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{{ज्ञानसन्दूक जीवनी | नाम = विलायत ख़ाँ | चित्र = Vilayat Khan 2014 stampsheet of India cr.jpg | आकार = 200px | शीर्षक = उस्ताद विलायत ख़ाँ | जन्मतिथि = 8 अगस्त, 1928 | जन्मस्थान = गौरीपुर [[मैमनसिंह]], [[भारत]] (अब [[बांग्लादेश]]) | मृत्युतिथि = 13 मार्च, 2004 | मृत्युस्थान = मुंबई | कारोबार = [[संगीतज्ञ]], [[सितार वादक]] | जीवनसाथी = | जनक = [[उस्ताद इनायत हुसैन ख़ाँ]] | सन्तान = [[सुजात हुसैन ख़ाँ]] और [[हिदायत ख़ाँ]] }} '''विलायत खाँ''' का जन्म 1928 में गौरीपुर (इस समय बांग्लादेश) में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। पिता, प्रख्यात सितार वादक उस्ताद इनायत हुसैन ख़ाँ, की जल्दी मौत के बाद उन्होंने अपने नाना और मामा से सितार बजाना सीखा।<ref>{{cite web|url= http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2004/03/040314_vilayat_khan.shtml|title= सितारवादक उस्ताद विलायत ख़ाँ नहीं रहे|access-date= 8 जुलाई 2007|format= एसएचटीएमएल|publisher= बीबीसी|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20040921101903/http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2004/03/040314_vilayat_khan.shtml|archive-date= 21 सितंबर 2004|url-status= live}}</ref> आठ वर्ष की उम्र में पहली बार उनके सितारवादन की रिकॉर्डिंग हुई। उन्होंने पाँच दशकों से भी अधिक समय तक अपने सितार का जादू बिखेरा। उस्ताद विलायत ख़ाँ की पिछली कई पुश्तें सितार से जुड़ी रहीं और उनके पिता इनायत हुसैन ख़ाँ से पहले उस्ताद इमदाद हुसैन ख़ाँ भी जाने-माने सितारवादक रहे थे। उस्ताद विलायत ख़ाँ के दोनों बेटे, सुजात हुसैन ख़ाँ और हिदायत ख़ाँ भी तथा उनके भाई इमरात हुसैन ख़ाँ और भतीजे रईस ख़ाँ भी जाने माने सितार वादक हैं। वे संभवतः भारत के पहले संगीतकार थे जिन्होंने भारत की आज़ादी के बाद इंग्लैंड जाकर संगीत पेश किया था। विलायत ख़ाँ एक साल में आठ महीने विदेश में बिताया करते थे और न्यूजर्सी उनका दूसरा घर बन चुका था। विलायत ख़ाँ ने सितार वादन की अपनी अलग शैली, गायकी शैली, विकसित की थी जिसमें श्रोताओं पर गायन का अहसास होता था। उनकी कला के सम्मान में राष्ट्रपति फ़ख़रूद्दीन अली अहमद ने उन्हें आफ़ताब-ए-सितार का सम्मान दिया था और ये सम्मान पानेवाले वे एकमात्र सितारवादक थे। लेकिन उस्ताद विलायत खाँ ने 1964 में पद्मश्री और 1968 में पद्मविभूषण सम्मान ये कहते हुए ठुकरा दिए थे कि भारत सरकार ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान का समुचित सम्मान नहीं किया। उनके परिवार में उनकी दो पत्नियाँ, दो बेटे और दो बेटियाँ भी हैं। 13 मार्च 2004 को उनका देहांत हो गया। उन्हें फेफ़ड़े का कैंसर था जिसके इलाज के लिए वे जसलोक अस्पताल में भर्ती थे। उनका अधिकतर जीवन कोलकाता में बीता और उनका अंतिम संस्कार भी उन्हें उनके पिता की क़ब्र के समीप दफ़ना कर किया गया। ==सन्दर्भ== {{Reflist}} [[श्रेणी:भारतीय संगीत]] [[श्रेणी:शास्त्रीय संगीत]] [[श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन]] [[श्रेणी:सितार वादक]]
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