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==गरीबी व छुवाछूत के विरुद्ध संघर्ष== 1945 में रिहा होने के बाद इन्होंने स्वंतंत्र आंदोलनों के साथ-साथ [[दलित]] [[उद्धार]] , छुआ-छूत उन्मूलन व डोला-पालकी जैसी पुरानी परम्पराओं को समाप्त करने के लिए भी व्यापक जन-जागरण के कार्यक्रम चलाये. छुआ-छूत को कप्तान नौटियाल पहले से ही नहीं मानते थे , इसका स्पष्ट उदाहरण उनके साथियों में सभी वर्गों के प्रतिनिधत्व की मौजूदगी से मिलता है. उन्होंने व उनके साथियों ने कई बार स्थानीय हरिजनों के घरों शरण ली , भोजन किया व रास्ते में ही रात पड़ जाने पर इनकी छतों के नीचे ही रात बिताई . यधपि इनको जानने वाले इन्हें आदर से पंडित जी कह कर भी बुलाते थे , किन्तु ये कप्तान नौटियाल कहलाना अधिक पसंद करते थे . 1946 में राम प्रसाद जी व उनके साथियों द्वारा दुगड्डा में एक विशाल सम्मलेन आयोजित किया गया , जिसमे [[गोविन्द बल्लभ पन्त]] , नरदेव सिंह शास्त्री , बद्री दत्त पांडेय , काशीपुर नरेश कुंवर आनंद सिंह आदि प्रमुख हस्तियों ने शिरकत की। इस मीटिंग में क्षेत्र में अकाल की स्थिति पर चिंता प्रकट की गयी, जमाखोरी पर लगाम लगाम के लिए प्रशासन के ईमानदार ऑफिसर्स के साथ मिलकर करीब 52 समूह खोले गए, इसके बाद राम प्रसाद नौटियाल व साथियों ने अंग्रेज समर्थक बनियों को खूब आड़े हाथों लिया उनके दिमाग को ठिकाने लगा कर स्थानीय छोटे व मंझोले व्यापारियों के लिए बाज़ार में प्रतिभागिता का रास्ता खोल दिया , जिससे तत्कालीन [[अकाल]] से त्रस्त जनता को कुछ राहत मिली.
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