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{{स्रोतहीन|date=जुलाई 2018}} {{आधार}} '''सांविधिक विधि''' या '''सांविधिक कानून''' (Statutory body या statute law) [[विधायिका]] द्वारा निर्मित तथा लिखित रूप में मौजूद कानूनों को कहते हैं। संविधिक निकाय वह है जिसे संसद के अधिनियम या राज्य विधान द्वारा गठित किया जाता है। इसकी स्थापना प्रायः विशेष कार्यों को करने के लिए की जाती है जिनमें सरकार का मानना है कि परम्परागत विभागीय संरचना से बाहर अत्यधिक प्रभावपूर्ण तरीके से निष्पादन हो सके। संविधिक निकायों में मंत्रिमण्डलीय नियंत्रण उनके अधिनियम में उल्लिखित प्रावधानों के अनुपात में होता है। मंत्रीगण सभी सरकारी बोर्ड एवं एजेंसियों के प्रचालन के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं और यह आवश्यक है कि उनके पोर्टफोलियो के भीतर संसद के समक्ष उनके कायों की वार्षिक रिपोर्ट रखी जाए। हालाँकि यह मान्यता है की सांविधिक निकायों का गठन सरकार से एक स्तर तक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन फिर भी, सरकार इन निकायों के प्रचालन पर करदाताओं के लगने वाले पैसों के प्रभावी, दक्ष एवं मितव्ययी तरीके को सुनिश्चित कर सकती है। विभिन्न संविधिक निकायों की लागू विधियों में भी अंतर होता है। प्रत्येक संविधिक निकाय स्वयं के विधि द्वारा निर्देशित होता है, साथ ही अन्य विधानों के प्रावधानों से भी नियंत्रित होता है जो सभी संविधिक निकायों के लिए समान हैं। एक सांविधिक निकाय का संसद के एक अधिनियम द्वारा सामान्य बहुमत सेउन्मूलन किया जा सकता है। केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी), केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी), इत्यादि संविधिक निकायों के उदाहरण हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 323ए में उल्लिखित है कि, संसद, विधि द्वारा, प्रशासनिक न्यायाधिकरणों द्वारा अधिनिर्णयन या ट्रायल का प्रावधान कर सकती है। इसका आशय है कि संसद या केंद्र सरकार पर कैट की नियुक्ति के लिए विधि बनाने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है। प्रसंगवश, संवैधानिक निकायों का संविधान द्वारा प्रावधान किया जाता है और इनका उन्मूलन संविधान के उस हिस्से का संशोधन किए बिना नहीं किया जा सकता। चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक,पंचायत, अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग, इत्यादि संवैधानिक निकाय हैं। [[श्रेणी:विधि]] [[श्रेणी:सांविधिक कानून|*]]
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