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{{pp-template|small=yes}}{{निर्वाचित लेख}} {{ज्ञानसन्दूक त्योहार | त्योहार_के_नाम = होली |चित्र = Holi Festival of Colors Utah, United States 2013.jpg |शीर्षक = [[यूटा]], संयुक्त राज्य में होली का उत्सव |आधिकारिक_नाम = होली |अन्य_नाम = फगुआ, धुलेंडी, छारंडी([[राजस्थान]] मैं) दोल |अनुयायी = [[हिन्दू धर्म|हिन्दू]], [[भारतीय]], भारतीय प्रवासी, [[नेपाली]], नेपाली प्रवासी |उद्देश्य = धार्मिक निष्ठा, उत्सव, मनोरंजन |आरम्भ = अत्यंत प्राचीन |तिथि = [[फाल्गुन]] [[पूर्णिमा]] |दीर्घ-प्रकार = धार्मिक, सामाजिक |तिथि२००८ = [[२१ मार्च]] |तिथि२००९ = [[११ मार्च]] |तिथि२०१० = [[१ मार्च]] |अनुष्ठान = [[होलिका दहन]] व [[रंग खेलना]] |उत्सव = रंग खेलना, गाना-बजाना, हुड़दंग |समान_पर्व= [[होला मोहल्ला]], [[याओसांग]] इत्यादि |type =<!--DO NOT CHANGE! THIS CONTROLS COLOUR--><!--DO NOT CHANGE! THIS CONTROLS COLOUR--> }} '''होली''' [[वसंत]] ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण [[भारतीय]] और [[नेपाली]] लोगों का त्यौहार है। यह [[पर्व]] [[हिंदू]] [[पंचांग]] के अनुसार [[फाल्गुन]] [[मास]] की [[पूर्णिमा]] को मनाया जाता है। होली रंगों का तथा हँसी-खुशी का त्योहार है। यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध त्योहार है, जो आज विश्वभर में मनाया जाने लगा है।<ref>{{समाचार सन्दर्भ|title= होली-रंगों का त्यौहार|url= https://www.dekhoyaar.com/holi-festival-of-colours/]}}</ref> रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। यह प्रमुखता से [[भारत]] तथा [[नेपाल]] में मनाया जाता है। यह त्यौहार कई अन्य देशों जिनमें अल्पसंख्यक [[हिन्दू]] लोग रहते हैं वहाँ भी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।<ref>{{Cite web |url=http://www.chhathpuja.co/community/viewdiscussion/1836-holi-essay-in-hindi-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7?groupid=130 |title=: होली |access-date=6 फ़रवरी 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150923202717/http://www.chhathpuja.co/community/viewdiscussion/1836-holi-essay-in-hindi-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7?groupid=130 |archive-date=23 सितंबर 2015 |url-status=dead }}</ref> पहले [[दिन]] को होलिका जलायी जाती है, जिसे [[होलिका दहन]] भी कहते हैं। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या [[धूलिवंदन]] इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे पर [[रंग]], [[अबीर-गुलाल]] इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और [[मिठाई|मिठाइयाँ]] खिलाते हैं।<ref name="colors">{{cite web|url= http://www.thecolorsofindia.com/holi-celebrations.html|title= Holi Celebrations|access-date= 3 मार्च 2008|format= एचटीएमएल|publisher= द कलर्स ऑफ़ इंडिया|language= en|archive-url= https://web.archive.org/web/20080308180703/http://www.thecolorsofindia.com/holi-celebrations.html|archive-date= 8 मार्च 2008|url-status= dead}}</ref> राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है।<ref name="webdunia">{{cite web|url=http://hindi.webdunia.com/religion/occasion/others/0802/09/1080209019_1.htm|title=ऋतुओं का राजा वसंत|access-date=3 मार्च 2008|format=एचटीएम|publisher=वेब दुनिया|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20090715072941/http://hindi.webdunia.com/religion/occasion/others/0802/09/1080209019_1.htm|archive-date=15 जुलाई 2009|url-status=dead}}</ref> राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। [[फाल्गुन]] माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्यौहार [[वसंत पंचमी]] से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार [[गुलाल]] उड़ाया जाता है। इस दिन से [[फाग]] और [[धमार]] का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में [[सरसों]] खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में [[गेहूँ]] की बालियाँ इठलाने लगती हैं। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर [[ढोलक]]-[[झाँझ]]-[[मंजीरा|मंजीरों]] की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है।<ref name="ilove">{{cite web|url=http://festivals.iloveindia.com/holi/|title=HINDU HOLI FESTIVAL|access-date=3 मार्च 2008|format=|publisher=फ़ेस्टिवल्स आईलविइंडिया.कॉम|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20080311235554/http://festivals.iloveindia.com/holi/|archive-date=11 मार्च 2008|url-status=dead}}</ref> गुझिया होली का प्रमुख पकवान है जो कि मावा (खोया) और मैदा से बनती है और मेवाओं से युक्त होती है इस दिन कांजी के बड़े खाने व खिलाने का भी रिवाज है। नए कपड़े पहन कर होली की शाम को लोग एक दूसरे के घर होली मिलने जाते है जहाँ उनका स्वागत गुझिया,नमकीन व ठंडाई से किया जाता है। होली के दिन आम्र मंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है।<ref>{{Cite web |url=http://www.riiti.com/1490/holi_holika_dahan_process_vidhi |title=संग्रहीत प्रति |access-date=17 अक्तूबर 2012 |archive-url=https://web.archive.org/web/20121103172436/http://www.riiti.com/1490/holi_holika_dahan_process_vidhi |archive-date=3 नवंबर 2012 |url-status=dead }}</ref> == इतिहास == होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका<ref>{{cite book |last=आप्टे |first= वामन शिवराम|title= संस्कृत हिन्दी कोश|year= 1969 |publisher= मोतीलाल बनारसीदास|location= दिल्ली, पटना, वाराणसी भारत|id= |page= 1181|editor: वामन शिवराम आप्टे|access-date=}}</ref> नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे [[वसंतोत्सव]] और काम-महोत्सव भी कहा गया है। [[चित्र:Holi2.jpg|thumb|right|280px| राधा-श्याम गोप और गोपियों की होली]] इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। [[नारद पुराण]] औऱ [[भविष्य पुराण]] जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। [[विंध्य क्षेत्र]] के [[रामगढ़]] स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं। सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक [[अलबरूनी]] ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं [[मुग़ल|मुगल काल]] की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। [[अकबर]] का [[जोधाबाई]] के साथ तथा [[जहाँगीर]] का [[नूरजहाँ]] के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है।<ref>{{cite web|url=http://www.tribuneindia.com/2002/20020120/ncr1.htm|title=Alwar Museum: A fossilised collection that comes alive|access-date=11 मार्च 2008|format=एचटीएम|publisher=द ट्रिब्यून|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20081007091947/http://www.tribuneindia.com/2002/20020120/ncr1.htm|archive-date=7 अक्तूबर 2008|url-status=live}}</ref> [[शाहजहाँ]] के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ''ईद-ए-गुलाबी'' या ''आब-ए-पाशी'' (रंगों की बौछार) कहा जाता था।<ref name="hindu">{{cite web|url=http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1448831,prtpage-1.cms|title=Who says Holi is only a Hindu festival?|access-date=5 मार्च 2008|format=सीएमएस|publisher=टाइम्स ऑफ इंडिया|language=en|archiveurl=https://web.archive.org/web/20110316055718/http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1448831,prtpage-1.cms|archivedate=16 मार्च 2011|url-status=live}}</ref> अंतिम मुगल बादशाह [[बहादुर शाह ज़फ़र]] के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।<ref name="krishnaradha">{{cite web|url=http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040306_holi_history.shtml|title=कृष्ण-राधा से लेकर अकबर-जोधाबाई तक|access-date=3 मार्च 2008|format=एसएचटीएमएल|publisher=बीबीसी|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20060308061250/http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040306_holi_history.shtml|archive-date=8 मार्च 2006|url-status=live}}</ref> मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। [[विजयनगर]] की राजधानी [[हंपी]] के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की [[अहमदनगर]] की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की [[मेवाड़]] की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। [[बूंदी जिला|बूंदी]] से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।