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	<title>अवधी में कहावतें - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-27T02:57:28Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;चक्रबोट: ऑटोमैटिड वर्तनी सुधार</title>
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		<updated>2021-05-06T04:07:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऑटोमैटिड वर्तनी सुधार&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[अवधी]] हिंदी क्षेत्र की एक [[उपभाषा]] है। यह [[उत्तर प्रदेश]] में [[अवधी]] क्षेत्र [[लखनऊ]],[[बहराइच]], [[हरदोई]], [[सीतापुर]], [[लखीमपुर खीरी जिला|लखीमपुर]], [[फ़ैज़ाबाद|फैजाबाद]], [[प्रतापगढ़ जिला, उत्तर प्रदेश|प्रतापगढ़]], [[सुल्तानपुर]], [[इलाहाबाद|इलाहबाद]] तथा [[फतेहपुर, उत्तर प्रदेश|फतेहपुर]], [[मिर्ज़ापुर|मिरजापुर]], [[जौनपुर]] आदि कुछ अन्य जिलों में भी बोली जाती है। [[अवधी|अवधी भाषा]] की कहावते [[उत्तर प्रदेश]] के [[अवध]] क्षेत्र के [[ग्रामीण क्षेत्र|ग्रामीण]] लोक जीवन में अत्यधिक प्रचलित हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://www.openbooksonline.com/forum/topics/5170231:Topic:7919?page=1&amp;amp;commentId=5170231%3AComment%3A43311&amp;amp;x=1#5170231Comment43311 |title=कुछ लुप्त प्राय कहावतें |access-date=12 सितंबर 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140912225232/http://www.openbooksonline.com/forum/topics/5170231:Topic:7919?page=1&amp;amp;commentId=5170231%3AComment%3A43311&amp;amp;x=1#5170231Comment43311 |archive-date=12 सितंबर 2014 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[कहावत]] आम बोलचाल में इस्तेमाल होने वाले उस वाक्यांश को कहते हैं, जिसका सम्बन्ध किसी न किसी [[कहानी]] या [[पौराणिक कथाएँ|पौराणिक कथाओ]] से जुड़ा हुआ होता है। कहीं कहीं इसे [[मुहावरा]] अथवा [[लोकोक्ति]] के रूप में भी जानते हैं। प्रायः ये कहावते एक भाषा के कहावतों को अन्य भाषाओं के द्वारा मूल या बदले हुये रूप में अपना भी लिया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अवधी में कुछ कहावतें ==&lt;br /&gt;
# अधाधुन्ध दरबार माँ गदहा पँजीरी खाँय। (उदारता का नाजायज फायदा उठाने पर प्रयुक्त किया जाने वाला कहावत)&lt;br /&gt;
# कत्त्थर गुद्दर सोवैं। मरजाला बैठे रोवैं। (कथरी गुदड़ी ओढ़ने वाला आराम से सो रहा है लेकिन फैन्सी कपड़ों वाला जाड़े से ठिठुर रहा है।)&lt;br /&gt;
# काम नहीं कोउ का बनि जाय। काटी अँगुरी मूतत नाँय। (यदि किसी की कटी हुई उँगली इनके मूतने से ठीक हो जाए तो ये वह भी नहीं करेंगे।)&lt;br /&gt;
# करिया बाम्हन ग्वार चमार। इन दून्हों ते रह्यो होसियार।&lt;br /&gt;
# खरी बात जइसे मौसी का काजर।&lt;br /&gt;
# गगरी दाना। सुद्र उताना।&lt;br /&gt;
# घर माँ नाहीं दाने। अम्मा चलीं भुनाने।&lt;br /&gt;
# घातै घात चमरऊ पूछैं, मलिकौ पड़वा नीके है। (पड़वा मर रहा है। अगर मर गया हो चमार उसे खाल के लिये ले जायेगा।)&lt;br /&gt;
# जग जीतेव मोरी रानी। बरु ठाढ़ होय तो जानी।&lt;br /&gt;
# जस मतंग तस पादन घोड़ी। बिधना भली मिलाई जोड़ी।&lt;br /&gt;
# जबरा मारै, रोवन न देय।&lt;br /&gt;
# जाड़ जाय रुई कि जाड़ जाय दुई।&lt;br /&gt;
# जाड़ लाग, जाड़ लाग जड़नपुरी। बुढ़िया का हगास लागि बिपति परी।&lt;br /&gt;
# ठाढ़ा तिलक मधुरिया बानी। दगाबाज कै यहै निसानी।(जो बाहर से अच्छा बोलते हैं और अंदर बुरा सोचते हैं )&lt;br /&gt;
# त्रियाचरित्र न जानै कोय। खसम मारि कै सत्ती होय।