सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
किला
" सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
[[चित्र:Ram Pol.jpg|right|thumb|300px|राजस्थान के '''कुम्भलगढ़ का क़िला''' - यह एशिया के सबसे बड़े क़िलों में से एक है।]] शत्रु से सुरक्षा के लिए बनाए जानेवाले [[वास्तुकला|वास्तु]] का नाम '''क़िला''' या '''दुर्ग''' है। इन्हें 'गढ़' और 'कोट' भी कहते हैं। दुर्ग, पत्थर आदि की चौड़ी दीवालों से घिरा हुआ वह स्थान है जिसके भीतर राजा, सरदार और सेना के सिपाही आदि रहते है। नगरों, सैनिक छावनियों और राजप्रासादों सुरक्षा के लिये क़िलों के निर्माण की परंपरा अति प्राचीन काल से चली आ रही है। आधुनिक युग में युद्ध के साधनों और रण-कौशल में वृद्धि तथा परिवर्तन हो जाने के कारण क़िलों का महत्व समाप्त हो गया है और इनकी कोई आवशकता नहीं रही। == परिचय एवं इतिहास == वैदिककालीन साहित्य में पुरों का जिस रूप में उल्लेख है उससे ज्ञात होता है कि उन दिनों दुर्ग से घिरी बस्तियाँ हुआ करती थीं। [[ऋग्वेद]] तक में दुर्ग का उल्लेख है। दस्युओं के ९६ दुर्गों को [[इन्द्र|इंद्र]] ने ध्वस्त किया था। [[मनु]] ने छह प्रकार के दुर्ग लिखे हैं- : ''धन्वदुर्गं महीदुर्गम् अब्दुर्गं वार्क्षम् एव वा। : ''नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत् पुरम् ॥ : ''सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत्। : ''एषां हि बाहुगुण्येन गिरिदुर्गं विशिष्यते ॥'' (मनुस्मृति ७.७०–७१) * (१) धनुदुर्ग, जिसके चारों ओर निर्जल प्रदेश हो, * (२) महीदुर्ग, जिसके चारो ओर टेढ़ी मेढ़ी जमीन हो, * (३) जलदुर्ग (अब्दुर्ग), जिसके चारों ओर जल हो, * (४) वृक्षदुर्ग, जिसके चारो ओर घने वृक्ष हों, * (५) नरदुर्ग जिसके चारों ओर सेना हो, और * (६) गिरिदुर्ग, जिसके चारों ओर पहाड़ हो या जो पहाड़ पर हो। [[महाभारत]] में [[युधिष्ठिर]] ने जब [[भीष्म]] से पूछा है कि राजा को कैसे पुर में रहना चाहिए तब भीष्म जी ने ये ही छह प्रकार के दुर्ग गिनाए हैं और कहा है कि पुर ऐसे ही दुर्गों के बीच में होना चाहिए। [[मनुस्मृति]] और महाभारत दोनों में कोष, सेना, अस्त्र, शिल्पी, ब्राह्मण, वाहन, तृण, जलाशय अन्न इत्यादि का दुर्ग के भीतर रहना आवश्यक कहा गया है। [[अग्निपुराण]], [[कल्कि पुराण|कल्किपुराण]] आदि में भी दुर्गों के उपर्युक्त छह भेद बतलाए गए हैं। पुरातात्विक उत्खनन से [[मोहन जोदड़ो|मोहनजोदड़ो]], हड़प्पा, रूपड़ आदि पुरा-ऐतिहासिक नगरों के जो अवशेष प्रकाश में आए हैं उनसे ज्ञात होता हैं कि उन दिनों नगरों के दो खंड होते थे; एक खंड ऊँचे प्राचीरों से घिरा होता था। ऐतिहासिक काल के क़िले के प्राचीनतम अवशेष [[राजगृह]] में पत्थरों