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{{हिन्दू देवी देवता ज्ञानसन्दूक | type = Hindu | image =Suryatanjore.jpg | caption = सूर्य देवता की रथारूढ पेंटिंग, १९वीं शताब्दी | name = सूर्य | sanskrit_transliteration = सूर्यः | tamil_transliteration = ஞாயிறு | affiliation = [[ग्रह]], [[हिन्दू देवी देवताओं की सूची|देव]], आदि देव | god_of = [[सूर्य]] भगवान | abode = | mantra = ॐ सः सूर्याय नमः | weapon = | consort = संध्या, राज्ञी, प्रभा, छाया | mount = सप्त अश्वों द्वारा खींचा जाने वाला रथ, सारथी: [[अरुण]]<ref संतान : कर्ण , सुग्रीव , शनिदेव , यमराज , यमुना , भद्रा , कालिंदी , अश्वनीकुमार नात्सय और दस्र , यमुना और कालिंदी name="Jansen 65">जानसेन, एवा रूडी, ''द बुक ऑफ़ हिन्दू इमेजरी, मैनिफ़ैस्टेशंस अण्ड देयर मीनिंग'', पृ.६५</ref> |father=कश्यप|mother=अदिति|children=कर्ण , यमराज , यमुना , शनि , भद्रा , सुग्रीव , कालिंदी , अश्वनीकुमार नात्सय और दस्र|other_names=सूर्यनारायण , काश्यप , आदित्य , दिनकर , रवि , भानु आदि|day=रविवार|siblings=भगवान विष्णु , इंद्रदेव , वरुणदेव , अग्निदेव , शेषनाग , , अरुण , गरुड़ , तक्षक , वासुकी ( सभी नाग , अरुण और गरुड़ सौतेले भाई )}} [[File:Sun-temple DEO Aurangabad Bihar,India.jpg|thumb| [[देव सूर्य मंदिर]] - विश्व का सर्वाधिक पूजे जाने वाली मंदिर जो सूर्य देव का अदभुत और विचित्र दर्शन कराती है।]] '''सूर्य''' को [[वेद|वेदों]] में जगत की आत्मा कहा गया है।<ref>{{cite book |last1=Prakash |first1=Ved |title=Adhyātma-cintana |date=1993 |publisher=Sanmārga Prakāśana |url=https://books.google.co.in/books?id=Jw1HAQAAIAAJ&q=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&dq=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjzvuiL_aDcAhUlSY8KHYKYBaIQ6AEILTAB |accessdate=15 जुलाई 2018 |language=hi |archive-url=https://web.archive.org/web/20180715152054/https://books.google.co.in/books?id=Jw1HAQAAIAAJ&q=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&dq=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjzvuiL_aDcAhUlSY8KHYKYBaIQ6AEILTAB |archive-date=15 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, यह आज एक सर्वमान्य सत्य है। वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता धर्ता मानते थे।<ref>{{cite book |title=Vedavāṇī |date=1998 |publisher=Rāmalāla kapūra Ṭrasṭa. |url=https://books.google.co.in/books?id=ToXXAAAAMAAJ&q=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&dq=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjzvuiL_aDcAhUlSY8KHYKYBaIQ6AEIOjAD |accessdate=15 जुलाई 2018 |language=hi |archive-url=https://web.archive.org/web/20180715152049/https://books.google.co.in/books?id=ToXXAAAAMAAJ&q=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&dq=%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjzvuiL_aDcAhUlSY8KHYKYBaIQ6AEIOjAD |archive-date=15 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक.यह सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी है। ऋग्वेद के देवताओं में सूर्यदेव का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद ने "चक्षो सूर्यो जायत" कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है। छान्दोग्यपनिषद में सूर्य को प्रणव निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उतपत्ति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है। और उन्ही को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नहीं कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी। बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र तत्र सूर्य मन्दिरों का नैर्माण हुआ। भविष्य पुराण में ब्रह्मा विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा एवं मन्दिर निर्माण का महत्व समझाया गया है। अनेक पुराणों में यह आख्यान भी मिलता है, कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्री कृष्ण पुत्र साम्ब ने सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति पायी थी। प्राचीन काल में भगवान सूर्य के अनेक मन्दिर भारत में बने हुए थे। उनमे आज तो कुछ विश्व प्रसिद्ध हैं। वैदिक साहित्य में ही नहीं आयुर्वेद, ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है। == हिन्दू धर्मानुसार == ;सूर्य की स्थिति [[श्रीमदभागवत पुराण]] में श्री शुकदेव जी के अनुसार:- भूलोक