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=== करार को कानून द्वारा प्रवर्तनीय बनाए जाने का गुण === भारतीय संविदा अधिनियम 1872 ई. की धारा 10 के अनुसार ऐसे सभी करार संविदा माने गए हैं जो (1) करार करने योग्य पक्षों की (2) स्वतंत्र सहमति से किए जाए, (3) जिनका प्रतिफल और उद्देश्य वैध हो और जो (4) उक्त अधिनियम द्वारा निसत्व (Void, प्रभावहीन) न घोषित किए गए हों। इसी धारा में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि उपर्युक्त परिभाषा का प्रभाव ऐसे किसी कानून पर नहीं पड़ेगा, (5) जिसके द्वारा किसी संविदा का लिखित, या पंजीकृत साक्षियों की गवाही के साथ होना आवश्यक है। ==== योग्य पक्ष ==== ऐसे सभी व्यक्ति संविदा करने योग्य माने जाते हैं जो व्यस्क हों, स्वस्थ मस्तिष्कवाले हों और किसी कानून द्वारा संविदा करने के अयोग्य न ठहराए गए हों। फलस्वरूप (1) अवयस्क, (2) विकृत मस्तिष्कवाले व्यक्ति या उन्मत्त (Lunatic), जड़बुद्धि (Idiot) तथा नशे में चूर रहनेवाले, (3) और ऐसे व्यक्ति जो कानून द्वारा संविदा करने के '''अयोग्य''' ठहराए गए हों, यथा विदेशी शत्रु, विदेशी सम्राट् अथवा उनके प्रतिनिधि, देश के शत्रु, अपराधी आदि संविदा नहीं कर सकते। अवस्यक व्यक्ति स्वतंत्र बुद्धि से अपने लाभ हानि का निर्णय नहीं कर सकता। अत: वह संविदा करने योग्य नहीं माना गया है। विकृत मस्तिक वाले व्यक्तियों में अगर विकृति अस्थायी हो हृ यानी कभी मस्तिष्क वाले व्यक्तियों में अगर विकृति अस्थायी हो हृ यानी कभी मस्तिष्क विकृत और कभी स्वस्थ रहता हो हृ तो ऐसे व्यक्ति विकृतिकाल में तो नहीं परन्तु मस्तिष्क की स्वस्थता के काल में संविदा का योग्य पक्ष हो सकते हैं1 अपराधी का दंडभोग के समय संविदा करने का अधिकार निलम्बित हो जाता है परन्तु दंडभोग या क्षमाप्राप्ति के पश्चात् उसे संविदा करने की क्षमता पुन: प्राप्त हो जाती है। दिवालिया घोषित व्यक्ति भी संविदा करने की योग्यता से वंचित माना जाता है। ==== स्वतंत्र सहमति ==== संविदा के पक्षों की सहमति का स्वतंत्र होना संविदा की एक प्रमुख आवश्यकता है। यदि सहमति स्वतंत्र नहीं है तो संविदा उससे प्रभावित होगी। सहमति उस दशा में स्वतंत्र मानी जाती है जब यह 1. बलप्रवर्तन या त्रास (Coercion), 2. अवांछित प्रभाव (Undue Infuence), 3. छलकपट (Fraud), 4. भ्रांत कथन, या भ्रांति द्वारा प्रभावित नहीं हुई हो और न प्राप्त की गई हो। ===== '''बलप्रवर्तन या त्रास''' ===== बलप्रवर्तन या त्रास की परिभाषा भारतीय संविदा अधिनियम की धारा में दी गई है। उसके अनुसार बलप्रवर्तन या त्रास के चार रूप है : (१) भारतीय दंड विधान द्वारा वर्जित और दंडनीय कार्य करना या (२) करने की धमकी देना, चाहे उस स्थान पर जहाँ यह कार्य किया जाए भारतीय दंड विधान लागू हो या नहीं, (३) किसी भी व्यक्ति की सम्पत्ति अवैध रूप से रोक रखना; अथवा (४) रोक रखने की धमकी देना। इस बलप्रवर्तन या त्रास का उद्देश्य किसी व्यक्ति को संविदा का पक्ष बनाना ही होना चाहिए। ===== अवांछित प्रभाव ===== अवांछित प्रभाव की परिभाषा संविदा अधिनियम की धारा 16 में दी गई है। उसके अनुसार वह संविदा अवांछित प्रभाव द्वारा प्रेरित कही जाती है जिसके पक्षों के सम्बन्ध