<ref name="history">{{cite web|url= http://www.holifestival.org/history-of-holi.html|title= History of Holi|access-date= 3 मार्च 2008|format= एचटीएमएल|publisher= होलीफेस्टिवल.ऑर्ग|language= en|archive-url= https://web.archive.org/web/20080317011228/http://www.holifestival.org/history-of-holi.html|archive-date= 17 मार्च 2008|url-status= dead}}</ref> == कहानियाँ == {{main|होली की कहानियाँ}} [[चित्र:Narasimha Disemboweling Hiranyakashipu, Folio from a Bhagavata Purana (Ancient Stories of the Lord) LACMA M.82.42.8 (1 of 5).jpg|thumb|right|भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध]]होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में [[हिरण्यकशिपु]] नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के अहंकार में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र [[प्रह्लाद]] ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन [[होलिका]] को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।<ref name="what">{{cite web|url=http://www.essortment.com/all/whatishinduho_rksm.htm|title=What is the Hindu Holi festival|access-date=3 मार्च 2008|format=एचटीएम|publisher=एसोर्टमेंट|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20080319004331/http://www.essortment.com/all/whatishinduho_rksm.htm|archive-date=19 मार्च 2008|url-status=live}}</ref> प्रतीक रूप से यह भी माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।<ref name="holika">{{cite web|url= http://vishwahindusamaj.com/holi.htm86,652|title= होली या होलिका या होलाका|access-date= 3 मार्च 2008|format= एचटीएम|publisher= विश्व हिंदू समाज|language= }}{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> '''होलिका दहन की मुख्य कथा''' होली से सम्बन्धित मुख्य कथा के अनुसार एक नगर में हिरण्यकश्यप नाम का दानव राजा रहता था। वह सभी को अपनी पूजा करने को कहता था, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद [[विष्णु|भगवान विष्णु]] का उपासक भक्त था। हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रहलाद को बुलाकर राम का नाम न जपने को कहा तो प्रहलाद ने स्पष्ट रूप से कहा, पिताजी! परमात्मा ही समर्थ है। प्रत्येक कष्ट से परमात्मा ही बचा सकता है। मानव समर्थ नहीं है। यदि कोई भक्त साधना करके कुछ शक्ति परमात्मा से प्राप्त कर लेता है तो वह सामान्य व्यक्तियों में तो उत्तम हो जाता है, परंतु [[परमात्मा]] से उत्तम नहीं हो सकता।<ref>{{Cite web|url=https://news.jagatgururampalji.org/holi-festival-2020-hindi-story/|title=होलिका दहन की वास्तविक कहानी (कथा)|last=|first=|date=|website=SA News|archive-url=|archive-date=|dead-url=|access-date=}}</ref> यह बात सुनकर अहंकारी हिरण्यकश्यप क्रोध से लाल पीला हो गया और नौकरों सिपाहियों से बोला कि इसको ले जाओ मेरी आँखों के सामने से और जंगल में सर्पों में डाल आओ। सर्प के डसने से यह मर जाएगा। ऐसा ही किया गया। परंतु प्रहलाद मरा नहीं, क्योंकि सर्पों ने डसा नहीं।<ref>{{Cite web|url=https://news.jagatgururampalji.org/holi-festival-2020-hindi-story/|title=Holi Festival 2020 Hindi: Holika Dahan Story,Quotes,ऐसे मनाए होली|date=2020-03-08|website=S A NEWS|language=en-US|access-date=2020-03-09}}</ref> प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी [[होली की कहानियाँ|ढुंढी]], [[राधा]] [[कृष्ण]] के [[रास]] और [[कामदेव]] के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है।<ref name="legends">{{cite web|url= http://www.thecolorsofindia.com/holi-legends/index.html|title= Holi - Legends and Myths|access-date= 3 मार्च 2008|format= एचटीएमएल|publisher= द कलर्स ऑफ़ इंडिया। कॉम|language= en|archive-url= https://web.archive.org/web/20080308220817/http://www.thecolorsofindia.com/holi-legends/index.html|archive-date= 8 मार्च 2008|url-status= dead}}</ref> कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग [[शिव]] के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान [[श्रीकृष्ण]] ने इस दिन [[पूतना]] नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।