तथा द्युलोक के मध्य में अन्तरिक्ष लोक है। इस द्युलोक में सूर्य भगवान नक्षत्र तारों के मध्य में विराजमान रह कर तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं। उत्तरायण, दक्षिणायन तथा विषुक्त नामक तीन मार्गों से चलने के कारण कर्क, मकर तथा समान गतियों के छोटे, बड़े तथा समान दिन रात्रि बनाते हैं। जब भगवान सूर्य मेष तथा तुला राशि पर रहते हैं तब दिन रात्रि समान रहते हैं। जब वे वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और कन्या राशियों में रहते हैं तब क्रमशः रात्रि एक-एक मास में एक-एक घड़ी बढ़ती जाती है और दिन घटते जाते हैं। जब सूर्य वृश्चिक, मकर, कुम्भ, मीन ओर मेष राशि में रहते हैं तब क्रमशः दिन प्रति मास एक-एक घड़ी बढ़ता जाता है तथा रात्रि कम होती जाती है। ;सूर्य के पास "हे राजन्! सूर्य की परिक्रमा का मार्ग मानसोत्तर पर्वत पर इंक्यावन लाख योजन है। मेरु पर्वत के पूर्व की ओर इन्द्रपुरी है, दक्षिण की ओर यमपुरी है, पश्चिम की ओर वरुणपुरी है और उत्तर की ओर चन्द्रपुरी है। मेरु पर्वत के चारों ओर सूर्य परिक्रमा करते हैं इस लिये इन पुरियों में कभी दिन, कभी रात्रि, कभी मध्याह्न और कभी मध्यरात्रि होता है। सूर्य भगवान जिस पुरी में उदय होते हैं उसके ठीक सामने अस्त होते प्रतीत होते हैं। जिस पुरी में मध्याह्न होता है उसके ठीक सामने अर्ध रात्रि होती है। ;सूर्य की चाल सूर्य भगवान की चाल पन्द्रह घड़ी में सवा सौ करोड़ साढ़े बारह लाख योजन से कुछ अधिक है। उनके साथ-साथ चन्द्रमा तथा अन्य नक्षत्र भी घूमते रहते हैं। सूर्य का रथ एक मुहूर्त (दो घड़ी) में चौंतीस लाख आठ सौ योजन चलता है। इस रथ का संवत्सर नाम का एक पहिया है जिसके बारह अरे (मास), छः नेम, छः ऋतु और तीन चौमासे हैं। इस रथ की एक धुरी मानसोत्तर पर्वत पर तथा दूसरा सिरा मेरु पर्वत पर स्थित है। इस रथ में बैठने का स्थान छत्तीस लाख योजन लम्बा है तथा अरुण नाम के सारथी इसे चलाते हैं। हे राजन्! भगवान भुवन भास्कर इस प्रकार नौ करोड़ इंक्यावन लाख योजन लम्बे परिधि को एक क्षण में दो सहस्त्र योजन के हिसाब से तह करते हैं।" ;सूर्य का रथ इस रथ का विस्तार नौ हजार योजन है। इससे दुगुना इसका ईषा-दण्ड (जूआ और रथ के बीच का भाग) है। इसका धुरा डेड़ करोड़ सात लाख योजन लम्बा है, जिसमें पहिया लगा हुआ है। उस पूर्वाह्न, मध्याह्न और पराह्न रूप तीन नाभि, परिवत्सर आदि पांच अरे और षड ऋतु रूप छः नेमि वाले अक्षस्वरूप संवत्सरात्मक चक्र में सम्पूर्ण कालचक्र स्थित है। सात छन्द इसके घोड़े हैं: गायत्री, वृहति, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति। इस रथ का दूसरा धुरा साढ़े पैंतालीस सहस्र योजन लम्बा है। इसके दोनों जुओं के परिमाण के तुल्य ही इसके युगार्द्धों (जूओं) का परिमाण है। इनमें से छोटा धुरा उस रथ के जूए के सहित ध्रुव के आधार पर स्थित है और दूसरे धुरे का चक्र [[मानसोत्तर पर्वत]] पर स्थित है। ;मानसोत्तर पर्वत * इस पर्वत के पूर्व में इन्द्र की वस्वौकसारा स्थित है। * इस पर्वत के पश्चिम में वरुण की संयमनी स्थित है। * इस पर्वत के उत्तर में चंद्रमा की सुखा स्थित है। * इस पर्वत के दक्षिण में यम की विभावरी स्थित है। == ज्योतिष शास्त्र में सूर्य == भारतीय [[ज्योतिष]] में सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य से सम्बन्धित नक्षत्र [[कृत्तिका|कृतिका]] [[उत्तराषाढा]] और [[उत्तराफ़ाल्गुनी]] हैं। यह भचक्र की पांचवीं राशि [[सिंह]] का स्वामी है। सूर्य पिता का प्रतिधिनित्व करता है, लकड़ी मिर्च घास हिरन शेर ऊन स्वर्ण आभूषण तांबा आदि का भी कारक है। मन्दिर सुन्दर [[महल]] [[वन|जंगल]] किला एवं नदी का किनारा इसका निवास स्थान है। शरीर में पेट आंख ह्रदय चेहरा का प्रतिधिनित्व करता है। और इस ग्रह से आंख सिर रक्तचाप [[गंजापन]] एवं बुखार संबन्धी बीमारी होती हैं। सूर्य की जाति [[क्षत्रिय]] है। शरीर की बनाव सूर्य के अनुसार मानी जाती है। हड्डियों का ढांचा सूर्य के क्षेत्र में आता है। सूर्य का [[अयन]] ६ माह का होता है। ६ माह यह [[दक्षिणायन सूर्य|दक्षिणायन]] यानी भूमध्य रेखा के दक्षिण में मकर वृत पर रहता है, और ६ माह यह भूमध्य रेखा के उत्तर में [[कर्क राशि|कर्क]] वृत पर रहता है। इसका रंग केशरिया माना जाता है। धातु तांबा और [[रत्न]] [[कुरुविंद|माणिक]] उपरत्न लाडली है। यह पुरुष ग्रह है। इससे आयु की गणना ५० साल मानी जाती है। सूर्य अष्टम मृत्यु स्थान से सम्बन्धित होने पर मौत आग से मानी जाती है। सूर्य सप्तम द्रिष्टि से देखता है। सूर्य की दिशा पूर्व है। सबसे अधिक बली होने पर यह राजा का कारक माना जाता है। सूर्य के मित्र [[चन्द्रमा|चन्द्र]] [[मंगल]] और [[गुरु]] हैं। शत्रु [[शनि]] और [[शुक्र]] हैं। समान देखने वाला ग्रह [[बुध (बहुविकल्पी)|बुध]] है। सूर्य की [[विंशोत्तरी]] दशा ६ साल की होती है। सूर्य गेंहू घी पत्थर दवा और माणिक्य पदार्थो पर अपना असर डालता है। पित्त रोग का कारण सूर्य ही है। और वनस्पति जगत में लम्बे पेड का कारक सूर्य है। मेष के १० अंश पर उच्च और तुला के १० अंश पर नीच माना जाता है। सूर्य का भचक्र के अनुसार मूल त्रिकोण [[सिंह]] पर ० अंश से लेकर १० अंश तक शक्तिशाली फ़लदायी होता है। सूर्य के देवता भगवान [[शिव]] हैं। सूर्य का मौसम गर्मी की ऋतु है। सूर्य के नक्षत्र [[कृत्तिका|कृतिका]] का फ़ारसी नाम सुरैया है। और इस नक्षत्र से शुरु होने वाले नाम ’अ’ ई उ ए अक्षरों से चालू होते हैं। इस नक्षत्र के तारों की संख्या अनेक है। इसका एक दिन में भोगने का समय एक घंटा है। == सूर्य देव का व्रत == दे्खें [[इतवार व्रत कथा|रविवार व्रत कथा]] == सूर्य का अन्य ग्रहों से आपसी सम्बन्ध == * [[चन्द्रमा|चन्द्र]] के साथ इसकी मित्रता है।[[अमावस्या]] के दिन यह अपने आगोश में लेलेता है। * [[मंगल]] भी सूर्य का मित्र है। * [[बुध (बहुविकल्पी)|बुध]] भी सूर्य का मित्र है तथा हमेशा सूर्य के आसपास घूमा करता है। * [[गुरु]] [[बृहस्पति]] यह सूर्य का परम मित्र है, दोनो के संयोग से [[जीवात्मा]] का संयोग माना जाता है। गुरु जीव है तो सूर्य आत्मा. * [[शनि]] सूर्य का पुत्र है लेकिन दोनो की आपसी दुश्मनी है, जहां से सूर्य की सीमा समाप्त होती है, वहीं से शनि की सीमा चालू हो जाती है।"छाया मर्तण्ड सम्भूतं" के अनुसार सूर्य की पत्नी [[छाया]] से [[शनि]] की उतपत्ति मानी जाती है। सूर्य और [[शनि]] के मिलन से जातक कार्यहीन हो जाता है, सूर्य [[आत्मा]] है तो [[शनि]] कार्य, [[आत्मा]] कोई काम नहीं करती है। इस [[युति]] से ही [[कर्म]] हीन विरोध देखने को मिलता है। * [[शुक्र]] [[रजस्|रज]] है सूर्य गर्मी स्त्री [[जातक]] और पुरुष [[जातक]] के आमने सामने होने पर [[रजस्|रज]] जल जाता है। सूर्य का शत्रु है। * [[राहु]] सूर्य का दुश्मन है। एक साथ होने पर [[जातक]] के पिता को विभिन्न समस्याओं से ग्रसित कर देता है। * [[केतु]] यह सूर्य से सम है। === सूर्य का अन्य ग्रहों के साथ होने पर ज्योतिष से किया जाने वाला फ़ल कथन === * सूर्य और [[चन्द्रमा|चन्द्र]] दोनो के एक साथ होने पर सूर्य को पिता और [[चन्द्रमा|चन्द्र]] को यात्रा मानने पर पिता की यात्रा के प्रति कहा जा सकता है। सूर्य [[राज्य]] है तो [[चन्द्रमा|चन्द्र]] यात्रा , राजकीय यात्रा भी कही जा सकती है। एक संतान की उन्नति जन्म स्थान से बाहर होती है। * सूर्य और [[मंगल]] के साथ होने पर [[मंगल]] [[शक्ति]] है अभिमान है, इस प्रकार से पिता शक्तिशाली और प्रभावी होता है।[[मंगल]] भाई है तो वह सहयोग करेगा,[[मंगल]] [[रक्त]] है तो पिता और पुत्र दोनो में रक्त सम्बन्धी बीमारी होती है, ह्रदय रोग भी हो सकता है। दोनो ग्रह १-१२ या १७ में हो तो यह जरूरी हो जाता है। स्त्री चक्र में पति प्रभावी होता है, गुस्सा अधिक होता है, परन्तु आपस में [[प्यार|प्रेम]] भी अधिक होता है,[[मंगल]] पति का कारक बन जाता है। * सूर्य और [[बुध (बहुविकल्पी)|बुध]] में [[बुध (बहुविकल्पी)|बुध]] ज्ञानी है, बली होने पर [[राजनयिक दूत|राजदूत]] जैसे पद मिलते है, पिता पुत्र दोनो ही ज्ञानी होते हैं।[[समाज]] में [[प्रतिष्ठा]] मिलती है। जातक के अन्दर [[वासना]] का [[भंडार]] होता है, दोनो मिलकर नकली [[मंगल]] का रूप भी धारण करलेता है। पिता के बहन हो और पिता के पास भूमि भी हो, पिता का सम्बन्ध किसी महिला से भी हो। * सूर्य और [[गुरु]] के साथ होने पर सूर्य [[आत्मा]] है,[[गुरु]] जीव है। इस प्रकार से यह संयोग एक [[जीवात्मा]] संयोग का रूप ले लेता है।[[जातक]] का जन्म ईश्वर अंश से हो, मतलब [[परिवार]] के किसी [[पूर्वज]] ने आकर जन्म लिया हो,[[जातक]] में दूसरों की सहायता करने का हमेशा [[मानस]] बना रहे, और [[जातक]] का [[यश]] चारो तरफ़ फ़ैलता रहे, सरकारी क्षेत्रों में जातक को पदवी भी मिले। [[जातक]] का पुत्र भी उपरोक्त कार्यों में संलग्न रहे, पिता के पास [[मंत्री]] जैसे काम हों, स्त्री चक्र में उसको सभी प्रकार के सुख मिलते रहें, वह आभूषणों आदि से कभी दुखी न रहे, उसे अपने घर और [[ससुराल]] में सभी प्रकार के मान सम्मान मिलते रहें. * सूर्य और [[शुक्र]] के साथ होने पर सूर्य पिता है और [[शुक्र]] भवन, वित्त है, अत: पिता के पास वित्त और भवन के साथ सभी प्रकार के भौतिक सुख हों, पुत्र के बारे में भी यह कह सकते हैं।