ऐसे हों कि एक पक्ष दूसरे पक्ष की इच्छा से अपनी उस विशिष्ट स्थिति का प्रयोग करे। माता पिता और बच्चे, अभिभावक और पाल्य (वार्ड), वकील ओर मुवक्किल, डाक्टर और रोगी, गुरु और शिष्य आदि के सम्बन्ध ऐसे ही होते हैं जिनमें प्रथम पक्ष दूसरे की इच्छाओं को अपने विशिष्ट सम्बन्ध के कारण प्रेरित करता है। अवांछित प्रभाव सिद्ध करने के लिए यह भी सिद्ध करना आवश्यक है कि वस्तुत: विशिष्ट स्थितिवाले पक्ष के दूसरे पक्ष पर अपनी विशेष स्थिति का प्रयोग अपने अनुचित लाभ के लिये किया। यदि यह बात सिद्ध नहीं होती तो केवल विशिष्ट स्थिति के ही कारण कोई संविदा अवांछित प्रभाव द्वारा प्रभावित या परित्याज्य नहीं समझी जाएगी। ===== छलकपट ===== यह संविदा अधिनियम की धारा 17 में वर्णित है। उसके अनुसार संविदा के किसी पक्ष द्वारा या उसकी साजिश से या उसके अभिकर्ता (agent) द्वारा दूसरे पक्ष या उसके अभिकर्ता को धोखा देने या छलने या संविदा से सम्मिलित होने के लिये प्रेरित करने के हेतु निम्नांकित कार्य छलकपट कहलाएँगे : क) किसी असत्य बात को, जिसकी सत्यता में उसे विश्वास न हो, तथ्य बतलाना, ख) ऐसे तथ्य को छिपाना जिसका उसे ज्ञान या विश्वास न हो; ग) ऐसा वचन देना जिसे पूरा करने की इच्छा न हो; घ) ऐसा कार्य करना या उससे विरत होना जिसे कानून विशेष रूप से छलकपट घोषित करता हो; ङ) धोखा देने लायक अन्य कार्य करना। ===== '''भ्रांति''' ===== करार के सम्बनध में विचार करते हुए यह कहा गया है कि उभय पक्ष के बीच मानसिक मतैक्य का होना आवश्यक है। भ्रांति इसी से सम्बन्धित दोष है। इसमें एक पक्ष एक वस्तु या बात और दूसरा पक्ष दूसरी वस्तु या बात समझता है। फलस्वरूप ऊपरी ढंग से देखने में तो संविदा का निर्माण प्रतीत होता है परन्तु भ्रांति के कारण वस्तुत: कोई संविदा होती नहीं है। ये भ्रांतियाँ कई प्रकार की होतीं हैं। विषयसामग्री के सम्बन्ध में भ्रांति का उदाहरण पूर्वप्रसंग में शेवरलेट और फोर्ड मोटर कारों के द्वारा दिया गया है। इसी प्रकार संविदा के पक्ष की पहचान में भी भ्रांति सम्भव है। "क" ने जिसे "ख" समझकर संविदा की यदि वह वस्तुत: "ख" नहीं वरन् "ग" था तो यह पक्ष की पहचान की भ्रांति है। संविदा की प्रकृति या अर्थ सम्बन्धी भी भ्रांति हो सकती है। अगर किसी बाद का एक पक्ष बाद में अवसर लेने का आवेदन पत्र बताकर किसी सन्धिपत्र पर दूसरे पक्ष का हस्ताक्षर करा लेता है तो दूसरे पक्ष को संविदा के रूप या प्रकृति के विषय में भ्रांति होती है। ऐसी दशा में हस्ताक्षर बनानेवाले का मस्तिष्क उसके हस्ताक्षर के साथ नहीं है। ==== प्रतिफल एवं उद्देश्य वैध होना चाहिए ==== प्रसंविदा के लिये प्रतिफल एक आवश्यक तत्व है। बिना प्रतिफल के कोई प्रसंविदा नहीं हो सकती; और यदि वह हो भी तो नि:सत्व या अवैध होती है। प्रतिफल भी वैध होना चाहिए। उदाहरण स्वरूप "अ", "ब" को "स" की हत्या के लिए 5000 रु. देता है और "ब" हत्या के लिए वचन देता है। यहाँ यह संविदा नि:सत्व है क्योंकि इसका प्रतिफल हत्या कानून द्वारा वर्जित है। इस प्रकार निम्नलिखित प्रकार के प्रतिफल अवैध होते हैं - 1. ऐसे प्रतिफल जो कानून वर्जित हैं। यदि कोई प्रतिफल स्पष्टया या सांकेतिक रूप से कानून द्वारा वर्जित हो तो उसके आधार पर निर्मित प्रसंविदा नि:सत्य होती है। यह उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगा। 