&lt;br /&gt;
# दिये न बिधाता, लिखे न कपार।&lt;br /&gt;
# धन के पन्द्रा मकर पचीस। जाड़ा परै दिना चालीस।&lt;br /&gt;
# नोखे घर का बोकरा। खरु खाय न चोकरा।।&lt;br /&gt;
# नोखे गाँवैं ऊँट आवा। कोउ देखा कोऊ देखि न पावा।&lt;br /&gt;
# बहि बहि मरैं बैलवा, बाँधे खाँय तुरंग।&lt;br /&gt;
# बरसौ राम जगै दुनिया। खाय किसान मरै बनिया।&lt;br /&gt;
# बूढ़ सुआ राम राम थोरै पढ़िहैं।&lt;br /&gt;
# भरी जवानी माँझा ढील।&lt;br /&gt;
# लरिकन का हम छेड़तेन नाहीं, ज्वान लगैं सग भाई।&lt;br /&gt;
# बूढ़ेन का हम छोड़तेन नाहीं चहे ओढ़ैं सात रजाई।&lt;br /&gt;
# सूमी का धन अइसे जाय। जइसे कुंजर कैथा खाय। (कहते हैं कि हाथी समूचे कैथे के अन्दर का गूदा खाकर समूचे खोखले कैथे का मलत्याग करता है।)&lt;br /&gt;
# सोनरवा की ठुक ठुक, लोहरवा की धम्म।&lt;br /&gt;
# हिसकन हिसकन नौनिया हगासी।&lt;br /&gt;
# उठा बूढ़ा साँस ल्या, चरखा छोड़ा जांत ल्या। (यह कहावत तब कही जाती है जब इतनी व्यस्तता हो कि साँस लेने कि फुर्सत भी ना हो।)&lt;br /&gt;
# बाप पदहिन ना जाने, पूत शंख बजावे। (जब पुत्र किसी कार्य को पिता से अच्छा करने लगे तब इसका प्रयोग करते है)&lt;br /&gt;
# बाप न मारेन फड़की, बेटवा तीरनदास। (जब पुत्र किसी कार्य को पिता से अच्छा करने लगे तब इसका प्रयोग करते है)&lt;br /&gt;
#जहां जाये दूला रानी, उहाँ पड़े पाथर पानी। (यह कहावत ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयोग की जाती है जिसके जाते ही कोई कार्य बिगड़ने लगता है।)&lt;br /&gt;
# खावा भात, उड़वा पांत। (भात=पकाया हुआ चावल; पांत=पंगत, यह कहावत उसके लिए प्रयोग की जाती है जो फक्कड़ी किस्म का आदमी हो/जो अपनी किसी चीज की चिंता ना करता हो।)&lt;br /&gt;
# तौवा की तेरी, खापडिया की मेरी। (तौवा=तवा; खापडिया=मिट्टी की खपड़ी, इसका अर्थ है की सब ख़राब वस्तुएं तुम्हारी और सारी अच्छी मेरी)&lt;br /&gt;
#सास मोर अन्हरी, ससुर मोर अन्हरा, जेहसे बियाही उहो चक्चोन्हरा, केकरे पे देई धेपारदार कजरा। (चक्चोन्हरा=जिसकी ऑंखें बार बार स्वतः ही बंद होती हो; धेपारदार= मोटा सा। यह कहावत तब प्रयोग की जाती है जब कोई अच्छी वस्तु किसी को देना चाहें पर कोई उसका हक़दार ना मिले।)&lt;br /&gt;
# मोर भुखिया मोर माई जाने, कठवत भर पिसान साने। (कठवत= आटा गूंथने का बर्तन; पिसान= आटा। बच्चे कि भूख केवल माँ ही समझ सकती है।)&lt;br /&gt;
# जैसे उदई वैसे भान, ना इनके चुनई ना उनके कान। (दो मूर्ख एक सा व्यवहार करते हैं।)&lt;br /&gt;
# पैइसा ना कौड़ी , बाजार जाएँ दौड़ी। (साधन हीन होने पर भी ख़याली पुलाव पकाना।)&lt;br /&gt;
# जेकरे पाँव ना फटी बेवाई , ऊ का जाने पीर पराई। (जिसको कभी दुःख ना हुआ हो वो किसी की पीड़ा क्या जाने।)&lt;br /&gt;
# गुरु गुड ही रह गयेन, चेला चीनी होई गयेन। (शिष्य गुरु से भी अधिक सफल हो गया।)&lt;br /&gt;
# सूप बोलै त बोलै, चलनी का बोलै जे मा बहत्तर छेद। (एक बुरे व्यक्ति द्वारा दूसरे बुरे व्यक्ति को दोषी ठहराना।)&lt;br /&gt;
# फूहर चली त नौ घर हाला &lt;br /&gt;
# मन मोर महुवा चित्त भुसैले &lt;br /&gt;
#पड़ी बुढ़िया पड़ी रहे चरख मरख बुझत रहे ( जो खुद कुछ काम नहीं करते बस बोलते रहते हैं ) &lt;br /&gt;
#&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
* [[अवधी|अवधी भाषा]]&lt;br /&gt;
* [[अवधी साहित्य]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:कहावत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:अवधी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;चक्रबोट</name></author>
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