[[शुक्र]] [[रजस्|रज]] है और सूर्य गर्मी अत: पत्नी को [[गर्भपात]] होते रहें, संतान कम हों,१२ वें या दूसरे भाव में होने पर आंखों की बीमारी हो, एक आंख का भी हो सकता है। ६ या ८ में होने पर जीवन साथी के साथ भी यह हो सकता है। स्त्री चक्र में पत्नी के एक बहिन हो जो जातिका से बडी हो, जातक को राज्य से धन मिलता रहे, सूर्य जातक [[शुक्र]] पत्नी की सुन्दरता बहुत हो। [[शुक्र]] [[वीर्य]] है और सूर्य गर्मी जातक के संतान पैदा नहीं हो। स्त्री की कुन्डली में जातिका को मूत्र सम्बन्धी बीमारी देता है। अस्त [[शुक्र]] स्वास्थ्य खराब करता है। * सूर्य और [[शनि]] के साथ होने पर [[शनि]] [[कर्म]] है और सूर्य राज्य, अत: जातक के पिता का कार्य सरकारी हो, सूर्य पिता और [[शनि]] [[जातक]] के जन्म के समय काफ़ी परेशानी हुई हो। पिता के सामने रहने तक पुत्र आलसी हो, पिता और पुत्र के साथ रहने पर उन्नति नहीं हो। वैदिक [[ज्योतिष]] में इसे [[पितृ दोष]] माना जाता है। अत: जातक को रोजाना [[गायत्री]] का जाप २४ या १०८ बार करना चाहिये। * सूर्य और [[राहु]] के एक साथ होने पर सूचना मिलती है कि जातक के [[पितामह]] प्रतिष्ठित व्यक्ति होने चाहिये, एक पुत्र सूर्य अनैतिक [[राहु]] हो, कानून विरुद्ध जातक कार्य करता हो, पिता की मौत [[दुर्घटना]] में हो, जातक के जन्म के समय में पिता को चोट लगे,[[जातक]] को संतान कठिनाई से हो, पिता के किसी भाई को अनिष्ठ हो। शादी में अनबन हो। * सूर्य और [[केतु]] साथ होने पर पिता और पुत्र दोनों धार्मिक हों, कार्यों में कठिनाई हो, पिता के पास भूमि हो लेकिन किसी काम की नहीं हो। === सूर्य के साथ अन्य ग्रहों के अटल नियम जो कभी असफ़ल नही हुये === * सूर्य [[मंगल]] [[गुरु]]=[[सर्जन]] * सूर्य [[मंगल]] [[राहु]]=[[कुष्ठरोग|कुष्ठ रोग]] * सूर्य [[मंगल]] [[शनि]] [[केतु]]=पिता अन्धे हों * सूर्य के आगे [[शुक्र]] = [[धन]] हों. * सूर्य के आगे [[बुध (बहुविकल्पी)|बुध]] = [[जमीन]] हो। * सूर्य [[केतु]] =पिता राजकीय सेवा में हों,[[साधु]] स्वभाव हो,[[आचार्य|अध्यापक]] का कार्य भी हो सकता है। * सूर्य [[बृहस्पति]] के आगे = जातक पिता वाले कार्य करे. * सूर्य [[शनि]] [[शुक्र]] [[बुध (बहुविकल्पी)|बुध]] =[[पेट्रोल]],[[डीज़ल|डीजल]] वाले काम। * सूर्य [[राहु]] [[गुरु]] =[[मस्जिद]] या [[चर्च]] का अधिकारी. * सूर्य के आगे [[मंगल]] [[राहु]] हों तो [[पैतृक सम्पत्ति]] समाप्त. === बारह भावों में सूर्य की स्थिति === * प्रथम भाव में सूर्य -स्वाभिमानी, शूरवीर, पर्यटन प्रिय, क्रोधी परिवार से व्यथित, धन में कमी ,[[वायु]] [[पित्त]] आदि से [[शरीर]] में कमजोरी. * दूसरे भाव में सूर्य - भाग्यशाली, पूर्ण सुख की प्राप्ति, धन अस्थिर लेकिन उत्तम कार्यों के अन्दर व्यय, स्त्री के कारण परिवार में कलह, मुख और नेत्र रोग, पत्नी को ह्रदय रोग. शादी के बाद जीवन साथी के पिता को हानि. * तीसरे भाव में सूर्य - [[प्रतापी]], [[पराक्रमी]], [[विद्वान]], [[विचारवान]], [[कवि]], [[राज्यसुख]], मुकद्दमे में विजय, भाइयों के अन्दर [[राजनीति]] होने से परेशानी. * चौथे भाव में सूर्य - [[हृदय|ह्रदय]] में जलन, शरीर से सुन्दर, [[गुप्त विद्या]] प्रेमी, विदेश गमन, राजकीय [[चुनाव]] आदि में विजय, [[युद्ध]] वाले कारण, मुकद्दमे आदि में पराजित, व्यथित मन. * पंचम भाव में सूर्य - [[कुशाग्र बुद्धि]], धीरे धीरे धन की प्राप्ति, पेट की बीमारियां, राजकीय शिक्षण संस्थानो से लगाव,[[मोतीझारा]],[[मलेरिया]] बुखार. * छठवें भाव में सूर्य - [[निरोगी]] [[न्यायवान]], [[शत्रु नाशक]], [[मातृकुल]] से कष्ट. * सप्तम भाव में सूर्य - [[कठोर]] [[आत्म रत]], [[राज्य वर्ग]] से पीडित,[[व्यापार]] में [[हानि]], [[स्त्री कष्ट]]. * आठवें भाव में सूर्य - [[धनी]], [[धैर्यवान]], काम करने के अन्दर [[गुस्सा]], [[चिंता|चिन्ता]] से [[हृदय रोग|ह्रदय रोग]], [[आलस्य]] से [[धन]] नाश, नशे आदि से स्वास्थ्य खराब. * नवें भाव में सूर्य - [[योगी]], [[तपस्वी]], [[ज्योतिषी]],[[साधक]],[[सुखी]], लेकिन स्वभाव से [[क्रूर]]. * दसवें भाव में सूर्य - [[व्यवहार कुशल]], राज्य से सम्मान, [[उदार]], [[ऐश्वर्य]], माता को [[नकारात्मक]] विचारों से कष्ट, अपने ही लोगों से बिछोह. * ग्यारहवें भाव में सूर्य - धनी, सुखी ,[[बलवान]] , [[स्वाभिमानी]], [[सदाचारी]], [[शत्रुनाशक]], अनायास सम्पत्ति की प्राप्ति, पुत्र की पत्नी या पुत्री के पति ([[दामाद]]) से कष्ट. * बारहवें भाव में सूर्य - [[उदासीन]], [[आलसी]], [[नेत्र रोगी]], [[मस्तिष्क रोगी]], लडाई झगडे में [[विजय]],[[बहस]] करने की आदत. == हस्त रेखा में सूर्य == जीवन में पडने वाले प्रभाव को हथेली में [[अनामिका]] उंगली की जड में सूर्य पर्वत और उस पर बनी रेखाओं को देख कर सूर्य की स्थिति का पता लगाया जा सकता है। सूर्य [[पर्वत]] पर बनी रेखायें ही [[सूर्य रेखा]] या सूर्य रेखायें कहलाती है।