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गोशाला (काव्य)
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[[आचार्य धर्मेन्द्र]] महाराज ने १९५९ में डॉक्टर [[हरिवंश राय बच्चन]] की [["मधुशाला"]] के जवाब में '''"गोशाला"''' नामक काव्य लिखा. == रचना काल == आचार्य श्री ने इसका प्रथम पथ अपने विवाह के उपलक्ष्य में, '''जहानाबाद (बिहार)''' स्थित उनके सव्सुराल्या के उधन में आयोजित काव्यगोष्ठी में २० फ़रवरी १९६० की संध्या में किया था। श्रोताओ में उनकी नववधू परम श्रेध्य श्रीमती प्रतिभा देवी जी भी सम्मलित थी। सन २००८ की २३ जनवरी को''' डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती''' के उपलक्ष्य में '''संस्कृत संस्था 'परचन' ने आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज की "गोशाला"''' को स्वयं उनके कंठ से सुनने का दुर्लभ अवसर प्रदान किया। प्रथम संस्करण सों १९६० में प्रकाशित हुआ था। पेश है गोशाला के कुछ अवतरण : [[राम]] कृष्ण के इतिहासों का सार तत्त्व है गोशाला, स्मृतियों, वेदो, उपनिषदों में एक तत्त्व है गोशाला।। धर्म स्वयं गो बनकर मानो बसता है गोशाला में, देश, धर्म एवं [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] में की परिभाषा है गोशाला।। किंचित अधिक सुरा पी ली तो लगा बहकने मतवाला, प्याले पर प्याले टी पीकर सूख गया पीने वाला।। पर जी भर कर गोपय पीने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं, जितना अधिक पियो उतना ही सबल बनाती गोशाला।। विमुख हुए पितु-मत, बंधू सब विमुख हुए साली साला, विमुख हुआ जग, रुष्ट हुए प्रभु, खफा हुए अल्लाहताला।। टूटे सब सम्बन्ध जगत से, मदिरा पीने वाले के, सहज स्नेह सम्बन्ध जोड़कर सुदृढ़ बनाती गोशाला।। प्रीतिभोज में चाहे कोई खूब पिला दे टी प्याला, चाहे कलश खाली कर, क्यों न पिला डाले हाला।। पर मिष्ठान अगर न हुए तो, सब कुछ व्यर्थ कहलायेगा, सहभोजों में सरस मिठाई हमें खिलाती गोशाला।। मेरे आगे, मेरे पीछे, दायें - बाएं गोशाला, मेरे बाहर, मेरे भीतर जो कुछ है, बस गोशाला।। मैं गायो का [[गाय]] मेरी, ऐसा हो सदभाव सदा, तो सुरपुर से भी सुखकर है, मुझको मेरी गोशाला।। धर्म न मेरा हिन्दू-मुस्लिम एक धर्म है गोशाला, कर्म और कर्त्तव्य, कार्यकर्म. दिनचर्या सब गोशाला।। गोभक्त की जाति वर्ण है - गो, गोबिंद - उपासक का, एक शब्द में मेरा पूरा, परिचय, केवल - गोशाला।। हूण, यवन, शक, मलेछ मिट गये पीते पीते मधुहाला, आत्मसात कर गयी सभी को मदिरालय की विष-जवाला।। किन्तु आज तक किसके बल पर जाति हमारी जीवित है ? हमको अब तक जिला रही है, बंधू, हमारी गोशाला, टिड्डी दल का क्रूर असुर दल [[भारत]] पर छाया काला।। हुआ दनुजता का तांडव भी हृदय हिला देने वाला, गिरे वज्र मंदिरों मठों पर गोभाक्तो पर गाज गिरी।। किन्तु न झुकी पताका एवं रही सुरक्षित गोशाला, देशद्रोहियों ने अपना औ किया जाति का मुह कला।। सत्रह बार क्षमा कर रिपु को फंसा सिंह भोला भाला, अँधा कर केहरी को मधप फुला नहीं समाता था।। पर अंधी आँखों से भी, आखेट कर गयी गोशाला, अग्निपरीक्षा हुई धैर्य की हुआ पलायित मतवाला।। पयपायी ने किन्तु धरम्हित अपना शीश कटा डाला टूट गए पर झुके नहीं जो, वे उन्नत शिर किनके थे ? उनके - उनके, जिनको - जिनको, प्यारी थी वह गोशाला, किनने साथ देश का छोड़ा और कर लिया मुँह काला? वे जिनकी बाँहों मैं साकी औ होंठो पर थी हाला।। देश - जाती के गौरव हित जो लड़-मरे, पयपापी थे, पुत्रो के हृदय मैं प्रतिपल, रही मचलती गोशाला।। कल ही तो [[चितौड़]] दुर्ग से पड़ा असुर को था पाला, अभी कहाँ बुझ गयी है वह जौहर की जागृत ज्वाला।। विफल हो गया असुरो का छल दिव्य देवियाँ अमर हुई, हाथ मल रहे थे मद्यप औ दमक रही थी गोशाला।। गोरी औ गजनवी लुटेरा अल्लाह्धीन विषधर काला, बख्तियार औरंगजेब रिपु - दारुण दुःख देने वाला।। हरे ! मुरारे ! गोशाला पर कितने संकट आये हैं, सह - सह कर सबको सहस से, खडी रही है गोशाला।। दाहर, पृथ्वीराज, सरिदर्ष नर बप्पारावल से आला, राणा साँगा औ प्रताप से प्रकटे शुर लिए भाला।। छत्रसाल, गोबिंद, शिव से, वैरागी सम वीरों से, तिलक, सुभाष प्रभिर्ती पुत्रों से रही रक्षिता गोशाला।। मेरे गौरव इतिहासों के पृष्ठ - पृष्ठ पर गोशाला, मेरी प्रिय भारत माता के कण - कण मैं यह गोशाला।। मेरे तन रक्त मास मैं गोशाला ही छाई है, मिट जाऊंगा मैं उस दिन जब, नहीं रहेगी गोशाला।। हट जायेगा छंट जायेगा यह नराश्य तिमिर काला, नव - प्रभात लोटेगा भू पर, फिर स्वर्णिम स्वप्नों वाला।। स्वर्ग - लोक सा अनुभव होगा, फिर से अपना देश हमे, ग्राम - ग्राम घर - घर में जिस दिन, खुल जाएगी गोशाला।। [[श्रेणी:काव्य]]
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