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{{स्रोतहीन|date=सितंबर 2014}} [[तन्त्र|तंत्रशास्त्र]] की दृष्टि से '''अधिकार''' शब्द का मूल्य साधनात्मक है। साधना में प्रवेश पाने के लिए जिस योग्यता, क्षमता की प्राप्ति आवश्यक होती है, उसे अधिकार कहते हैं। इनसे तत्वज्ञान आदि मोक्ष का अधिकार मिलता है। सार्वजनिक और सार्वदेशिक शास्त्र तंत्र विभिन्न साधनक्रमों, अंतर्यांग, बहिर्यांग, षट्कर्म, ध्यानयोग आदि के अधिकारों का विधान मानव कल्याण के लिए ही करते हैं। तांत्रिक साधक पशु, वीर, दिव्य भावों के द्वारा महाशक्ति की अर्चना करता हुआ सकल ब्रह्म के शक्तिस्वरूप को अनादि चेतन और आनंदरूप समझकर आत्मविवेक की उपलब्धि करता है। वामकेश्वरतंत्र के अनुसार जन्म से 16 वर्ष तक पशुभाव, 50 वर्ष तक वीरभाव और आगे का समय दिव्य भाव का होता है। अधिकारार्थ दीक्षाग्रहण, अभिषेक आदि संस्कार शिष्य के लिए अपरिहार्य हैं। लोकधर्मी और शिवधर्मी, बुभुक्षु और मुमुक्षु, शैक्ष और अशैक्ष (बौद्ध) आदि के अधिकारवैचित्र्य एवं शक्तिपात की तीव्रता के अनुसार दीक्षा के भी विभिन्न भेद होते हैं। अधिकार के 21 संस्कारों के उपरांत शाकाभिषेक, पूर्णाभिषेक, महासाम्राज्याभिषेक आदि की विधि संपन्न होती है। अंत में सर्वांगीण अधिकार के लिए आचार्याभिषेक होता है जिसके बिना दीक्षा देने का अधिकार नहीं मिलता। विवृति के लिए स्वच्छंदतंत्र देखा जा सकता है। अधिकार और साधकभेद से पंचमकारों में भी अर्थभेद मिलता है। बौद्ध तंत्रों में भी इस अधिकारभेद का विस्तार मिलता है। अधिकार निर्णय में शैथिल्य के कारण तांत्रिक साधनाओं को कालांतर में आपाततः निंदित होना पड़ता है। [[श्रेणी:हिन्दू धर्म|अधिकार]] [[श्रेणी:दर्शन|अधिकार]] [[श्रेणी:चित्र जोड़ें]]
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