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पर्वतीय क्षेत्र में लड़ा जानेवाला [[युद्ध]] '''गिरियुद्ध''' कहलाता है। गिरियुद्ध के कोई विशेष सिद्धांत नहीं हैं। इसमें भी युद्ध का उद्देश्य शत्रु के मुख्य स्थानों पर अधिकार करना तथा उसकी शक्ति एवं सामग्री को समूल नष्ट करना है। यह युद्ध चाहे पर्वतीय क्षेत्र में राजद्रोहियो के विरूद्ध हो, जैसा अँगरेजी शासनकाल में भारत के उत्तर-पश्चिम सीमांत में कबायलियों के साथ हुआ था, अथवा संगठित सेनाओं के विरूद्ध हुआ युद्ध, इसके कौशल और सिद्धांत एक ही प्रकार के होते हैं। == परिचय == पहाड़ों में सेनाओं की गतिविधि और खाद्य सामग्री को ले जाने में कठिनाई होती है। यह कठिनाई न केवल अनतिक्रमशील ऊँचाई, सघन जंगलवाले भूभाग, हिम और नदी नालों से होती हैं, अपितु अकस्मात् ऋतुपरिवर्तन एवं प्रचंड झंझावात भी बाधाएँ डालता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यातायात के साधन बहुत कम होते हैं। केवल घाटियों में कहीं सड़कें होती हैं, जो प्राय: कच्ची होती हैं और इनमें बर्फ के पिघलने और वर्षा से बाधाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इसीलिए इस क्षेत्र में सैनिकों को विशेष सामग्री और विशेष प्रकार के शस्त्रों का उपयोग करना पड़ता है। इस क्षेत्र में लड़नेवाली सेनाओं को हर प्रकार आत्मनिर्भर होना चाहिए, क्योंकि हर समय पीछे की सेना से संपर्क रखना कठिन होता है। खाद्य सामग्री, भारी शस्त्रों तथा गोला बारूद आदि सामग्री ढोने के लिए खच्चरों और कुलियों का उपयोग करना पड़ता है। युद्ध के शस्त्र भी ऐसे होते हैं जिनका स्थानांतरण सरल नहीं होता। ;इन्फैंट्री या पैदल सेना पैदल सेना को इस प्रकार संगठित किया जाता है कि एक कंपनी अपनी बटालियन से काफी समय तक पृथक् रह सके। इस कंपनी को अपनी मशीनगनें, गोले, बारूद, हथियार, राशन आदि खच्चरों पर लादकर आगे बढ़ने एवं युद्ध में उपयोग करने के लिए सर्वदा तैयार रहना चाहिए। ;तोपखाना तोपें ऐसी होनी चाहिए जो खोलकर खच्चरों पर लादी जा सकें। हाविट्ज़र (howitzer) प्रकार की तोपें इस क्षेत्र में उत्तम एवं लाभदायक रहती हैं। ;अश्वारोही सेना पहाड़ी क्षेत्र में सड़कों के न होने के कारण घुड़सवार सेनाओं का उपयोग कम होता है, परंतु कतिपय उदाहरण ऐसे भी उपलब्ध हैं, जिनमें पहाड़ी क्षेत्रों में घुड़सवार लाभदायक सिद्ध हुए। ;अभियंता (Engineers) अभियंताओं के पास पुल निर्माण करने और सड़कों का जीर्णोद्धार करने के लिए पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए। यह सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो खच्चरों पर सरलतापूर्वक लादी जा सके। ;संकेत (Signal) पहाड़ी क्षेत्र में संदेशवाहन का सबसे महत्वपूर्ण साधन वायरलेस सेट है। इसके अतिरिक्त झंडी और घुड़सवार सूचना वाहकों का उपयोग किया जाता है। टेलिफोन