व्याख्या == बाइबिल ईश्वर प्रेरित भी है और साधारण मनुष्यों की रचना भी है; अत: इसकी व्याख्या में इस दोहरे कर्तृत्व का ध्यान रखना आवश्यक है। मनुष्य की कृति होने के कारण अन्य लौकिक साहित्य की तरह बाइबिल का अध्ययन किया जाना चाहिए; अत: * (1) पाठानुसंधान के नियमों के अनुसार शुद्ध पाठ का निर्धारण करना है; * (2) परोक्ष एवं प्रत्यक्ष संदर्भ के अनुसार शब्दों तथा वाक्यों का अर्थ लगाना है; * (3) इस कार्य में समानांतर रचनाओं, प्राचीन अनुवादों तथा प्रामाणिक व्याख्याओं का सहारा लेना है; और * (4) विभिन्न लेखकों के समय, स्थान, शैली तथा उद्देश्य का ध्यान रखना है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि बाइबिल के व्याख्याता के लिए बाइबिल में उल्लिखित देशों की विस्तृत जानकारी के अतिरिक्त भाषाविज्ञान, इतिहास, भूगोल, पुरातत्व, धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन जैसी अनेक सहायक विधाएँ अत्यंत आवश्यक हैं। बाइबिल ईश्वर की प्रेरणा से लिखी गई है, अत: इसकी व्याख्या करते समय * (1) इसके धार्मिक उद्देश्य की रक्षा होनी चाहिए * (2) इसकी शिक्षा निभ्र्रांत सिद्ध हो जानी चाहिए क्योंकि ईश्वर भ्रांति नहीं सिखला सकता; * (3) धर्म तथा नैतिकता के प्रश्नों के विषय में ईसा (ईश्वर) द्वारा स्थापित चर्च की आधिकारिक व्याख्या दी जानी चाहिए। * (4) प्रत्येक व्याख्या को ईसाई धर्म के सामूहिक सत्य के साथ सामंजस्य रखना चाहिए। उपर्युक्त नियमों के दोहरे पक्ष का संतुलन रखना आवश्यक है। चर्च की परंपरा के अनुसार ही बाइबिल की वैज्ञानिक व्याख्या सार्थक हो सकती है।
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