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{{स्रोतहीन| date = दिसम्बर 2014}} '''उपासना''' [[परमात्मा]] की प्राप्ति का साधनविशेष। 'उपासना' का शब्दार्थ है - 'अपने इष्टदेवता की समीप (उप) स्थिति या बैठना (आसन)'। [[शंकराचार्य|आचार्य शंकर]] की व्याख्या के अनुसार 'उपास्य वस्तु को शास्त्रोक्त विधि से बुद्धि का विषय बनाकर, उसके समीप पहुँचकर, तैलधारा के सदृश समानवृत्तियों के प्रवाह से दीर्घकाल तक उसमें स्थिर रहने को उपासना कहते हैं' ([[श्रीमद्भगवद्गीता|गीता]] 12.3 पर शांकर भाष्य)। उपासना के लिए व्यक्त तथा अव्यक्त दोनों आधार मान्य हैं, परंतु अव्यक्त की उपासना में अधिकतर क्लेश होता है और इसीलिए गीता (12.5) व्यक्तोपासना को सुलभ, सद्य: फलदायक तथा सुबोध मानती है। जीव वस्तुत: शिव ही है, परंतु अज्ञान के कारण वह इस प्रपंच के पचड़े में पड़कर भटकता फिरता है। अत: ज्ञान के द्वारा अज्ञान की ग्रंथि का उन्मोलन कर स्वशक्ति की अभिव्यक्ति करना ही उपासना का लक्ष्य है जिससे जीव की दु:ख प्रपंच से सद्य: मुक्ति संपन्न होती है (अज्ञान ग्रंथिभिदा स्वशक्त्याभिव्यक्तता मोक्ष: - [[परमार्थसार]], कारिका 60)। साधारणतया दो मार्ग उपदिष्ट हैं - ज्ञानमार्ग तथा भक्तिमार्ग। ज्ञान के द्वारा अज्ञान का नाश कर जब परमतत्व का साक्षात्कार संपन्न होता है, तब उस उपासना को ज्ञानमार्गीय संज्ञा दी जाती है। भक्तिमार्ग में भक्ति ही भगवान् के साक्षात्कार का मुख्य साधन स्वीकृत की जाती है। भक्ति ईश्वर में सर्वश्रेष्ठ अनुरक्ति (सा परानुरक्तिरीश्वरे-शांडिल्यसूत्र) है। सर्वसाधारण के लिए ज्ञानमार्गी कठिन, दुर्गम तथा दुर्बोध होता है (क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत् कवयो वदन्ति-कठ. 1.3.14)। भागवत (10.14.4) ने ज्ञानमार्गीय अपासना को भूसा कूटने के समान विशेष क्लेशदायक बतलाया है। अधिकारी भेद से दोनों ही मार्ग उपादेय तथा स्वतंत्र रूप से फल देनेवाले हैं। उपासना में गुरु की बड़ी आवश्यकता है। गुरु के उपदेश के अभाव में साधक अकर्णधार नौका के समान अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने में कथमपि समर्थ नहीं हाता। गुरु 'दीक्षा' के द्वारा शिष्य में अपनी शक्ति का संचार करता है। दीक्षा का वस्तविक अर्थ है उस ज्ञान का दान जिससे जीवन का पशुत्वबंधन कट जाता है और वह पाशों से मुक्त होकर शिवत्व प्राप्त कर लेता है। अभिनवगुप्त के अनुसार दीक्षा का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है : ;दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयते पशुबंधना। ;दान-क्षपणासंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता।। -- (तंत्रालोक, प्रथम खंड, पृ. 83) श्रीवैष्णवों की उपासना पाँच प्रकार की मानी गई है-अभिगमन (भगवान के प्रति अभिमुख होना), उपादान (पूजार्थ सामग्री), इज्या (पूजा), स्वाध्याय (आगम ग्रंथों का मनन) तथा योग (अष्टांग योग का अनुष्ठान)। [[श्रेणी:भारतीय दर्शन]] [[श्रेणी:धर्म]]
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