लाइनो का पर्वतीय क्षेत्र में प्रतिष्ठापन अति दुष्कर है। ;टैंक (Tank) पहाड़ी क्षेत्र में टेंकों का सफलतापूर्वक उपयोग किया जो सकता है, परंतु इनका इन्फैंट्री और तोपखाने से संपर्क रखना बहुत आवश्यक है। ;चिकित्सा विभाग पहाड़ी क्षेत्रों में सेना की टुकड़ियाँ सुदूर विस्तृत होती हैं। अत: चिकित्सकों की संख्या पर्याप्त होनी चाहिए। उन्हें छोटे छोटे भागों में इस प्रकार संगठित करना चाहिए कि प्रत्येक टुकड़ी के पास चिकित्सा-व्यवस्था रहे। आहत तथा रोगियों को ले जाने के लिए डोलियों का समुचित प्रबंध होना चाहिए। ;हवाई सेना वायुयानों के उतरने के लिए पास में पर्याप्त भूमि की कमी, वायु की अस्थिरता और बादलों के कारण हवाई सेना से बहुत काम नहीं लिया जा सकता। वायुयान द्वारा शत्रुओं की चौकियों तथा यातायात के साधनों के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। ;टैंकनाशी (Antitank) तोपखाना पहाड़ी युद्ध में टैंकों के उपयोग से टैंकनाशी हथियार का महत्व बढ़ गया है। टैंकों के प्रयोग के लिए रास्तों की संख्या कम होने के कानण टैंकनाशी तोपों के लिए उपयुक्त स्थान ढूँढ़ना सरल होता है। इन टैंकनाशी तोपों की मार थोड़ी दूर तक ही की जा सकती है, क्योंकि दृष्टि के मार्ग में थोड़ी ही दूर पर अवरोध होता है। ;वायुयाननाशी (antiaircraft) तोपखाना संकीर्ण मार्गों में सेना दलों को हवाई आक्रमण से बचाना अनिवार्य है। इसलिए सेनादलों के गुजरनेवाले संकीर्ण मार्गों पर वायुयाननाशी तोपें लगाई जाती हैं। == युद्ध संबंधी योजनाएँ == पहाड़ों में युद्ध की योजना बनाने के पूर्व ऐसी भौगोलिक स्थितियों का भली भाँति गहन अध्ययन करना चाहिए जो सेना की गतिविधि पर प्रभाव डालें। पहाड़ी स्थानों के मानचित्र प्राय: पूर्णतया ठीक नहीं होते और संपूर्ण रूकावटों का संतोषजनक वर्णन नहीं करते। जब भी संभव हो, उस क्षेत्र की पूर्णत: जाँच कर लेनी चाहिए, यद्यपि यह प्राय: कठिन होता है। वायुयानों द्वारा लिए गए फोटो से इलाके के विषय में बहुत जानकारी प्राप्त हो सकती है। पहाड़ी युद्ध अपनी और शत्रु की गतिविधि पर निर्भर होता है। इसलिए सड़कों का ज्ञान महत्वपूर्ण है। आक्रमणों का प्रथमोद्देश्य सड़क को अधिकार में लेना रहता है। गतिविधि की कठिनाइयों के कारणयुद्ध की आरंभिक तैयारी विशेष महत्वपूर्ण है। एक बार सेनाओं को किसी कार्यविशेष पर नियुक्त कर दिया जाए तो उसमें फिर अदल बदल करना प्राय: कठिन होता है। इसमें भी फौजों की दिशाओं का इतस्तत: बदलना महान कठिनाई उत्पन्न करता है। == आक्रमण == आक्रमण की पहली समस्या सेना का विभाजन है। पहाड़ों में युद्ध काफी लंबे क्षेत्र में विकीर्ण होता है। इसलिए यह अनिवार्य है कि सैनिकों को घाटियों के अनुसार बाँटा जाय और उनका अनुशासन भी पृथक् पृथक् कर दिया जाय। प्रत्येक घाटी में सैनिकों की संख्या भूमि के आधार पर निश्चित की