से बने प्राचीर के रूप में प्राप्त हुए हैं। [[पाटलिपुत्र]] के क़िले के जो कुछ थोड़े से चिह्न मिले हैं, उनसे ऐसा जान पड़ता हैं कि प्राचीरों के निर्माण में लकड़ी का प्रयोग किया गया था। [[मौर्य राजवंश|मौर्यकाल]] में [[मेगस्थनीज|मेगास्थनीज]] नामक जो यवन राजदूत आया था उसने इस क़िले का विशद वर्णन किया हैं। उसने लिखा है कि पाटलिपुत्र नगर नौ मील लंबा और लगभग दो मील चौड़ा है जो चारों ओर 600 हाथ चौड़ी और 30 हाथ गहरी खाँईं से घिरा है। इसके चारों ओर काठ की सुदृढ़ दीवार बनाई गई है जिसमें 500 बुर्ज हैं और 64 मजबूत फाटक लगे हैं। [[कौशाम्बी जिला|कौशांबी]] के उत्खनन में क़िले की दीवार के जो अंशप्रकाश में आए हैं, वे पक्की ईटों से जड़े हुए हैं। [[राजघाट समाधि परिसर|राजघाट]] ([[वाराणसी]]) के उत्खनन में गंगा के किनारे कच्ची मिट्टी के ठोस प्राचीर के अंश प्रकाश में आए थे। किंतु इन सबसे प्राचीन क़िलों का पूर्ण स्वरूप सामने नहीं आता। [[ऐरण|एरण]] (जिला [[सागर]], [[मध्य प्रदेश]]) में, जो गुप्त काल में एक प्रसिद्ध नगर था, काफी दूर तक दुर्ग के अवशेष मिले हैं। उनके अध्ययन से ज्ञात होता है कि उस नगर को इस प्रकार बसाया गया था कि नदियाँ खाईं का काम दें। तीन ओर से वह [[बीना नदी|वीणा नदी]] से घिरा हुआ था, चौथी ओर दो अन्य छोटी नदियाँ थीं, जो नगर के पश्चिमी भाग में बहती थीं और चौथी ओर वीणा नदी में गिरती थीं। नदियों द्वारा बने इस प्राकृतिक खाई के भीतर दुर्ग का प्राचीर था जो कदाचित् एकदम खड़ी दीवारों से बना था और उनमें ऊँची गोल बुर्जियाँ रही होगी। [[चाणक्य|कौटिल्य]] के [[अर्थशास्त्र]] के अनुसार छोटे क़िलों को संग्रहण, उनसे बड़े को द्रोणमुख और सबसे बड़े क़िलों के दो रूप बताए गए हैं- :(1) '''अकृत्रिम''', अर्थात् जल, पर्वत, वन आदि से सुरक्षित और :(2) '''कृत्रिम''', ईंट पत्थर आदि से बने। [[सोमेश्वर चौहान|सोमेश्वररचित]] [[मानसोल्लास]] में दुर्गों के निम्नलिखित ८ प्रकार बताये गये हैं- : ''जलदुर्ग (water-fort), गिरिदुर्ग (mountain-fort), पाषाणदुर्ग (stone-fort), इष्टिकादुर्ग (brick-fort), मृत्तिकादुर्ग (earthen-fort), वनदुर्ग (forest-fort), मरुदुर्ग (desert -fort), दारुदुर्ग (wooden-fort), नरदुर्ग (man-fort)। [[साम्रज्यलक्ष्मीपीठिका]] में नौ प्रकार के दुर्गों की विशेषताएँ (लक्षणम्) दिये गये हैं। : ''गिरिदुर्गलक्षणम्, वनदुर्गलक्षणम्, गह्वरदुर्गलक्षणम्, जलदुर्गलक्षणम्, पंकदुर्गलक्षणम्, मिश्रदुर्गलक्षणम्, नृदुर्गलक्षणम्, कोष्ठदुर्गलक्षणम् (अध्याय ३३ में) [[शिल्पशास्त्र]] के अन्य ग्रंथों में इनका विस्तृत रूप में निम्नलिखित समूहों में विभाजन किया गया है- :1. '''पर्वतीय दुर्ग''' :: नगरदुर्ग (क) प्रातंर (ख) गिरिसमीपक तथा (ग) गुहादुर्ग :2. '''जलदुर्ग''' ::(क) अंतर्द्वीपीय (ख) स्थलदुर्ग :3. '''धान्वनदुर्ग''' ::(क) निरूदक (ख) ऐरण :4. '''वनदुर्ग''' ::(क) खाजन (ख) स्तंब गहन :5. '''महीदुर्ग''' ::(क) पारिध (ख) पंक तथा (ग) मृद्दुर्ग :6. '''नृदुर्ग''' ::(क) सैन्यदुर्ग (ख) सहायदुर्ग :7. '''मिश्रदुर्ग''' - (पर्वतवन्य) :8. '''दैवदुर्ग''' === मध्यकाल === भारत के मध्यकालीन क़िलों के संबंध में बातें कुछ अधिक विस्तार से ज्ञात होती हैं। सामान्यत: क़िलों की दीवारें बड़ी चौड़ी तथा ऊँची बनाई जाती थीं जिनमें बीच में ऊँची बुर्जे तथा विशाल फाटक होते थे। इस काल के छोटी-छोटी पहाड़ियों पर बनाए गए क़िले बहुत बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। राजस्थान तथा दक्षिणी भारत के क़िले प्राय: पहाड़ियों पर ही बनाए गए हैं और कुछ क़िले मीलों की परिधि में बने हैं, जो क़िले पहाड़ियों पर बने हैं उनमें दोहरी-तीहरी चहारदीवारियाँ हैं। सबसे ऊँची चहारदीवारी के भीतर मुख्य दुर्ग होता था। प्राय: क़िलों की परिधि में नगर तथा मुख्य दुर्ग दोनों ही रहते थे। मुख्य दुर्ग के एक ओर ऊँची पहाड़ी या नदी का किनारा होता था। दुर्गनिर्माण कराते समय उन मार्गों की रक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था जिनसे होकर शत्रु क़िले में आ सकते थे या आक्रमण कर सकते थे। सामान्य रूप से क़िले के निर्माण के लिये किसी ऊँची पहाड़ी को चुना जाता था जिसकी ढालू चट्टानों पर पहुँचना कठिन होता था। जिस ओर से शत्रु के चढ़ आने की आशंका होती थी उस ओर की चट्टानों को काटकर ऐसा ढलवाँ मार्ग बना दिया जाता था जिससे एक ही दीवार द्वारा उसकी रक्षा हो जाती थी और दूसरी पहाड़ी बिल्कुल सीधी और खड़ी होती थी। कहीं-कहीं इन ढलवाँ मार्गों में चार से लेकर सात तक दृढ़ द्वार बने होते थे। क़िलों की बाहरी दीवार समतल भूमि पर बनाई जाती थीं, जिसको चौड़ी और गहरी दीवार की रक्षा खाइयों द्वारा सुरक्षित किया जाता था। यदि क़िला नदी के किनारे स्थित होता तो एक ओर से नदी उसके रक्षा करती थीं और शेष और खाइयाँ। खाइयाँ उठवाँ पुल द्वारा पार की जाती थी, जैसा आगरे के क़िले में है। यदि क़िला पहाड़ी पर होता था तो उसकी बाहरी दीवारों की रक्षा भी इसी प्रकार होती थी, जैसी जिंजी तथा गोलकुंडा में हैं। दौलताबाद के मुख्य क़िले के प्रवेश द्वार की रक्षा गहरी खाइयों द्वारा की जाती थी जिनमें सदैव पानी भरा रहता था। बीदर में नगर के चारों ओर खाइयों के अतिरिक्त क़िलों के रक्षार्थ तेहरी जलदार खाइयाँ बनाई गई थीं। कुछ क़िलों की दीवारों की मोटाई 31 से 35 फीट तक है, विशेषकर उन दीवारों की जो समतल भूमि पर बनाई गई हैं। पहाड़ी क़िलों में पहाड़ी को ढलवाँ बना