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{{Infobox user <!-- INFOBOX FORMATTING --------> | abovecolor = | color = | fontcolor = | abovefontcolor = | headerfontcolor = | tablecolor = <!-- LEAD INFORMATION ----------> | title = <!-- optional, defaults to {{BASEPAGENAME}} --> | status = | image = | image_caption = [[भौमासुर का वध]] | image_width = }} पाण्डवों के [[लाक्षागृह]] से कुशलतापूर्वक बच निकलने पर [[सात्यिकी]] आदि यदुवंशियों के साथ लेकर श्री कृष्ण उनसे मिलने के लिये इन्द्रप्रस्थ गये। [[युधिष्ठिर]], [[भीम]], [[अर्जुन]], [[नकुल]], [[सहदेव]], [[द्रौपदी]] और [[कुन्ती]] ने उनका यथेष्ठ आदर सत्कार कर के उन्हें अपना अतिथि बना लिया। एक दिन अर्जुन को साथ लेकर श्री कृष्ण आखेट के लिये गये। जिस वन में वे शिकार के लिये गये थे वहाँ पर भगवान सूर्य की पुत्री [[कालिन्दी]], श्री कृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थी। कालिन्दी की मनोरथ पूर्ण करने के लिये श्री कृष्ण ने उसके साथ विवाह कर लिया। फिर वे उज्जयिनी की राजकुमारी मित्रबिन्दा को स्वयंवर से वर लाये। उसके बाद कौशल के राजा नग्नजित के सात बैलों को एक साथ नाथ उनकी कन्या सत्या से पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात् कैकेय की राजकुमारी भद्रा से श्री कृष्ण का विवाह हुआ। भद्रदेश की राजकुमारी लक्ष्मणा का मनोरथ भी श्री कृष्ण को पतिरूप में प्राप्त करने की थी अतः लक्ष्मणा को भी श्री कृष्ण अकेले ही हर कर ले आये। श्री कृष्ण अपनी आठों रानियों - [[रुक्मिणी|रुक्मणी]], [[जाम्बवन्ती]], [[सत्यभामा]], [[कालिन्दी]], [[मित्रबिन्दा]], [[सत्या]], [[भद्रा]] और [[लक्ष्मणा]] - के साथ द्वारिका में सुखपूर्वक रहे थे कि एक दिन उनके पास देवराज [[इन्द्र]] ने आकर प्रार्थना की, "हे कृष्ण! [[प्रागज्योतिषपुर]] के दैत्यराज [[भौमासुर]] के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। वह भौमासुर भयंकर क्रूर तथा महा अहंकारी है और [[वरुण (देव)|वरुण]] का छत्र, [[अदिति]] के कुण्डल और देवताओं की मणि छीनकर वह त्रिलोक विजयी हो गया है। उसने पृथ्वी के समस्त राजाओं की अति सुन्दरी कन्यायें हरकर अपने यहाँ बन्दीगृह में डाल रखा है। उसका वध आपके सिवाय और कोई नहीं कर सकता। अतः आप तत्काल उससे युद्ध करके उसका वध करें।" इन्द्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ ले कर गरुड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुँचे। वहाँ पहुँच कर श्री कृष्ण ने अपने [[पाञ्चजन्य]] शंख को बजाया। उसकी भयंकर ध्वनि सुन मुर दैत्य श्री कृष्ण से युद्ध करने आ पहुँचा। उसने अपना त्रिशूल गरुड़ पर चलाया। श्री कृष्ण ने तत्काल दो बाण चला कर उस त्रिशूल के हवा में ही तीन टुकड़े दिया। इस पर उस दैत्य ने क्रोधित होकर अपनी गदा चलाई किन्तु श्री कृष्ण ने अपनी गदा से उसकी गदा तो भी तोड़ दिया। घोर युद्ध करते करते श्री कृष्ण ने मुर दैत्य सहित मुर दैत्य छः पुत्र - ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण - का वध कर डाला। मुर दैत्य के वध हो जाने पर भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिये निकला। गरुड़ अपने पंजों और चोंच से दैत्यों का संहार करने लगे। श्री कृष्ण ने बाणों की वर्षा कर दी और अन्ततः अपने सुदर्शन चक्र से भौमासुर के सिर को काट डाला। इस प्रकार भौमासुर को मारकर श्री कृष्ण ने उसके पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर प्रागज्योतिष का राजा बनाया। भौमासुर के द्वारा हर कर लाई गईं सोलह हजार एक सौ राजकन्यायों को श्री कृष्ण ने मुक्त कर दिया। उन सभी राज कन्याओं ने श्री कृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्री कृष्ण अपने साथ द्वारिका पुरी ले आये। == स्रोत == [https://web.archive.org/web/20190809023654/http://sukhsagarse.blogspot.com/ सुखसागर] के सौजन्य से [[श्रेणी:श्रीमद्भागवत]] [[श्रेणी:धर्म]] [[श्रेणी:हिन्दू धर्म]] [[श्रेणी:धर्म ग्रंथ]] [[श्रेणी:पौराणिक कथाएँ]] [[श्रेणी:चित्र जोड़ें]]
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