जाती है। जैसे जैसे सेना घाटियों के निचले भागों से आगे बढ़ती है वैसे वैसे दोनों ओर की चोटियों पर अधिकार होना चाहिए। जिस पक्ष का चोटियों पर अधिकार हो जाता है घाटियों पर भी उसी पक्ष का अधिकार रहता है। कई पहाड़ों की चोटियों पर पठार पाए जाते हैं। उनपर सेनाओं को ले जाकर फैलाया जा सकता है। शत्रु का सामना प्राय: संकीर्ण मार्गों पर होता है, क्योंकि प्रत्येक कुशाग्र एवं दूरदर्शी शत्रु ऐसे ही कंटकाकीर्ण स्थानों पर अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करता है। यह विचार करना पड़ता है कि ऐसे स्थान से शत्रु पर पहाड़ी की ओर से आक्रमण किया जाए अथवा घाटी की ओर से; क्योंकि जिस पक्ष का ऊँची भूमि पर अधिकार होता है वह नीचे की भूमि और दर्रों पर भी स्वाधिपत्य रखता है। इसलिये ऐसे स्थानों पर यह सतत प्रयत्न होना चाहिए कि दर्रोके आसपास की ऊँची भूमि पर आरंभ में ही अधिकार कर लिया जाए। आक्रमण की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि शत्रु को धोखे में रखा जाय। आक्रमण अकस्मात् होना चाहिए और शत्रु को यह मालूम नहीं होने देना चाहिए कि आक्रमण किस स्थान पर होगा। अनिश्चित दिशा से और अनिश्चित समय पर आक्रमण होने से शत्रु के बचाव में गड़बड़ी हो जाती है। फलत: सफलता की आशा अधिक होती है। कई ऐसे उदाहरण हैं जिनमें पहाड़ी क्षेत्र के ऐसे कठिन मार्गों का प्रयोग करने से युद्ध में सफलता मिली जो यातायात के योग्य नहीं समझे जाते थे। 1940 ईस्वी में जर्मन सेनाओं ने नार्वे के युद्ध में एक ऐसे मार्ग का उपयोग किया जिससे नार्वेवालों को उनके आने की आशा न थी और इस कूटनीति से जर्मन सुगमतापूर्वक विजयी हुए। गिरियुद्ध में आक्रमण प्राय: छोटी छोटी झड़पों का रूप होता है। शत्रु को एकबार पराजित करने के पश्चात् अच्छा होता है कि उसका पीछा करके पलायित कर दिया जाए जिससे वह कहीं भी आश्वस्त न हो सके। गिरियुद्ध में प्राय: एक कठिनाई यह होती है कि दो या अधिक स्थानों पर एक साथ होनेवाले आक्रमणों में सहयोग नहीं हो पाता। == बचाव == पहाड़ी क्षेत्र की ऊबड़खाबड़ भूमि आत्मरक्षा के लिये अत्युत्तम होती है, परंतु बचाव में गहराई नहीं दी जा सकती। बचाव का मुख्य उद्देश्य घाटियों की सड़कों को शत्रु के अधिकार में जाने से रोकना है। सड़कों के बचाव के लिए ऐसा स्थान चुनना चाहिए जहां प्राकृतिक रचना तथा भूमि की आकृति बचाव में सहायता करे। उदाहरणार्थ, ऐसे ऊँचे स्थान चुनने चाहिए जहां से शत्रु को आगे बढ़ने का दूसरा मार्ग न मिले। यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि शत्रु के आगे बढ़ने के अन्य मार्गों पर भी गोली की मार की जा सके। ऊँचे स्थानों या पहाड़ों की चोटियों पर अधिकार करना ही उद्देश्य का अंत नहीं होना चाहिए, अपितु यह भी देखना आवश्यक है कि उन चोटियों से घाटी की पूरी चौकीदारी की जा सके। यदि इन ऊँचे