[[अनामिका]] उंगली के [[तर्जनी]] से लम्बी होने की स्थिति में ही व्यक्ति के राजकीय जीवन का फ़ल कथन किया जाता है। उन्नत पर्वत होने पर और पर्वत के मध्य सूक्ष्म गोल [[बिंदु|बिन्दु]] होने पर पर्वत के गुलाबी रंग का होने पर प्रतिष्ठ्त [[पद]] का कथन किया जाता है। इसी [[पर्वत]] के नीचे [[विवाह]] रेखा के उदय होने पर [[विवाह]] में [[राजनीति]] के चलते [[विवाह]] टूटने और [[अनैतिक]] सम्बन्धों की जानकारी मिलती है।<ref>{{cite book |title=Aruṇa saṃhita, lāla kitāba |date=1997 |publisher=Hare Kr̥shṇa Ṭrasṭa |url=https://books.google.co.in/books?id=65kqAAAAMAAJ&q=%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4+%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&dq=%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4+%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjY_96H_qDcAhWHP48KHckWBRgQ6AEIRTAE |accessdate=15 जुलाई 2018 |language=hi |archive-url=https://web.archive.org/web/20180715152017/https://books.google.co.in/books?id=65kqAAAAMAAJ&q=%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4+%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&dq=%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4+%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjY_96H_qDcAhWHP48KHckWBRgQ6AEIRTAE |archive-date=15 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> == अंकशास्त्र में सूर्य == [[ज्योतिष]] विद्याओं में [[अंक विद्या]] भी एक महत्वपूर्ण [[विद्या]] है। जिसके द्वारा हम थोडे समय में ही प्रश्न कर्ता के उत्तर दे सकते है।<ref>{{cite book |last1=Pāṇḍeya |first1=Surendra Kumāra |last2=Ekeḍemī |first2=Hindustānī |title=Sūrya vimarśa |date=2009 |publisher=Hindustānī Ekeḍemī |url=https://books.google.co.in/books?id=gD4qAQAAMAAJ&q=%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&dq=%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjuxqbJ_aDcAhVKQ48KHUX3BUYQ6AEIJjAA |accessdate=15 जुलाई 2018 |language=hi |archive-url=https://web.archive.org/web/20180715152045/https://books.google.co.in/books?id=gD4qAQAAMAAJ&q=%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&dq=%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwjuxqbJ_aDcAhVKQ48KHUX3BUYQ6AEIJjAA |archive-date=15 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> [[अंक विद्या]] में "१" का अंक सूर्य को प्राप्त हुआ है। जिस [[तारीख]] को आपका जन्म हुआ है, उन तारीखों में अगर आपकी जन्म तारीख १,१०,१९,२८, है तो आपका [[भाग्यांक]] सूर्य का नम्बर "१" ही माना जायेगा.इसके अलावा जो आपका [[कार्मिक नम्बर]] होगा वह जन्म [[तारीख]],[[महिना]], और पूरा सन जोड़ने के बाद जो प्राप्त होगा, साथ ही कुल मिलाकर अकेले नम्बर को जब सामने लायेंगे, और वह नम्बर एक आता है तो [[कार्मिक नम्बर]] ही माना जायेगा।<ref>{{cite book |last1=Aharoni |first1=Ruth |title=Karmic Astrology: Past Lives, Present Loves |date=2007 |publisher=Llewellyn Worldwide |isbn=9780738709673 |url=https://books.google.co.in/books?id=-_gnuJfZzdUC&pg=PT173&dq=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%B0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwiUnKfm_aDcAhXFvo8KHSysD9AQ6AEIQjAF#v=onepage&q=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95%20%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%B0&f=false |accessdate=15 जुलाई 2018 |language=en |archive-url=https://web.archive.org/web/20180715152056/https://books.google.co.in/books?id=-_gnuJfZzdUC&pg=PT173&dq=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95+%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%B0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwiUnKfm_aDcAhXFvo8KHSysD9AQ6AEIQjAF#v=onepage&q=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95%20%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%B0&f=false |archive-date=15 जुलाई 2018 |url-status=live }}</ref> जिन लोगों के जन्म तारीख के हिसाब से "१" नम्बर ही आता है उनके नाम अधिकतर ब, म, ट, और द से ही चालू होते देखे गये हैं। अम्क १ शुरुआती नम्बर है, इसके बिना कोई भी अंक चालू नहीं हो सकता है। इस