दिया जाता था। ये दीवारें अंदर तथा बाहर की ओर पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों से बनाई जाती थी और इन दोनों के बीच मार्ग प्राय: मिट्टी से भर दिया जाता था। कुछ क़िलों में दोहरी दीवारें रखी गई थीं जिनके बीच बहुत कम दूरी है और अंदरवाली दीवार से काफी ऊँची है, जैसा गोलकुंडा तथा तुगलकाबाद और आगरा के क़िलों में है। दीवार को गरगजों या बुर्जों द्वारा और भी दृढ़ बना दिया जाता था। क़िले की रक्षा मोर्चा बंदीवाली दीवारों से होती थी। इनमें प्राय: आकार में साढे तीन इंच चौड़े तीन फुट ऊँचे समानांतर झरोखे होते थे। [[चित्तौड़ का किला|चित्तौड़ के कि़ले]] में ये झरोखे 3.5 इंच चौड़े तथा 3 फुट ऊँचे और तुगलकाबाद के क़िले में 6 इंच चौड़े तथा 6 फुट ऊँचे हैं। दिल्ली के पुराने क़िले में झरोखों की तीन और तुगलकाबाद में चार पंक्तियाँ हैं। प्राय: क़िलों में छाती तक ऊँचे परकोटे ईटं द्वारा पुन: निर्मित हुए हैं जिनमें से बहुत से ऊपर की ओर वर्गाकार है जिन्हें संभवत: गोली बरसाने के उद्देश्य से बनाया गया होगा। बीजापुर, फतहपुर सीकरी तथा आगरा जैसे कुछ क़िलों में झरोखों के बाहरी भाग में गोली चलाने के लिए सैनिकों रक्षा के हेतु पत्थर की छतरियाँ बनी हुई हैं। दृढ़ता की दृष्टि से क़िले के फाटकों में भी विभिन्नता दिखाई देती हैं, यद्यपि ये प्राय: बड़े, भारी भरकम एवं दृढ बनाए जाते थे। कुछ क़िलों में तीन-तीन फाटकों की व्यवस्था की गई है जिनके मध्य आँगन भी हैं, जैसे जिंजी तथा दौलताबाद में। दौलताबाद के क़िले में तीनों द्वारों में से सबसे बाहरी द्वार में दो दरवाजे हैं, एक तो प्रवेश के स्थान पर और दूसरा आँगन में खुलता है और इन दोनों के बीच का स्थान मेहराबदार मार्ग बन जाता है। क़िलों के दरवाजे भारी तथा दृढ़ लकड़ी के बनाए जाते थे जो 6 इंच तक मोटे होते थे। पीछे की ओर लकड़ी के मजबूत बेलनों द्वारा दरवाजे को और भी दृढ़ बना दिया जाता था। बाहर की ओर इन लकड़ी के द्वारों पर प्राय: धातु की नुकीली मेखें, जो विभिन्न आकार की तथा 3 इंच से 13 इंच तक लंबी होती थीं, लगाई जाती थीं, ताकि हाथी टक्कर मार मारकर द्वार तोड़ न डालें। दरवाजे के एक पट पर एक खिड़की भी लगा दी जाती थीं जो आकार में 3 फुट चौड़ी तथा 4 फुट ऊँची होती थीं। इस खिड़की में भी नुकीली मेखें ठोंक दी जाती थीं। दरवाजा बंद करने के बाद एक भारी मूसली इस ओर से उस ओर तक हन दी जाती थीं जिससे द्वार बिल्कुल न हिल सकें। [[बीजापुर]] के क़िले के शाहपुर द्वार में तथा अहमदनगर के क़िले में भी यही व्यवस्था थी। क़िले के अवरोध के समय दरवाजे के समक्ष एक भारी जंजीर इस सिरे से उस सिरे तक डाल दी जाती थी। दुर्गों में जल तथा खाद्य सामग्री का पर्याप्त प्रबंध होता