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हरिवंशराय बच्चन-प्रतीक्षा
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'''प्रतीक्षा : [[हरिवंश राय बच्चन|हरिवंशराय बच्चन]]''' '''मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?''' <br /> मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर, <br /> अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर <br /> और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं, <br /> कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता? <br /> तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले, <br /> पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले, <br /> साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं, <br /> मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता? <br /> उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले, <br /> अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले, <br /> तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से, <br /> मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता? <br /> बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती, <br /> रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती, <br /> नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता, <br /> अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता? <br /> [[श्रेणी:पद्य]]
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