स्थानों से नीचे के मार्गों की देखभाल नहीं की जा सकती तो कई अवसरों पर नीचे की ढालों पर ऐसे स्थान ढूँढ़ने पड़ते हैं जहाँ से पूरी देखभाल की जा सके। ऊबड़ खाबड़ भूमि के बचाव के लिए कम सैनिकों की आवश्यकता होती है, परंतु पर्याप्त रक्षित सेना निकट रखनी चाहिए जिससे प्रत्युत्तर में आक्रमण तेजी से किया जा सके और शत्रु को पराजित किया जा सके। यदि बचाव के लिए मोर्चे पहाड़ के सामने की ढाल पर बनाए जायँ तो उनसे देखभाल अच्छी की जा सकती है और शत्रु के आक्रमण को ऊँचाई की ओर बढ़ने से पहले ही रोका जा सकता है। परंतु इसमें हानि यह है कि ऐसे मोर्चे शत्रु की दृष्टि में रहते हैं। उनपर शत्रु गोली की मार कर सकता है। यदि मोर्चे पहाड़ के शिखर पर बनाए जायँ तो नीचे की ढालों पर ऐसे कई स्थान होते हैं जो देखभाल और गोली की मार से बचे रहते हैं। इस अवस्था में शत्रु सुगमता से ऊँचाई की ओर बढ़ सकता है शिखर पर बनाए हुए मोर्चो का लाभ यह होता है कि वे शत्रु की सीधी मार के भीतर नहीं आते और सहायक सेना को अच्छा छिपाव मिल जाता है। यदि मोर्चे पहाड़ के पीछे की ओर बनाए जायँ तो शत्रु की गोलाबारी से यथेष्ट बचाव हो सकता है, परंतु इन मोर्चों के सामने की ढालों और नीचे घाटी के मार्गों का नियंत्रण एवं निरीक्षण करना कठिन हो जाता है। बचाव को सुदृढ़ करने के लिए मोर्चों के आगे काँटेदार तार और सुरंगे लगाई जाती हैं। शत्रु के आगे बढ़ने के रास्तों पर भी कई प्रकार की बाधाएँ डाली जा सकती हैं, जैसे, नदी नालों के पुल बारूद लगाकर उड़ाना इत्यादि। बचाव में टैंकनाशी तोपें और दूसरा तोपखाना ऐसे स्थानों पर लगाया जाता है जहाँ से वह जिस भूभाग से आक्रमण की आशंका हो उस ओर मार कर सके। वायुयाननाशी तोपखाना ऊँचाई पर लगाना चाहिए जिससे वह चारों ओर भली भाँति देखभाल और मार कर सके। मशीनगनें तंग रास्तों की मार के लिए बहुत लाभदायक होती हैं। शरद् ऋतु में युद्ध-पहाड़ी क्षेत्र में शरत्कालीन युद्ध बहुत कठिन होता है। ऐसी भीषण परिस्थिति में विशेष प्रशिक्षित सैनिक की आवश्यकता होती है, जो बर्फीले स्थानों पर रह तथा लड़ सकें। इसके अतिरिक्त इन सैनिकों के लिए विशेष प्रकार की युद्धसामग्री का भी प्रबंध करना पड़ता है। असंगठित सेनाओं से युद्ध-कई बार सेनाओं को पहाड़ी क्षेत्र में राजद्रोहियों की असंगठित सेनाओं से युद्ध करना पड़ता है। जैसे भारत के उत्तर-पूर्वीय सीमांत में नागा लोगों के साथ हुआ युद्ध। ये अव्यवस्थित क्षेत्रीय सैनिक युद्धकला में बड़े प्रवीण एवं अनुभवी हैं। ये युद्धसामग्री का कोई विशेष प्रबंध नहीं करते, इसीलिए ये प्राय: गतिमान रहते हैं तथा छापे मारकर युद्ध करते हैं। ऐसे शत्रु पर विजय प्राप्ति के लिए उसी प्रकार की चतुरता एवं युद्धविद्या में प्रवीणता अपेक्षित है। [[श्रेणी:युद्ध]] [[श्रेणी:सुरक्षा]]
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