<ref>{{cite web|url=http://www.bawarchi.com/festivals/holi.html|title=Holi|access-date=5 मार्च 2008|format=एचटीएमएल|publisher=बावर्ची.कॉम|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20080210025823/http://www.bawarchi.com/festivals/holi.html|archive-date=10 फ़रवरी 2008|url-status=dead}}</ref> == परंपराएँ == होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार [[चैत्र]] शुदी [[प्रतिपदा]] के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष [[मनु]] का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।<ref name="kyon">{{cite web|url= http://www.dpb.in/magazines/sadhnapath/article.phtml?86,652|title= क्यों मनाई जाती है होली?|access-date= 3 मार्च 2008|format= पीएचटीएमएल|publisher= साधनापथ|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20071022050639/http://dpb.in/magazines/sadhnapath/article.phtml?86,652|archive-date= 22 अक्तूबर 2007|url-status= dead}}</ref> [[चित्र:Holi bonfire.jpg|thumb|right|280px|होलिका दहन]] होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में [[भरभोलिए]]<ref name="bharbh">{{cite web|url=http://www.khabarexpress.com/3/1/2007/-news_928.html|title=भरभोलियों का है होली पर विशेष महत्व|access-date=3 मार्च 2008|format=एचटीएमएल|publisher=खबर एक्सप्रेस|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20110315031743/http://www.khabarexpress.com/3/1/2007/-news_928.html|archive-date=15 मार्च 2011|url-status=dead}}</ref> जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।<ref name="bharbh" /> लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की [[गेहूँ]] की बालियों और [[चना|चने]] के [[होला|होले]] को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं। [[चित्र:Holi party and decorated tree.jpg|thumb|280px|right|सार्वजनिक होली मिलन]] [[File:A celebration of Holi in Germany 2012.jpg|thumb|280px|विदेश (जर्मनी) में होली मनाते हुए युवा]] होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े आदि विभिन्न व्यंजन (खाद्य पदार्थ) पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें [[गुझिया|गुझियों]] का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। [[कांजी]], [[भांग]] और [[ठंडाई]] इस पर्व के विशेष पेय होते हैं। पर ये कुछ ही लोगों को भाते हैं। इस अवसर पर उत्तरी भारत के प्रायः सभी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है, पर दक्षिण भारत में उतना लोकप्रिय न होने की वज़ह से इस दिन सरकारी संस्थानों में अवकाश नहीं रहता। == विशिष्ट उत्सव == {{main|देश विदेश की होली}} भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। [[ब्रज]] की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है। [[बरसाने]] की [[लठमार होली]]<ref name="lathmar">{{cite web|url=http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040306_holi_mathura.shtml|title=नंदगाँव और बरसाने की लठमार होली|access-date=4 मार्च 2008|format=|publisher=बीबीसी|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20060308061256/http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040306_holi_mathura.shtml|archive-date=8 मार्च 2006|url-status=live}}</ref> काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार [[मथुरा]] और [[वृंदावन]] में भी १५ दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। [[कुमाऊँ]] की [[गीत बैठकी]]<ref name="kumaon">{{cite web|url= http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040305_holi_kumaon.shtml|title= कुमाऊँ की बैठक होली|access-date= 4 मार्च 