अंक वाला जातक [[स्वाभिमानी]] होता है, उसके अन्दर केवल अपने ही अपने लिये सुनने की आदत होती है। जातक के अन्दर [[ईमानदारी]] भी होती है, और वह किसी के सामने झुकने के लिये कभी राजी नहीं होता है। वह किसी के अधीन नहीं रहना चाहता है और सभी को अपने अधीन रखना चाहता है। अगर अंक १ वाला जातक अपने ही अंक के अधीन होकर यानी अपने ही अंक की तारीखों में काम करता है तो उसको सफ़लता मिलती चली जाती है। सूर्य प्रधान जातक बहुत [[तेजस्वी]] [[सदगुणी]] [[विद्वान]] [[उदार स्वभाव]] [[दयालु]], और [[मनोबल]] में [[आत्मबल]] से पूर्ण होता है। वह अपने कार्य स्वत: ही करता है किसी के भरोसे रह कर काम करना उसे नहीं आता है। वह सरकारी [[नौकरी]] और सरकारी कामकाज के प्रति समर्पित होता है। वह अपने को अल्प समय में ही कुशल [[प्रसाशक]] बनालेता है। सूर्य प्रधान जातक में कुछ बुराइयां भी होतीं हैं। जैसे [[अभिमान (1973 फ़िल्म)|अभिमान]],[[लोभ]],[[अविनय]],[[आलस्य]],[[बाह्य दिखावा]],[[जल्दबाजी]],[[अहंकार]], आदि [[दुर्गुण]] उसके जीवन में भरे होते हैं। इन दुर्गुणों के कारण उसका विकाश सही तरीके से नहीं हो पाता है। साथ ही अपने दुश्मनो को नहीं पहिचान पाने के कारण उनसे परेशानी ही उठाता रहता है। हर काम में दखल देने की आदत भी जातक में होती है। और सब लोगों के काम के अन्दर टांग अडाने के कारण वह अधिक से अधिक दुश्मनी भी पैदा कर लेता है। == सूर्य ग्रह सम्बन्धी अन्य विवरण == सूर्य प्रत्यक्ष [[देवता]] है, सम्पूर्ण [[ब्रह्माण्ड|जगत]] के [[आँख|नेत्र]] हैं। इन्ही के द्वारा दिन और रात का सृजन होता है। इनसे अधिक निरन्तर साथ रहने वाला और कोई [[देवता]] नहीं है। इन्ही के [[उदय]] होने पर सम्पूर्ण [[ब्रह्माण्ड|जगत]] का [[उदय]] होता है, और इन्ही के [[अस्त]] होने पर समस्त [[ब्रह्माण्ड|जगत]] सो जाता है। इन्ही के उगने पर लोग अपने घरों के किवाड खोल कर आने वाले का [[स्वागत]] करते हैं, और [[अस्त]] होने पर अपने घरों के किवाड बन्द कर लेते हैं। सूर्य ही [[कालचक्र]] के प्रणेता है। सूर्य से ही [[दिन]] [[रात]] [[पल]] [[मास]] [[पक्ष]] तथा [[संवत]] आदि का विभाजन होता है। सूर्य सम्पूर्ण संसार के [[प्रकाशक]] हैं। इनके बिना अन्धकार के अलावा और कुछ नहीं है। सूर्य [[आत्माकारक]] [[ग्रह]] है, यह [[राज्य]] सुख,[[सत्ता]],[[ऐश्वर्य]],[[वैभव]],[[अधिकार]], आदि प्रदान करता है। यह [[सौर मण्डल|सौरमंडल]] का प्रथम [[ग्रह]] है, कारण इसके बिना उसी प्रकार से हम सौरजगत को नहीं जान सकते थे, जिस प्रकार से माता के द्वारा पैदा नहीं करने पर हम संसार को नहीं जान सकते थे। सूर्य सम्पूर्ण सौर जगत का [[आधार स्तम्भ]] है। अर्थात सारा [[सौर मण्डल|सौर मंडल]],[[ग्रह]],[[उपग्रह]],[[नक्षत्र]] आदि सभी सूर्य से ही शक्ति पाकर इसके इर्द गिर्द घूमा करते है, यह [[सिंह]] राशि का स्वामी है,[[परमात्मा]] ने सूर्य को [[ब्रह्माण्ड|जगत]] में [[प्रकाश]] करने,[[संचालन]] करने, अपने [[तेज]] से शरीर में ज्योति प्रदान करने, तथा [[जठराग्नि]] के रूप में [[आमाशय (पेट)|आमाशय]] में [[अन्न]] को पचाने का कार्य सौंपा है।<ज्योतिष< शास्त्र में सूर्य को [[मस्तिष्क]] का [[अधिपति]] बताया गया है,[[ब्रह्माण्ड]] में विद्यमान [[प्रज्ञा शक्ति]] और [[चेतना]] तरंगों के द्वारा [[मस्तिष्क]] की गतिशीलता उर्वरता और सूक्षमता के विकाश और विनाश का कार्य भी सूर्य के द्वारा ही होता है। यह संसार के सभी जीवों द्वारा किये गये सभी कार्यों का साक्षी है। और [[न्यायाधीश]] के सामने [[साक्ष्य]] प्रस्तुत करने जैसा काम करता है। यह [[जातक]] के [[हृदय|ह्रदय]] के अन्दर उचित और अनुचित को बताने का काम करता है, किसी भी अनुचित कार्य को करने के पहले यह [[जातक]] को मना करता है, और अंदर की [[आत्मा]] से आवाज देता है। साथ ही जान बूझ कर गलत काम करने पर यह [[हृदय|ह्रदय]] और हड्डियों में कम्पन भी प्रदान करता है। गलत काम को रोकने के लिये यह [[हृदय|ह्रदय]] में [[साहस]] का [[संचार]] भी करता है। * जो जातक अपनी [[शक्ति]] और [[अंहकार]] से चूर होकर जानते हुए भी निन्दनीय कार्य करते हैं, दूसरों का [[शोषण]] करते हैं, और माता पिता की सेवा न करके उनको नाना प्रकार के कष्ट देते हैं, सूर्य उनके इस कार्य का भुगतान उसकी [[विद्या]],[[यश]], और [[धन]] पर पूर्णत: रोक लगाकर उसे बुद्धि से दीन हीन करके पग पग पर अपमानित करके उसके द्वारा किये गये कर्मों का भोग करवाता है। आंखों की रोशनी का अपने प्रकार से हरण करने के बाद भक्ष्य और अभक्ष्य का भोजन करवाता है, ऊंचे और नीचे स्थानों पर गिराता है, चोट देता है। * श्रेष्ठ कार्य करने वालों को [[सदबुद्धि]],[[विद्या]],[[धन]], और [[यश]] देकर