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==== मेरा नाम जोकर : असफल परन्तु कालजयी ==== सन् 1970 के दिसंबर में आर॰के॰ फिल्म्स की अपने समय की सबसे महँगी फिल्म '[[मेरा नाम जोकर]]' अखिल भारतीय स्तर पर एक साथ प्रदर्शित हुई। यह राज कपूर के जीवन की सबसे महत्त्वाकांक्षी फिल्म थी। फिल्म समालोचक प्रहलाद अग्रवाल के शब्दों में :{{quote|"...निश्चय ही राजकपूर इसके माध्यम से (बाजार) लूटने के लिए नहीं, अपने कलाकार की मुक्ति की उद्दाम आकांक्षा से उद्वेलित होकर निकले थे।... एक निर्देशक और एक कलाकार के रूप में राजकपूर ने अपनी जिन्दगी का सब-कुछ 'जोकर' को दिया। एक निर्माता के रूप में उन्होंने अंगरेजी की 'लेफ्ट नो स्टोन अनटर्न्ड' कहावत चरितार्थ की। 'मेरा नाम जोकर' राजकपूर के सपनों का एक ऐसा तमाशा था जिसे वह एक साथ कलात्मक और व्यावसायिक ऊँचाइयों तक पहुँचाना चाहते थे।... 'जोकर' असफल हो गयी। राजकपूर की जिन्दगी का सबसे बड़ा सपना मिट्टी में मिल गया। वह सपना जिसके लिए उसने अपना पूरा अस्तित्व दाँव पर लगा दिया था। इस सब के बावजूद 'जोकर' राजकपूर की महानतम कलाकृति है जिसमें उसने अपने व्यक्तित्व, अपने रचनात्मक कौशल और कलाकार की पीड़ा को अत्यन्त मार्मिक और सघन अभिव्यक्ति दी है।"<ref>{{cite book |last1=प्रहलाद |first1=अग्रवाल |title=राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना |date=2007 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |isbn=978-81-267-1405-6 |pages=147, 151, 154 |edition=प्रथम (परिवर्धित)}}</ref>}} फिल्म विशेषज्ञ एवं लेखक प्रदीप चौबे ने संस्मरणात्मक शैली में लिखा है कि "...1970 में ''मेरा नाम जोकर'' देख चुका था। वह भी मजबूरी में। ''..जोकर'' के साथ ही बाजार में उतरी थी-- ''[[जॉनी मेरा नाम (1970 फ़िल्म)|जॉनी मेरा नाम]]''। ठीक ''..जोकर'' के साथ ही रिलीज हुई थी। ''जॉनी..'' की धूम मची हुई थी। फिर [[देव आनन्द|देव]] हमारा सुपर हीरो। ''जॉनी..'' ने ''..जोकर'' को पछाड़ दिया था। [[रायपुर]] (छत्तीसगढ़) में दोनों फिल्में आमने-सामने लगी थीं। ''जॉनी मेरा नाम'' का टिकिट जब ब्लैक में भी नहीं मिला तो मन मारकर दोस्तों का टोला ''..जोकर'' में घुसा। टिकिट खिड़की खाली पड़ी थी। टिकिट लेकर हॉल में घुसे तो वह भी खाली पड़ा था, बहुत निराशा हुई।... बहुत अन्यमनस्क मूड में हम लोग ''..जोकर'' में घुसे थे परंतु पौने चार घंटे की यह फिल्म देखने के बाद जब हम लोग हॉल से बाहर निकले तो राजकपूर लगातार मेरे भीतर-बाहर थे। रायपुर से अपने कस्बे की दो घंटों की बस यात्रा में ''..जोकर'' मेरे भीतर से निकलने को तैयार न था। फिल्म की कहानी, विदूषक का जीवन-दर्शन, भव्य फिल्मांकन, महान करुणा प्रधान संगीत, उदासी भर देने वाली टेक्नीकल रंग-प्रस्तुति आदि सभी तत्वों ने मुझे झकझोर दिया। ''..जोकर'' के माध्यम से राजकपूर ने मेरी फिल्म चेतना पर हमला कर दिया था। लगभग सप्ताह भर मैं ''..जोकर'' की खुमारी में रहा। राज कपूर एक झटके में मेरी समझ में आ गए। वह अचानक ही मेरे लिए [[दिलीप कुमार|दिलीप]] और देव से बहुत बड़े हो गए।... रायपुर में ''..जोकर'' देखने के एक सप्ताह बाद यह मेरे लिए एक सुखद प्रसंग हुआ कि रायपुर के सिनेमा हॉल से उतरकर फिल्म मेरे छोटे से कस्बे की टूरिंग टॉकीज में लगी।... फिल्म वहाँ सिर्फ दस दिनों के लिए आई थी।... आप इसे मेरा अतिरेक कहें या पागलपन कि लगातार मैंने और दोस्तों ने हर रात वह फिल्म, टाइटल्स से लेकर दी एण्ड तक बिलानागा देखी। हर शो उसी तन्मयता से, उसी मुग्धता से और हर बार किसी नयी खोज के साथ। संक्षेप में यह कि यहीं से, बिल्कुल यहीं से राजकपूर मेरा महानायक बना।"