2008|format= एसएचटीएम|publisher= बीबीसी|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20060308061112/http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040305_holi_kumaon.shtml|archive-date= 8 मार्च 2006|url-status= live}}</ref> में [[शास्त्रीय संगीत]] की गोष्ठियाँ होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है। [[हरियाणा]] की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है। [[बंगाल]] की [[दोल जात्रा]]<ref name="dol">{{cite web|url=http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040305_holi_bengal.shtml|title=बंगाल की होली|access-date=4 मार्च 2008|format=|publisher=बीबीसी|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20060308061103/http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/03/040305_holi_bengal.shtml|archive-date=8 मार्च 2006|url-status=live}}</ref> [[चैतन्य महाप्रभु]] के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है। इसके अतिरिक्त [[महाराष्ट्र]] की [[रंग पंचमी]]<ref name="rang">{{cite web|url=http://www.jitu.info/merapanna/?p=503?ref=BenimShopum.com|title=रंग पंचमी|access-date=4 मार्च 2008|format=एचटीएम|publisher=मेरा पन्ना|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20181117192926/http://www.jitu.info/merapanna/?p=503%3Fref%3DBenimShopum.com|archive-date=17 नवंबर 2018|url-status=dead}}</ref> में सूखा गुलाल खेलने, [[गोवा]] के [[शिमगो]]<ref name="shimgo">{{cite web|url=http://www.holifestival.org/shimgo.html|title=Shimgo|access-date=4 मार्च 2008|format=|publisher=होलीफ़ेस्टिवल.ऑर्ग|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20080223072759/http://www.holifestival.org/shimgo.html|archive-date=23 फ़रवरी 2008|url-status=dead}}</ref> में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा [[पंजाब (भारत)|पंजाब]] के [[होला मोहल्ला]]<ref name="hola">{{cite web|url=http://www.jitu.info/merapanna/?p=503?ref=BenimShopum.com|title=होला मोहल्ला|access-date=4 मार्च 2008|format=|publisher=मेरा पन्ना|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20181117192926/http://www.jitu.info/merapanna/?p=503%3Fref%3DBenimShopum.com|archive-date=17 नवंबर 2018|url-status=dead}}</ref> में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। [[तमिलनाडु]] की [[कमन पोडिगई]]<ref name="kaman">{{cite web|url=http://www.jitu.info/merapanna/?p=503?ref=BenimShopum.com|title=कमन पोडिगई|access-date=4 मार्च 2008|format=एचटीएम|publisher=मेरा पन्ना|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20181117192926/http://www.jitu.info/merapanna/?p=503%3Fref%3DBenimShopum.com|archive-date=17 नवंबर 2018|url-status=dead}}</ref> मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोतसव है जबकि [[मणिपुर]] के [[याओसांग]]<ref name="deshvidesh">{{cite web|url=http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2006/desh_videsh_ki_holi.htm|title=देश विदेश की होली|access-date=5 मार्च 2008|format=एचटीएम|publisher=अभिव्यक्ति|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20080514093529/http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2006/desh_videsh_ki_holi.htm|archive-date=14 मई 2008|url-status=live}}</ref> में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है। दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए [[दक्षिण गुजरात की आदिवासी होली|होली]] सबसे बड़ा पर्व है, [[छत्तीसगढ़]] की [[छत्तीसगढ़ की होरी|होरी]] में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है [[भगोरिया]]<ref>{{cite web|url=http://hindi.webdunia.com/religion/occasion/holi/0803/20/1080320041_1.htm|title=फिर बिखरे भगोरिया के रंग|access-date=20 मार्च 2008|format=एचटीएम|publisher=वेब दुनिया|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20080323175752/http://hindi.webdunia.com/religion/occasion/holi/0803/20/1080320041_1.htm|archive-date=23 मार्च 2008|url-status=dead}}</ref>, जो होली का ही एक रूप है। [[बिहार]] का [[फगुआ]]<ref name="bhojpur">{{cite web|url= http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SurendrnathTiwari/saNuse_%20sahriyaa_rang.htm|title= भोजपुरी अंचल की होली|access-date= 4 मार्च 2008|format= एचटीएम|publisher= साहित्यकुंज|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20080522081710/http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/SurendrnathTiwari/saNuse_%20sahriyaa_rang.htm|archive-date= 22 मई 2008|url-status= dead}}</ref> जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और [[नेपाल में होली|नेपाल की होली]]<ref name="nepal">{{cite web|url=http://www.nepalhomepage.com/society/festivals/fagupurnima.html|title=Holi|access-date=6 मार्च 2008|format=एचटीएमएल|publisher=नेपालपृष्ठ|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20070816051832/http://www.nepalhomepage.com/society/festivals/fagupurnima.html|archive-date=16 अगस्त 2007|url-status=dead}}</ref> में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे [[इस्कॉन]] या वृंदावन के [[बांके बिहारी मंदिर]] में अलग अलग प्रकार से होली के शृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं। ==होली मनाने का तरीका== होली की पूर्व संध्या पर यानि कि होली पूजा वाले दिन शाम को बड़ी मात्रा में होलिका दहन किया जाता है और लोग अग्नि की पूजा करते हैं। होली की परिक्रमा शुभ मानी जाती है। किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में उपले व लकड़ी से होली तैयार की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। अग्नि के लिए एकत्र सामग्री में लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। गाय के गोबर से बने ऐसे उपले जिनके बीच में छेद होता है जिनको गुलरी, भरभोलिए या झाल आदि कई नामों से अलग अलग क्षेत्र में जाना जाता है । इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है।<ref>{{समाचार सन्दर्भ|title= होली-रंगों का त्यौहार|url= https://www.dekhoyaar.com/holi-festival-of-colours/|publisher=[[देखोयार]]}}</ref> लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का सुबह से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पकवान बनाए जाते हैं। घरों में बने पकवानों से भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर मुहूर्त के अनुसार होली का दहन किया जाता है। इसी में से आग ले जाकर घरों के आंगन में रखी निजी पारिवारिक होली में आग लगाई जाती है। इस आग में गेहूँ, जौ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। दूसरे दिन सुबह से ही लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि लगाते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। सुबह होते ही लोग रंगों से खेलते अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से ही सबका स्वागत किया जाता है। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।<ref>{{समाचार सन्दर्भ|title= होली-रंगों का त्यौहार|url= https://www.dekhoyaar.com/holi-festival-of-colours/|publisher=[[देखोयार]]}}</ref> होली के अवसर पर सबसे अधिक खुश बच्चे होते हैं वह रंग-बिरंगी पिचकारी को अपने सीने से लगाए, सब पर रंग डालते भागते दौड़ते मजे लेते हैं । पूरे मोहल्ले में भागते फिरते इनकी आवाज सुन सकते हैं “होली है..” । एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।<ref>{{समाचार सन्दर्भ|title= होली-रंगों का त्यौहार|url= https://www.dekhoyaar.com/holi-festival-of-colours/|publisher=[[देखोयार]]}}</ref> === आधुनिक काल में === होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं।<ref name="badlav">{{cite web|url=http://www.bbc.co.uk/hindi/forum/story/2007/03/070301_holi_forum.shtml|title=क्या होली में बदलाव होना चाहिए|access-date=4 मार्च 2008|format=एसएचटीएम|publisher=बीबीसी|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20070306094248/http://www.bbc.co.uk/hindi/forum/story/2007/03/070301_holi_forum.shtml|archive-date=6 मार्च 2007|url-status=live}}</ref> लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं।<ref>{{cite web|url=http://www.kalpavriksh.org/f1/f1.4/GAholi1|title=The Safe Holi campaign|access-date=15 मार्च 2008|format=|publisher=कल्पवृक्ष|language=en|archive-url=https://web.archive.org/web/20070326041336/http://www.kalpavriksh.org/f1/f1.4/GAholi1|archive-date=26 मार्च 2007|url-status=dead}}</ref> रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं।<ref>{{cite web|url=http://www.kenzoamour-indianholi.com/EN/kenzo-amour-indian-holi.html|title=केन्ज़ोआमूर इंडियन होली|access-date=11 मार्च 2008|format=एचटीएमएल|publisher=केन्ज़ोआमूर|language=|archive-url=https://web.archive.org/web/20080320001715/http://www.kenzoamour-indianholi.com/EN/kenzo-amour-indian-holi.html|archive-date=20 मार्च 2008|url-status=dead}}</ref> होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है। बाज़ार में इसकी उपयोगिता का अंदाज़ इस साल होली के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान केन्ज़ोआमूर द्वारा जारी किए गए नए इत्र ''होली है'' से लगाया जा सकता है।<ref>{{cite web |url=http://www.hindu.com/mp/2006/03/13/stories/2006031301530100.htm|title=Play safe this Holi|access-date=11 मार्च 2008|format= एचटीएम|publisher=द हिन्दू|language = en}}</ref> ==प्रचलित संस्कृति में== === साहित्य === प्राचीन काल के [[संस्कृत साहित्य]] में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह [[रास]] का वर्णन है। अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें [[हर्ष]] की [[प्रियदर्शिका]] व [[रत्नावली]]{{Ref_label|रत्नावली|क|none}} तथा [[कालिदास]] की [[कुमारसंभवम्]] तथा [[मालविकाग्निमित्रम्]] शामिल हैं। कालिदास रचित [[ऋतुसंहार]] में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है। [[भारवि]], [[माघ महाकवि|माघ]] और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है। [[चंद बरदाई]] द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य [[पृथ्वीराज रासो]] में होली का वर्णन है। [[भक्तिकाल]] और [[रीतिकाल]] के [[हिन्दी साहित्य]] में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। [[आदिकाल|आदिकालीन]] कवि [[विद्यापति]] से लेकर भक्तिकालीन [[सूरदास]], [[रहीम]], [[रसखान]], [[पद्माकर]]{{Ref_label|पद्माकर|ख|none}}, [[जायसी]], [[मीराबाई]], [[कबीर]] और रीतिकालीन [[बिहारी]], [[केशव]], [[घनानंद]] आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं।<ref name="sanskrit">{{cite web|url= http://www.shabdamhindi.com/sanskrit_holi.html|title= होली या होलिका या होलाका|access-date= 3 मार्च 2008|format= एचटीएम|publisher= विश्व हिंदू समाज|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20100129075808/http://www.shabdamhindi.com/sanskrit_holi.html|archive-date= 29 जनवरी 2010|url-status= dead}}</ref> इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है।<ref name="bhakti">{{cite web|url= http://www.hindinest.com/bhaktikal/009.htm|title= भक्तिकालीन काव्य में होली|access-date= 4 मार्च 2008|format= एचटीएम|publisher= हिंदीनेस्ट.कॉम|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20080225135601/http://www.hindinest.com/bhaktikal/009.htm|archive-date= 25 फ़रवरी 2008|url-status= dead}}</ref> [[सूफ़ी संत]] हज़रत [[निज़ामुद्दीन औलिया]], [[अमीर खुसरो]] और [[बहादुर शाह ज़फ़र]] जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं।<ref name="hindu" /> आधुनिक हिंदी कहानियों [[प्रेमचंद]] की ''राजा हरदोल'', प्रभु जोशी की ''अलग अलग तीलियाँ'', [[तेजेंद्र शर्मा]] की ''एक बार फिर होली'', ओम प्रकाश अवस्थी की ''होली मंगलमय हो'' तथा स्वदेश राणा की ''हो ली'' में होली के अलग अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से [[शशि कपूर]] की [[उत्सव (1984 फ़िल्म)|उत्सव]], [[यश चोपड़ा]] की [[सिलसिला]], [[वी शांताराम]] की [[झनक झनक पायल बाजे (1955 फ़िल्म)|झनक झनक पायल बाजे]] और [[नवरंग (1959 फ़िल्म)|नवरंग]] इत्यादि उल्लेखनीय हैं।