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{{स्रोतहीन|date=जून 2015}} '''शतरूपा''' संसार की प्रथम स्त्री थी ऐसी हिंदू मान्यता है। इनका जन्म ब्रह्मा के वामांग से हुआ था (ब्रह्मांड. 2-1-57) तथा स्वायंभुव मनु की पत्नी थीं। [[सुखसागर]] के अनुसार [[सृष्टि]] की वृद्धि के लिये [[ब्रह्मा]] जी ने अपने शरीर को दो भागों में बाँट लिया जिनके नाम 'का' और 'या' (काया) हुये। उन्हीं दो भागों में से एक से पुरुष तथा दूसरे से स्त्री की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम [[स्वयंभुव मनु]] और स्त्री का नाम शतरूपा था। इन्हीं प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की सन्तानों से संसार के समस्त जनों की उत्पत्ति हुई। मनु की सन्तान होने के कारण वे मानव कहलाये। इन्हें प्रियव्रत, उत्तानपाद आदि सात पुत्र और तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं। नरमानस पुत्रों के बाद ब्रह्मा ने अंगजा नाम की एक कन्या उत्पन्न की जिसके शतरूपा, सरस्वती आदि नाम भी थे। [[मत्स्य पुराण]] में लिखा है कि ब्रह्मा से इसे स्वायंभुव मनु, मारीच आदि सात पुत्र हुए (मत्स्य. 4-24-30)। [[हरिहरपुराण]] के अनुसार शतरूपा ने घोर तपस्या करके स्वायँभुव मनु को पति रूप में प्राप्त किया था और इनसे 'वीर' नामक एक पुत्र हुआ। [[मार्कण्डेय पुराण|मार्कण्डेयपुराण]] में शतरूपा के दो पुत्रों के अतिरिक्त ऋद्धि तथा प्रसूति नाम की दो कन्याओं का भी उल्लेख है। कहीं कहीं एक और तीसरी कन्या देवहूति का भी नाम मिलता है। शिव तथा वायुपुराणों में दो कन्याओं प्रसूति एवं आकूति का नाम है। [[वायु पुराण|वायुपुराण]] के अनुसार ब्रह्म शरीर के दो अंश हुए थे जिनमें से एक से शतरूपा हुई थीं। [[देवीभागवत पुराण|देवीभागवत]] आदि में शतरूपा की कथाएँ कुछ भिन्न दी हुई हैं। [[श्रेणी:श्रीमद्भागवत]] [[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]
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