था। ठोस चट्टानों का काटकर बड़े बड़े जलकुंड भी बना दिए जाते थे ताकि वर्षाकाल में पानी एकत्र हो जाए और आक्रमण के समय क़िले के निवासियों को पानी की कोई कमी न हो। जीवन की सभी सुविधाएँ इन क़िलों में उपलब्ध रहती थीं और से क़िले छोटे-मोटे सुंदर नगर का रूप धारण किए रहते थे। [[ईस्ट इण्डिया कम्पनी|ईस्ट इंडिया कंपनी]] ने यूरोपीय और भारतीय क़िलों के मिश्रित रूप के क़िले [[चेन्नई|मद्रास]] और [[कोलकाता|कलकत्ता]] में बनवाए थे। === अन्य देशों में === [[चित्र:Kenilworth Castle gatehouse landscape.jpg|riht|thumb|300px|वारविकशायर का केनिलवर्थ दुर्ग]] भारत के बाहर अन्यत्र क़िले का इतिहास अधिक प्राचीन नहीं है। वहाँ क़िले का प्राचीनतम और विशाल रूप चीन की दीवार के रूप में देखने में आता है। ईसा से लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व चिन वंश के सम्राट् शिह-हांग-त्सी ने [[चीन]] देश की सीमा पर चारों ओर एक अत्यंत विशाल, लंबी, चौड़ी और मजबूत प्राचीर का निर्माण आरम्भ कराया था। प्राचीन [[यूनान]] और [[रोम]] में भी क़िलों का निर्माण हुआ था और उनका अपना महत्व था किंतु यूरोप में क़िलों का इतिहास मध्य युग से ही आरम्भ होता है। प्राचीनकाल क़िले नगरों की प्रतिरक्षा के उद्देश्य से बनते थे किन्तु मध्यकालीन क़िले टापुओं, पहाड़ियों, दलदल के मध्य सूखी भूमि एवं अन्य दुर्गम स्थानों पर बनाए जाने लगे। जहाँ कहीं प्राकृतिक प्रतिरक्षा के स्थान प्राप्त नहीं थे, [[खाई]] खोद ली जाया करती थी। पूर्व के देशों के क़िलों ने भी क्रूसेड़ों ([[क्रूसेड|धर्मयुद्धों]]) के सैनिकों को अत्यधिक प्रभावित किया जिसके फलस्वरूप उन्होनें अपने क़िलों की निर्माणविधि में उचित उन्नति की। बारूद के आविष्कार ने यूरोप में क़िलों के निर्माण की आवश्यकताओं में और भी परिवर्तन कर दिए। यूरोप की सामंती प्रथा में क़िलों को विशेष स्थान प्राप्त हुआ। ऐंगलो-सैक्सन युग के क़िलों में वास्तुकला संबंधी कोई विशेषता नहीं थीं। किंतु 11वीं सदी ईस्वी में नार्मेनयुग के क़िलों में खास तौर पर वास्तुकला की ओर ध्यान दिया जाने लगा। [[श्रॉपशायर]] के स्टोकसे कैसिल और वारविकशायर के केनिलवर्थ कैसिल उस समय की वास्तुकला के बड़े ही सुंदर उदाहरण हैं। इन क़िलों की विशेष इनकी खाइयाँ एवं इनके कई कई खंडों के भवन हैं। == भारत के प्रमुख दुर्ग == {{col-begin}} {{col-break}} * [[लाल क़िला|दिल्ली का लाल क़िला]] * [[आगरा का किला|आगरा का लाल क़िला]] * [[ग्वालियर का क़िला]] * [[माण्डू|मांडू]] का क़िला * [[चित्तौड़गढ़ दुर्ग]] * [[कोट का किला|कोट का क़िला]] (राजस्थान) * [[जोधपुर का किला|जोधपुर का क़िला]] (राजस्थान) * [[आमेर दुर्ग|अम्बेर का क़िला]] (राजस्थान) * [[बीकानेर