जगत में नाम देता है, लोगों के अन्दर [[इज्जत]] और [[मीटर|मान]] [[सम्मान]] देता है। उन्हें उत्तम [[यश]] का भागी बना कर भोग करवाता है। जो लोग [[आध्यात्मिकता|आध्यात्म]] में अपना मन लगाते हैं, उनके अन्दर [[भगवान]] की छवि का रसस्वादन करवाता है। सूर्य से लाल स्वर्ण रंग की किरणें न मिलें तो कोई भी [[वनस्पति]] उत्पन्न नहीं हो सकती है। इन्ही से यह [[ब्रह्माण्ड|जगत]] स्थिर रहता है,[[चेष्टाशील]] रहता है, और सामने दिखाई देता है। * [[जातक]] अपना हाथ देख कर अपने बारे में स्वयं निर्णय कर सकता है, यदि [[सूर्य रेखा]] हाथ में बिलकुल नहीं है, या मामूली सी है, तो उसके फ़लस्वरूप उसकी [[विद्या]] कम होगी, वह जो भी पढेगा वह कुछ कल बाद भूल जायेगा,[[धनवान]] [[धन]] को नहीं रोक पायेंगे, पिता पुत्र में विवाद होगा, और अगर इस रेखा में [[द्वीप]] आदि है तो निश्चित रूप से गलत इल्जाम लगेंगे.[[अपराध]] और कोई करेगा और [[सजा]] [[जातक]] को भुगतनी पडेगी. * सूर्य क्रूर ग्रह भी है, और [[जातक]] के स्वभाव में तीव्रता देता है। यदि [[ग्रह]] [[तुला राशि]] में नीच का है तो वह तीव्रता [[जातक]] के लिये [[घातक]] होगी, दुनियां की कोई [[औषिधि]],[[यंत्र]],[[जडी]],[[बूटी]] नहीं है जो इस तीव्रता को कम कर सके। केवल सूर्य [[मन्त्र|मंत्र]] में ही इतनी [[शक्ति]] है, कि जो इस तीव्रता को कम कर सकता है। * सूर्य [[जीव]] मात्र को [[प्रकाश]] देता है। जिन जातकों को सूर्य [[आत्मप्रकाश]] नहीं देता है, वे गलत से गलत औ निंदनीय कार्य क बैठते है। और यह भी याद रखना चाहिये कि जो [[कर्म]] कर दिया गया है, उसका [[भुगतान]] तो करना ही पडेगा.जिन जातकों के हाथ में [[सूर्य रेखा]] प्रबल और साफ़ होती है, उन्हे समझना चाहिये कि सूर्य उन्हें पूरा बल दे रहा है। इस प्रकार के जातक कभी गलत और निन्दनीय कार्य नहीं कर सकते हैं। उनका [[ओज]] और [[तेज]] सराहनीय होता है। === सूर्य ग्रह से प्रदान किये जाने वाले रोग === [[जातक]] के गल्ती करने और आत्म विश्लेषण के बाद जब निन्दनीय कार्य किये जाते हैं, तो सूर्य उन्हे बीमारियों और अन्य तरीके से प्रताडित करने का काम करता है, सबसे बड़ा [[रोग]] निवारण का उपाय है कि किये जाने वाले गलत और निन्दनीय कार्यों के प्रति पश्चाताप, और फ़िर से नहीं करने की [[कसम]], और जब प्रायश्चित कर लिया जाय तो रोगों को निवारण के लिये [[रत्न]],[[जडी]], बूटियां, आदि धारण की जावें, और मंत्रों का नियमित जाप किया जावे.सूर्य [[ग्रह]] के द्वारा प्रदान कियेजाने वाले रोग है- [[सिरदर्द|सिर दर्द]],[[ज्वर|बुखार]], नेत्र विकार,[[मधुमेह]],[[मोतीझारा]],[[पित्त रोग]],[[हैजा]],[[हिचकी]]. यदि [[औषिधि]] सेवन से भी रोग ना जावे तो समझ लेना कि सूर्य की दशा या अंतर्दशा लगी हुई है। और बिना किसी से पूंछे ही [[मन्त्र|मंत्र]] [[जाप]],[[रत्न]] या [[जडी]] [[बूटी]] का प्रयोग कर लेना चाहिये। इससे [[रोग]] हल्का होगा और ठीक होने लगेगा। == सूर्य ग्रह के रत्न उपरत्न == सूर्य ग्रह के रत्नों में माणिक और उपरत्नो में लालडी, तामडा, और महसूरी.पांच रत्ती का रत्न या उपरत्न रविवार को कृत्तिका नक्षत्र में अनामिका उंगली में सोने में धारण करनी चाहिये। इससे इसका दुष्प्रभाव कम होना चालू हो जाता है। और अच्छा रत्न पहिनते ही चालीस प्रतिशत तक फ़ायदा होता देखा गया है। रत्न की विधि विधान पूर्वक उसकी ग्रहानुसार प्राण प्रतिष्ठा अगर नहीं की जाती है, तो वह रत्न प्रभाव नहीं दे सकता है। इसलिये रत्न पहिनने से पहले अर्थात अंगूठी में जडवाने से पहले इसकी प्राण प्रतिष्ठा करलेनी चाहिये। क्योंकि पत्थर तो अपने आप में पत्थर ही है, जिस प्रकार से मूर्तिकार मूर्ति को तो बना देता है, लेकिन जब उसे मन्दिर में स्थापित किया जाता है, तो उसकी विधि विधान पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद ही वह मूर्ति अपना असर दे सकती है। इसी प्रकार से अंगूठी में रत्न तभी अपना असर देगा जब उसकी विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा की जायेगी. == सूर्य ग्रह की जडी बूटियां == बेल पत्र जो कि शिवजी पर चढाये जाते है, आपको पता होगा, उसकी जड रविवार को हस्त या कृत्तिका नक्षत्र में लाल धागे से पुरुष दाहिने बाजू में और स्त्रियां बायीं बाजू में बांध लें, इस के द्वारा जो रत्न और उपरत्न खरीदने में अस्मर्थ है, उनको भी फ़ायदा होगा। == सूर्य ग्रह के लिये दान == सूर्य ग्रह के दुष्प्रभाव से बचने के लिये अपने बजन के बराबर के गेंहूं, लाल और पीले मिले हुए रंग के वस्त्र, लाल मिठाई, सोने के रबे, कपिला गाय, गुड और तांबा धातु, श्रद्धा पूर्वक किसी गरीब ब्राहमण को बुलाकर विधि विधान से संकल्प पूर्वक दान करना चाहिये। == सूर्य