<ref>प्रदीप चौबे, हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक, पूर्ववत्, पृष्ठ-121-122.</ref><ref>{{cite book |last1=प्रहलाद अग्रवाल |first1=(सं॰) |title=हिंदी सिनेमा : आदि से अनंत..., भाग 1 |date=2014 |publisher=साहित्य भंडार |location=50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद |isbn=978-81-7779-354-3 |pages=195-196 |edition=प्रथम}}</ref> 'आवारा', 'श्री 420' तथा 'मेरा नाम जोकर' राज कपूर के सृजन के तीन शिखर भी हैं तथा उनके जीवन-दर्शन को प्रस्तुत करने के महत्वाकांक्षी माध्यम भी। यही कारण है कि राज कपूर ने 'आवारा' तथा 'श्री 420' इन दोनों फिल्मों को किसी न किसी रूप में मेरा नाम जोकर से सम्बद्ध किया है। 'मेरा नाम जोकर' में 'आवारा' का प्रसिद्ध गीत 'आवारा हूँ' दोहराया गया है तथा 'श्री 420' के कई दृश्यों की झलक दिखलायी गयी है। इसलिए 'मेरा नाम जोकर' को समझने के लिए यह आवश्यक है कि उसे देखने से पहले 'श्री 420' को अवश्य देख लिया गया हो। 'मेरा नाम जोकर' जब रिलीज हुई तो इसका रनिंग टाइम 4 घंटे 43 मिनट था।<ref>हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक, पूर्ववत्, पृष्ठ-328.</ref> दो सप्ताह बाद ही इसे संपादित कर 4 घंटे 9 मिनट का किया गया और बाद में इसे काफी छोटा कर लगभग 3 घंटे (178 मिनट) का संस्करण तैयार किया गया। 1986 में पुनः संपादित यह संस्करण व्यवसाय की दृष्टि से बहुत सफल रहा। इसमें सबसे अधिक फुटेज तीसरे भाग के ही काटे गये थे।<ref name="चौकसे" /> कहानी तो वही थी, सिर्फ दूसरे और तीसरे भाग की लंबाई कम हो गयी थी। इन सोलह सालों में 'जोकर' की महानता और तकनीकी गुणवत्ता के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका था और जनता को लगा कि हमने अपने प्रिय राजू के साथ इंसाफ नहीं किया है। फिल्मों से प्रत्यक्षतः जुड़े सुप्रसिद्ध लेखक जयप्रकाश चौकसे के अनुसार :{{quote|"युवा पीढ़ी के दर्शकों ने तुलना कर देखा और उन्हें अपनी पीढ़ी के फिल्मकार इस 'प्यारे बूढ़े जोकर' के सामने बहुत फीके लगे।"<ref name="चौकसे">{{cite book |last1=जयप्रकाश |first1=चौकसे |title=राजकपूर : सृजन प्रक्रिया |date=2010 |publisher=राजकमल प्रकाशन |location=नयी दिल्ली |isbn=978-81-267-1957-0 |page=54 |edition=प्रथम (संशोधित-परिवर्धित)}}</ref>}} हिन्दी सिनेमा में दो असफलताओं की बड़ी हसरत से चर्चा की जाती है। [[गुरुदत्त]] की '[[कागज़ के फूल (1959 फ़िल्म)|कागज के फूल]]' और राज कपूर की '[[मेरा नाम जोकर]]'। ये दोनों ही फिल्में इनकी सबसे महत्त्वाकांक्षी फिल्में थीं जिन्हें दर्शकों ने नकार दिया। लेकिन दो-दो पीढ़ियाँ गुजर जाने के बावजूद वे आज भी मौजूद हैं। उन्हीं दर्शकों को, उनकी अगली पीढ़ी को अचंभित कर रही हैं। आनंदित कर रही हैं।<ref>हिंदी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक ([[वसुधा|प्रगतिशील वसुधा]], अंक-81, अप्रैल-जून, 2009; {सिनेमा विशेषांक}), संपादक- प्रहलाद अग्रवाल, (पुस्तक रूप में 'साहित्य भंडार', 50, चाहचंद रोड, इलाहाबाद से प्रकाशित) पृष्ठ-327.</ref>
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