<ref name="bhaskar">{{cite web|url= http://www.bhaskar.com/2008/02/11/0802110029_edit.html|title= हरी-हरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन|access-date= 4 मार्च 2008|format= एचटीएमएल|publisher= दैनिक भास्कर|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20080904212010/http://www.bhaskar.com/2008/02/11/0802110029_edit.html|archive-date= 4 सितंबर 2008|url-status= live}}</ref> === संगीत === [[चित्र:Vasant ragini.jpg|thumb|right|280px|वसंत रागिनी- कोटा शैली में रागमाला शृंखला का एक लघुचित्र]]भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में [[धमार]] का होली से गहरा संबंध है, हालाँकि [[ध्रुपद]], धमार, [[ख़याल|छोटे]] व [[ख़याल|बड़े ख्याल]] और [[ठुमरी]] में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। [[कथक]] नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे ''चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर'' आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है ''खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी''। भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ [[राग]] ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। [[राग बसंत|बसंत]], [[राग बहार|बहार]], [[राग हिंडोल|हिंडोल]] और [[राग काफ़ी|काफ़ी]] ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। [[उपशास्त्रीय संगीत]] में [[चैती]], [[दादरा]] और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली है, जिसमें अलग अलग प्रांतों में [[होली लोकगीत|होली]] के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहाँ ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे ''होली खेलें रघुवीरा अवध में।'' राजस्थान के [[अजमेर]] शहर में [[ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती]] की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है ''आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री।''<ref>{{cite web|url= http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/sangeetholi.htm|title= होली और संगीत|access-date= 11 मार्च 2008|format= एचटीएम|publisher= अभिव्यक्ति|language= |archive-url= https://web.archive.org/web/20090706172502/http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/sangeetholi.htm|archive-date= 6 जुलाई 2009|url-status= dead}}</ref> इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में ''दिगंबर खेले मसाने में होली'' कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता है। भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। 'सिलसिला' के गीत ''रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे'' और 'नवरंग' के ''आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार'', को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं। ==स्वास्थ चिंताएँ== प्राचीन काल में लोग चन्दन और गुलाल से ही होली खेलते थे। लेकिन आज गुलाल, प्राकृतिक रंगों के साथ साथ रासायनिक रंगों का प्रचलन बढ़ गया है। ये रंग स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक हैं जो त्वचा के साथ साथ आँखों पर भी बुरा असर करते हैं। <!-- == उल्लेख == {{Note_label|रत्नावली|क|none}} <poem> कीर्णौःपिष्टातकौधैः कृतदिवसमुखैः कुंकुमसिनात गौरेः हेमालंकारभाभिर्भरनमितशिखैः शेखरैः कैकिरातैः। एषा वेषाभिलक्ष्यस्वभवनविजिताशेषवित्तेशकोषा कौशाम्बी शातकुम्भद्रवखजितजनेवैकपीता विभाति। -'रत्नावली', 1.11 </poem> {{Note_label|पद्माकर|ख|none}} <poem> फाग के भीर अभीरन में गहि गोविन्दै लै गई भीतर गोरी। भाई करी मन की 'पद्माकर' ऊपर नाई अबीर की झोरी। छीन पिताम्बर कम्मर ते सु बिदा दई मीड़ कपालन रोरी। नैन नचाइ, कही मुसकाइ लला फिरी अइयो खेलन होरी। </poem> --> ==इन्हें भी देखें== *[[होली लोकगीत]] *[[होलिका दहन]] *[[देश विदेश की होली|विभिन्न देशों में होली उत्सव]] *[[हिन्दू पर्व]] *[[वैष्णव पंथ]] *[[वसंत]] == सन्दर्भ == {{Reflist|2}} ==बाहरी कड़ियाँ== {{commonscat|Holi}} {{हिन्दू पर्व-त्यौहार}} [[श्रेणी:होली]] [[श्रेणी:संस्कृति]] [[श्रेणी:हिन्दू त्यौहार]] [[श्रेणी:भारतीय पर्व]] [[श्रेणी:उत्तम लेख]] [[श्रेणी:भारत में त्यौहार]]
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