किला|बीकानेर क़िला]] * [[किशनगढ़ का किला|किशनगढ़ का क़िला]] * [[बीजापुर का किला|बीजापुर का क़िला]] * [[गोलकुंडा का किला|गोलकुंडा का क़िला]] (आंध्रपदेश) * [[वारंगल का किला|वारंगल का क़िला]] (आंध्रपदेश) * [[फोर्ट विलियम]] (पश्चिमी बंगाल) * [[फोर्ट सेंट विलियम]] (मद्रास) * [[दमन और दीव का किला|दमन और दीव का क़िला]] * [[दौलताबाद का किला|दौलताबाद का क़िला]] * [[रोहतास गढ़ का किला|रोहतास गढ़ का क़िला]] * [[भानगढ़ का किला|भानगढ़ का क़िला]] {{col-break}} * [[पद्मदुर्ग किला|पद्मदुर्ग क़िला]] * [[नमक्कल किला|नमक्कल क़िला]] * [[मेहरानगढ़|मेहरानगढ़ क़िला]] * [[मुरुद जंजीरा किला|मुरुद जंजीरा क़िला]] * [[किला राय पिथौरा|क़िला राय पिथौरा]] * [[चौरागढ़ किला|चौरागढ़ क़िला]] * [[खिमसर का किला|खिमसर का क़िला]] * [[लूनी किला|लूनी क़िला]] * [[जोधपुर|रोहट क़िला]] * [[सबलगढ़ किला|सबलगढ़ क़िला]] * [[समरथगढ़]] * [[कोट कांगड़ा]] (कांगड़ा का क़िला) * [[नरवर दुर्ग]] {{col-end}} == संदर्भ ग्रंथ == * सर सैयद अहमद खाँ : आसारूस्सनादीद; * शुक्ल, द्विजेंद्रनाथ : भारतीय वास्तुशास्त्र * रिजवी : खिलजीकालीन भारत; * तुगलककालीन भारत, भाग 1; * दि कैंब्रिज हिस्ट्री ऑव इंडिया, भाग 3, 4; * ब्राउन पर्सी : इंडियन आर्किटेक्चर; * फर्ग्युसन, जेम्स : ए शार्ट हिस्ट्री ऑव इंडियन ऐंड ईस्टर्न आर्किटेक्चर; * फ़ेशर, सर बैनिस्टर : ए हिस्ट्री ऑव आर्किटेक्चर आन द कं पैरेटिव मेथड; * सिडनी टाय: दि कैसिल्स ऑच ग्रेट ब्रिटेन ; * ए हिस्ट्री ऑव फोर्टिफ़िकेशन, दि स्ट्रागहोल्ड्स ऑव इंडिया। == इन्हें भी देखें == * [[किलाबंदी|क़िलाबंदी]] == बाहरी कड़ियाँ == * [https://web.archive.org/web/20130925034036/http://www.ignca.nic.in/coilnet/rj024.htm दुर्गों का राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में एक परिचय] * [http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/lifestylenews/article1-story-50-50-159817.html आओ किला फतह करें] * [https://web.archive.org/web/20190418030639/http://www.topcastles.com/ Top 100 of Medieval Castles] * [https://web.archive.org/web/20130815074902/http://neerajjaatji.blogspot.in/2009/12/blog-post.html कांगड़ा का किला] *[https://hindilogy.com/travel/manjarabad-fort/ मंजराबाद का किला] [[श्रेणी:दुर्ग|*]] [[श्रेणी:सुरक्षा]] [[श्रेणी:युद्ध]] [[श्रेणी:रणनीति]] [[श्रेणी:सैन्यविज्ञान]]
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)
इस पृष्ठ पर प्रयुक्त साँचें:
साँचा:Col-begin
(
सम्पादित करें
)
साँचा:Col-break
(
सम्पादित करें
)
साँचा:Col-end
(
सम्पादित करें
)