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{{धर्म प्राथमिक|date=दिसम्बर 2014}} [[File:Arjuna travels to Swarga.jpg|thumb|महाभारत में अर्जुन स्वर्ग जाते हुए।]] '''स्वर्ग लोक''' या '''देवलोक''' हिन्दू मान्यता के अनुसार [[ब्रह्माण्ड]] के उस स्थान को कहते हैं जहाँ हिन्दू देवी-देवताओं का वास है। [[रघुवंशम्]] महाकाव्य में [[कालिदास|महाकवि कालिदास]] स्मृद्धिशाली राज्य को ही स्वर्ग की [[उपमा अलंकार|उपमा]] देते हैं। '''तद्रक्ष कल्याणपरम्पराणां भोक्तारमूर्जस्वलमात्मदेहम्।''' '''महीतलस्पर्शनमात्रभिन्नमृद्धं हि राज्यं पदमैन्यमाहुः।।<ref>रघुवंशमहाकाव्यम्, सर्गः २, श्लो. ५०</ref>''' अर्थात् हे राजन्! तुम उत्तरोत्तर सुखों का भोग करने वाले अत्यन्त बल से युक्त अपने शरीर की रक्षा करो, क्योंकि विद्वान् लोग समृद्धिशाली राज्यो को केवल पृथ्वीतल के सम्बन्ध होने से अलग हुआ इन्द्रसम्बन्धी स्थान (स्वर्ग) कहते हैं। [[हिन्दू धर्म]] में [[विष्णु पुराण]] के अनुसार, '''कृतक त्रैलोक्य''' -- भूः, भुवः और स्वः – ये तीनों लोक मिलकर कृतक त्रैलोक्य कहलाते हैं। सूर्य और ध्रुव के बीच जो चौदह लाख योजन का अन्तर है, उसे स्वर्लोक कहते हैं। [[हिन्दू धर्म|हिंदु]] धर्म में, [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] शब्द '''स्वर्ग''' को [[मेरु पर्वत]] के ऊपर के लोकों हेतु प्रयुक्त होता है। यह वह स्थान है, जहाँ पुण्य करने वाला, अपने पुण्य क्षीण होने तक, अगले जन्म लेने से पहले तक रहता है। यह स्थान उन [[आत्मा]]ओं हेतु नियत है, जिन्होंने पुण्य तो किए हैं, परंतु उन्में अभी [[मोक्ष]] या [[मुक्ति]] नहीं मिलनी है। यहाँ सब प्रकार के आनंद हैं, एवं पापों से परे रहते हैं। इसकी राजधानी है [[अमरावती]], जिसका द्वारपाल है, [[इन्द्र|इंद्र]] का वाहन [[ऐरावत]]। यहाँ के राजा हैं, [[इन्द्र|इंद्र]], देवताओं के प्रधान। == सन्दर्भ == {{टिप्पणीसूची}} {{HinduMythology}} {{हिन्दू पृथ्वी}} [[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]
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