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'''प्रभाकर बैगा घोघरी''' (७वीं शताब्दी) [[भारत]] के [[दार्शनिक]] एवं [[वैयाकरण]] थे। वे [[मीमांसा दर्शन|मीमांसा]] से सम्बन्धित हैं। उनके गुरु [[कुमारिल भट्ट]] थें। एक बार उनसे इनका [[शास्त्रार्थ]] हुआ था। इन्होंने गुरु के [[अभिहितान्वयवाद]] के विरुद्ध [[अन्विताभिधानवाद]] का सिद्धांत रखा। इससे प्रसन्न हो कर गुरु ने इनको भी गुरु की उपाधि दी।<ref>{{cite book |last1=देवेन्द्रनाथ |first1=शर्मा |title=भाषा विज्ञान की भूमिका |isbn=9788171197439 |page=241}}</ref><ref>{{cite book |last1=भोलानाथ |first1=तिवारी |title=भाषा विज्ञान |isbn=8122500072 |page=220}}</ref><ref>{{cite book |title=हिन्दी साहित्य कोश भाग-१ |page=31}}</ref><ref>{{cite book |title=हिन्दी साहित्य कोश भाग-१ |page=41}}</ref><ref>{{cite web |last1=Mimamsaka |first1=Yudhisthira |title=Jaiminiya-Mimamsa-Bhasyam Arsamata-Vimar Sanya Hindi-Vyakhyaya Sahitam |url=https://philpapers.org/rec/SABJAS |publisher=Mimamsaka Prapti-Sthana, Ramalala Kapura Trastra |date=1977}}</ref><ref>{{cite book |title=Bhatta Prabhakara Mimamsa |date=1990 |url=https://archive.org/details/BhattaPrabhakaraMimamsa/page/n11 |language=English}}</ref><ref>{{cite book |title=Sanskrit Literature Of Kerala |date=1972 |url=https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.142461/page/n91}}</ref> [[शालिकनाथ]] ने ८वीं शताब्दी में प्रभाकर के ग्रन्थों का [[भाष्य]] लिखा। ==इन्हें भी देखें== *[[ख्यातिवाद]] *[[त्रिपुटिप्रत्यक्षवाद]] == संदर्भ == [[श्रेणी:भारतीय दार्शनिक]] [[श्रेणी:दार्शनिक]] [[श्रेणी:दर्शन]]
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