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''धर्म' ''दर्शन'' यह एक प्रकार का दर्शन है । इसका उदय भारतीय प्रायद्वीप में हुआ। धर्म यह जीवन जीने की पद्धति है । इस दर्शन की खोज प्राचीन ऋषियों ने की । कालांतर में इसका [[ महात्मा गौतम बुध्द]] ने इसे पुनर्जीवित किया। धर्म विश्व की सबसे प्राचीन भाषा [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] का बहुसमावे [https://www.ratanroy.com/post/धर-म-और-ध-र-म-कत-म-क-य-फर-क-ह धर्म और धार्मिकता में क्या फ़र्क हैं ?]{{Dead link|date=मार्च 2021 |bot=InternetArchiveBot }} * न्याय * गुण * स्वभाव * संस्कृति * सभ्यता * सदाचरण * मूल्य * धारण ।धर्म का अर्थ होता है, धारण, अर्थात जिसे धारण किया जा सके, धर्म ,कर्म प्रधान है। गुणों को जो प्रदर्शित करे वह धर्म है। धर्म को गुण भी कह सकते हैं। यहाँ उल्लेखनीय है कि धर्म शब्द में गुण अर्थ केवल मानव से संबंधित नहीं। पदार्थ के लिए भी धर्म शब्द प्रयुक्त होता है यथा पानी का धर्म है बहना, अग्नि का धर्म है प्रकाश, उष्मा देना और संपर्क में आने वाली वस्तु को जलाना। व्यापकता के दृष्टिकोण से धर्म को गुण कहना सजीव, निर्जीव दोनों के अर्थ में नितांत ही उपयुक्त है। धर्म सार्वभौमिक होता है। पदार्थ हो या मानव पूरी पृथ्वी के किसी भी कोने में बैठे मानव या पदार्थ का धर्म एक ही होता है। उसके देश, रंग रूप की कोई बाधा नहीं है। धर्म सार्वकालिक होता है यानी कि प्रत्येक काल में युग में धर्म का स्वरूप वही रहता है। धर्म कभी बदलता नहीं है। उदाहरण के लिए पानी, अग्नि आदि पदार्थ का धर्म सृष्टि निर्माण से आज पर्यन्त समान है। धर्म और सम्प्रदाय में मूलभूत अंतर है। धर्म का अर्थ जब गुण और जीवन में धारण करने योग्य होता है तो वह प्रत्येक मानव के लिए समान होना चाहिए। जब पदार्थ का धर्म सार्वभौमिक है तो मानव जाति के लिए भी तो इसकी सार्वभौमिकता होनी चाहिए। अतः मानव के सन्दर्भ में धर्म की बात करें तो वह केवल मानव धर्म है। [[श्रेणी:धर्म]] [[श्रेणी:दर्शन]] ==इन्हें भी देखें== * [[ऋषि (धर्म)]]
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