ग्रह से प्रदत्त व्यापार और नौकरी == स्वर्ण का व्यापार, हथियारों का निर्माण, ऊन का व्यापार, पर्वतारोहण प्रशिक्षण, औषधि विक्रय, जंगल की ठेकेदारी, लकड़ी या फ़र्नीचर बेचने का काम, बिजली वाले सामान का व्यापार आदि सूर्य ग्रह की सीमा रेखा में आते है। शनि के साथ मिलकर हार्डवेयर का काम, शुक्र के साथ मिलकर पेन्ट और रंगरोगन का काम, बुध के साथ मिलकर रुपया पैसा भेजने और मंगाने का काम, आदि हैं। सचिव, उच्च अधिकारी, मजिस्ट्रेट, साथ ही प्रबल राजयोग होने पर राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, राज्य मंत्री, संसद सदस्य, इन्जीनियर, न्याय सम्बन्धी कार्य, राजदूत, और व्यवस्थापक आदि के कार्य नौकरी के क्षेत्र में आते हैं। सूर्य की कमजोरी के लिये सूर्य के सामने खडे होकर नित्य सूर्य स्तोत्र, सूर्य गायत्री, सूर्य मंत्र आदि का जाप करना हितकर होता है। == सूर्य के लिये आदित्य मंत्र == * विनियोग :- ऊँ आकृष्णेनि मन्त्रस्य हिरण्यस्तूपांगिरस ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्द: सूर्यो देवता सूर्यप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: * देहान्गन्यास :- आकृष्णेन शिरसि, रजसा ललाटे, वर्तमानो मुखे, निवेशयन ह्रदये, अमृतं नाभौ, मर्त्यं च कट्याम, हिरण्येन सविता ऊर्व्वौ, रथेना जान्वो:, देवो याति जंघयो:, भुवनानि पश्यन पादयो:. * करन्यास :- आकृष्णेन रजसा अंगुष्ठाभ्याम नम:, वर्तमानो निवेशयन तर्जनीभ्याम नम:, अमृतं मर्त्यं च मध्यामाभ्याम नम:, हिरण्ययेन अनामिकाभ्याम नम:, सविता रथेना कनिष्ठिकाभ्याम नम:, देवो याति भुवनानि पश्यन करतलपृष्ठाभ्याम नम: * ह्रदयादिन्यास :- आकृष्णेन रजसा ह्रदयाय नम:, वर्तमानो निवेशयन शिरसे स्वाहा, अमृतं मर्त्यं च शिखायै वषट, हिरण्येन कवचाय हुम, सविता रथेना नेत्रत्र्याय वौषट, देवो याति भुवनानि पश्यन अस्त्राय फ़ट (दोनो हाथों को सिर के ऊपर घुमाकर दायें हाथ की पहली दोनों उंगलियों से बायें हाथ पर ताली बजायें. * ध्यानम :- पदमासन: पद मकरो द्विबाहु: पद मद्युति: सप्ततुरंगवाहन:। दिवाकरो लोकगुरु: किरीटी मयि प्रसादं विदधातु देव: ॥ * सूर्य गायत्री :- ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात. * सूर्य बीज मंत्र :- ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: ऊँ भूभुर्व: स्व: ऊँ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्तंच। हिण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन ऊँ स्व: भुव: भू: ऊँ स: ह्रौं ह्रीं ह्रां ऊँ सूर्याय नम: ॥ * सूर्य जप मंत्र :- ऊँ ह्राँ ह्रीँ ह्रौँ स: सूर्याय नम:। नित्य जाप ७००० प्रतिदिन। === सूर्याष्टक स्तोत्र === * आदि देव: नमस्तुभ्यम प्रसीद मम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यम प्रभाकर नमोअस्तु ते ॥ * सप्त अश्व रथम आरूढम प्रचंडम कश्यप आत्मजम। श्वेतम पदमधरम देवम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥ * लोहितम रथम आरूढम सर्वलोकम पितामहम। महा पाप हरम देवम त्वम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥ * त्रैगुण्यम च महाशूरम ब्रह्मा विष्णु महेश्वरम। महा पाप हरम देवम त्वम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥ * बृंहितम तेज: पुंजम च वायुम आकाशम एव च। प्रभुम च सर्वलोकानाम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥ * बन्धूक पुष्प संकाशम हार कुण्डल भूषितम। एक-चक्र-धरम देवम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥ * तम सूर्यम जगत कर्तारम महा तेज: प्रदीपनम। महापाप हरम देवम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥ * सूर्य-अष्टकम पठेत नित्यम ग्रह-पीडा प्रणाशनम। अपुत्र: लभते पुत्रम दरिद्र: धनवान भवेत ॥ * आमिषम मधुपानम च य: करोति रवे: दिने। सप्त जन्म भवेत रोगी प्रतिजन्म दरिद्रता ॥ * स्त्री तैल मधु मांसानि य: त्यजेत तु रवेर दिने। न व्याधि: शोक दारिद्रयम सूर्यलोकम गच्छति ॥ * सूर्याष्टक सिद्ध स्तोत्र है, प्रात: स्नानोपरान्त तांबे के पात्र से सूर्य को अर्घ देना चाहिये, तदोपरान्त सूर्य के सामने खडे होकर सूर्य को देखते हुए १०८ पाठ नित्य करने चाहिये। नित्य पाठ करने से मान, सम्मान, नेत्र ज्योति जीवनोप्रयन्त बनी रहेगी. ==इन्हें भी देखें == {{Commonscat|Surya|सूर्य देवता}} * [[सूर्य]] * [[सूर्य नमस्कार]] * [[इतवार व्रत कथा|रविवार व्रत कथा]] == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची|2}} {{नवग्रह}} {{सूर्य मंदिर}} {{हिन्दू देवी-देवता}} {{वैदिक साहित्य}} {{Authority control}} [[श्रेणी:ज्योतिष]] [[श्रेणी:सूर्य देव]]
सारांश:
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