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== <big>दर्शन एवं सिद्धान्त</big> == {{बौद्ध तीर्थ}} {{मुख्य|बौद्ध दर्शन}} <big>गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, बौद्ध धर्म के अलग-अलग संप्रदाय उपस्थित हो गये हैं, परन्तु इन सब के बहुत से सिद्धान्त मिलते हैं।</big> === <big>प्रतीत्यसमुत्पाद</big> === {{मुख्य|प्रतीत्यसमुत्पाद}} <big>प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धान्त कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है। प्राणियों के लिये, इसका अर्थ है कर्म और विपाक (कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र। क्योंकि सब कुछ अनित्य और अनात्मं (बिना आत्मा के) होता है, कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है। हर घटना मूलतः शुन्य होती है। परंतु, मानव, जिनके पास ज्ञान की शक्ति है, तृष्णा को, जो दुःख का कारण है, त्यागकर, तृष्णा में नष्ट की हुई शक्ति को ज्ञान और ध्यान में बदलकर, निर्वाण पा सकते हैं।तृष्णा शून्य जीवन केवल विपश्यना से संभव है1</big> === <big>क्षणिकवाद</big> === {{मुख्य|क्षणिकवाद}} <big>इस दुनिया में सब कुछ क्षणिक है और नश्वर है। कुछ भी स्थायी नहीं। परन्तु वैदिक मत से भिन्न है।</big> === <big>अनात्मवाद</big> === {{मुख्य|अनात्मवाद}} <big>आत्मा का अर्थ 'मै' होता है। किन्तु, प्राणी शरीर और मन से बने है, जिसमे स्थायित्व नही है। क्षण-क्षण बदलाव होता है। इसलिए, 'मै'अर्थात आत्मा नाम की कोई स्थायी चीज़ नहीं। जिसे लोग [[आत्मा]] समझते हैं, वो चेतना का अविच्छिन्न प्रवाह है। आत्मा का स्थान मन ने लिया है।</big> === <big>अनीश्वरवाद</big> === <big>बुद्ध ने ब्रह्म-जाल सूत् में सृष्टि का निर्माण कैसा हुआ, ये बताया है। सृष्टि का निर्माण होना और नष्ट होना बार-बार होता है। [[ईश्वर]] या महाब्रह्मा सृष्टि का निर्माण नही करते क्योंकि दुनिया [[प्रतीत्यसमुत्पाद]] अर्थात कार्यकरण-भाव के नियम पर चलती है। भगवान बुद्ध के अनुसार, मनुष्यों के दू:ख और सुख के लिए कर्म जिम्मेदार है, [[ईश्वर]] या महाब्रह्मा नही। पर अन्य जगह बुद्ध ने सर्वोच्च सत्य को अवर्णनीय कहा है।</big> === <big>शून्यतावाद</big> === <big>[[शून्यता]] महायान बौद्ध सम्प्रदाय का प्रधान दर्शन है।</big> === <big>यथार्थवाद</big> === <big>बौद्ध धर्म का मतलब निराशावाद नहीं है। दुख का मतलब निराशावाद नहीं है, बल्कि सापेक्षवाद और यथार्थवाद है<ref>मीर्चा ईटु, दर्शन और धर्म का इतिहास, बुखारेस्ट, कल की रोमानिया का प्रकाशन संस्था, दो हज़ार चार, एक सौ इक्यासी का पृष्ठ। (ISBN 973-582-971-1)</ref>। बुद्ध, धम्म और संघ, बौद्ध धर्म के तीन त्रिरत्न हैं। भिक्षु, भिक्षुणी, उपसका और उपसिका संघ के चार अवयव हैं।<ref>[[आनन्द केंटिश कुमारस्वामी]], हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म, नई यॉर्क, गोल्डन एलिक्सिर प्रेस, दो हज़ार ग्यारह, चौहत्तर का पृष्ठ। (ISBN 978-0-9843082-3-1)</ref></big> ===<big>बोधिसत्व</big>=== {{main|बोधिसत्व}} <big>दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करने वाला [[बोधिसत्व]] कहलाता है। बोधिसत्व जब दस बलों या भूमियों (मुदिता, विमला, दीप्ति, अर्चिष्मती, सुदुर्जया, अभिमुखी, दूरंगमा, अचल, साधुमती, धम्म-मेघा) को प्राप्त कर लेते हैं तब "बुद्ध" कहलाते हैं। बुद्ध बनना ही बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है। इस पहचान को [[बोधि]] (ज्ञान) नाम दिया गया है। कहा जाता है कि बुद्ध शाक्यमुनि केवल एक बुद्ध हैं - उनके पहले बहुत सारे थे और भविष्य में और होंगे। उनका कहना था कि कोई भी बुद्ध बन सकता है अगर वह दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करते हुए बोधिसत्व प्राप्त करे और बोधिसत्व के बाद दस बलों या भूमियों को प्राप्त करे। बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य है सम्पूर्ण मानव समाज से दुःख का अंत। "मैं केवल एक ही पदार्थ सिखाता हूँ - दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का निरोध है, और दुःख के निरोध का मार्ग है" (बुद्ध)। बौद्ध धर्म के अनुयायी [[अष्टांगिक मार्ग]] पर चलकर न के अनुसार जीकर अज्ञानता और दुःख से मुक्ति और निर्वाण पाने की कोशिश करते हैं।</big>
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