2. यदि कोई ऐसा प्रतिफल हो जिससे किसी अधिनियम की कोई व्यवस्था भंग होती हो या निष्फल होती हो तो वह प्रतिफल अवैध माना जाएगा। 3. जो प्रतिफल कपटपूर्ण होते हैं, वे अवैध समझे जाते हैं। 4. वह प्रतिफल जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के शरीर या सम्पत्ति को हानि पहुँचती हो अवैध होता है। उदाहरण के लिये अ एक समाचारपत्र के सम्पादक को पाँच सौ रुपया देने का वचन देता है यदि सम्पादक ब के सम्बन्ध में अपमानजनक विवरण छापे। यहाँ प्रतिफल अवैध है क्योंकि इससे ब की प्रतिष्ठा पर आघात पहुँचता है। 5. ऐसे प्रतिफल जो अनैतिक होते हैं, अवैध हैं। 6. लोकनीति के विरुद्ध प्रतिफल अवैध होते हैं, जैसे शत्रु के साथ व्यापार करना। लोकसेवा को हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति रखनेवाली संविदा, दंडनीय अपराधों से सम्बन्धित मुकदमों का गला घोटनेवाली संविदा नि:सत्व होती है। वैधानिक कार्रवाई का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति रखनेवाली संविदा, ऐसी संविदा जौ नैतिकता के विरुद्ध हो, या व्यापारनिरोधक संविदा या किसी जो नैतिकता के विरुद्ध हो, या व्यापारनिरोधक संविदा या किसी व्यवस्क व्यक्ति को शादी करने से रोकने के लिए संविदा, इत्यादि भी लोकनीति के विरुद्ध एवं नि:सत्व होतीं हैं। उद्देश्य एवं प्रतिफल में से एक का भी अवैध होना संविदा को नि:सत्व कर देता है। यदि संविदा का उद्देश्य अंशत: अवैध हो तब भी संविदा नि:सत्व हो जाती है, यदि उसके अवैध अंश को वैध अंश से पृथक् न किया जा सके। यदि प्रतिफल या उद्देश्य का अवैध अंश वैध अंश से अलग किया जा सके तो वैध अंश प्रवर्तनीय होगा और अवैध अंश नि:सत्व होगा। जैसे "ब" ने "अ" को एक प्रतिज्ञापात्र द्वारा 2000 रुपए देने का वचन दिया जिनमें से 1500 रुपए पुराना ऋण था और 500 रुपए जुए में हारी रकम थी। इसमें वैध भाग का अवैध भाग से पृथक् किया जा सकता है; अतएव यह प्रतिज्ञापत्र 1500 रुपए के लिये मान्य होगा किन्तु 500) के लिये नि:सत्व होगा। ==== नि:सत्व घोषित न होना ==== भारतीय संविदा अधिनियम के अन्तर्गत नि:सत्व घोषित करार कानून द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हो सकते, यद्यपि उसमें संविदा के अन्य तत्व पूर्णत: विद्यमान भी हों। इस कोटि में निम्नांकित करार आते हैं : १) त्रुटि या भ्रांति द्वारा प्रभावित करार; 2. अवयस्क के साथ किया गया करार; 3. प्रतिफलविहीन करार; 4. व्यस्क का विवाह रोकनेवाला संविदा करार; 5. व्यापारनिरोधक करार; 6. वैध कार्रवाई को रोकनेवाला करार; 7. अनिश्चित करार; 8. असंभव कार्यो को करने के लिये किया गया करार; 9. पण विषयक (wagery) करार; 10. असम्भव घटनाओं के घटित होने पर संभावित करार; 11. अवैध प्रतिफल या उद्देश्यवाले करार। ==== करार का लिखित, पंजीकृत एवं साक्षियों के समक्ष होना ==== सभी करार और संविदाओं के लिये लिखित, पंजीकृत और गवाहों की गवाही से युक्त होना आवश्यक नहीं है परन्तु ऐसी संविदा अन्य सब गुणों के रहते हुए भी इन औपचारिकताओं के अभाव के कारण मान्य नहीं होती।
सारांश:
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