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	<title>आदि शक्ति (सिख धर्म) - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-30T04:22:40Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;Babitahamdard ६ अगस्त २०२० को ०६:५२ बजे</title>
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		<updated>2020-08-06T06:52:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{मूल शोध|date=जुलाई 2016}}&lt;br /&gt;
{{स्रोतहीन|date=जुलाई 2016}}&lt;br /&gt;
सिख धर्म, या सिखी एकेश्वरवादी धर्म है और निराकार का पुजारी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिख धर्म में चंडी के अर्थ हैं :&lt;br /&gt;
# &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[आदिशक्ति]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; -चंडी को आदि शक्ति कहा गया है क्योंकि इसी से सारा संसार उत्पन होता है, यही सरे संसार को पालती है और संघार करने वाली भी यही है। यही कारण  है कि चंडी को जग मात भी कहा गया है। गुरु ग्रन्थ साहिब में इसी शक्ति को हुक्म कहा गया है। हुक्म शक्ति का ही पुलिंग है। हुक्म में सारा संसार पैदा हुआ है।&lt;br /&gt;
# विवेक बुद्धी : ऐसी बुद्धि जो अदवैत है, हर वासना से दूर और अपने मूल में समाई रहती है। यह वो सुरत है जो अनहद नाद, शब्द में समाई रहती है। नानक, कबीर, नारद इतियादिक इसी बुद्धी के धारनी थे, इसी लिए उन्हें चंडी कहा जाता है। इसी बुद्धी ने अज्ञानता के खिलाफ जंग की थी। इसी को गुरमति, गुरमुखी भी कहते हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब में इसी को मत्ती देवी भी कहा गया है। मत्ती देवी वो है जो श्रेष्ट वर देती है, भव सागर से पार होने की विधि इसी में से प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदि शक्ति ही विवेक बुद्धी है, क्योंकि विवेक बुद्धी आदि शक्ति में लीं है। सिख धर्म के अनुसार गुरु नानक साहिब समेत सरे सतिगुर, भक्त जनों ने भगोती का ध्यान किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुरु गोबिंद सिंह जी ने चार रचनाएँ की जिसमे चंडी के अनेक गुणों का विस्तार किया, चंडी का अर्थ अगर किसी ने समझना है तो गुरु गोबिंद सिंह जी की बानी इसके अर्थों और उल्लेखन की खान है। गुरु साहिब ने चंडी के अनेक नाम लिखे हैं जैसे भगोती, खडग धारा, दुर्गा, तीर, काली, तुपक, अस, भगोती, देवता, खंडा, अदर सुता, पार्वती, जगबीर, जगमात, परा, परभी, बाड बारी, काटी, कटारी पूरनी, हल्बी, ज्वाला, तीर, चंचला, लाल नैना, तेग आदिक जो अपने आप में गहरे अर्थ रखते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिख धर्म की अरदास ही यहीं से शुरू होती है &amp;quot;प्रिथम भगौती सिमरि कै गुरु नानक लई धिआइ ॥&amp;quot; अर्थात मैं उस भगोती की सिमर रहन हूँ जो नानक गुर के ध्यान में आई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== क्या गुरु गोबिंद सिंह जी ने किसी औरत या मूर्ती कि स्तुति की? ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगर गुरु गोबिंद सिंह जी की रचनाओं और शब्दों का मुल्यांकन किया जाए तो यह बात साफ़ प्रतीत होती है कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने चंडी को &amp;quot;आदि शक्ति&amp;quot; ही बताया है। अगर हम यह माने की उन्होंने &amp;quot;आदि शक्ति&amp;quot; की मूर्ती/प्रतिमा बनाई या प्रचलित कर्म कांड के अनुसार पूजा अर्चना की या किसी औरत (महादेव की सुपत्नी आदिक) की आराधना की तो गुरु गोबिंद सिंह स्वयम अपनी वाणी में कहते हैं :&lt;br /&gt;
पवित्री पुनीता पुराणी परेयं ॥ प्रभी पूरणी पारब्रहमी अजेयं ॥&lt;br /&gt;
अरूपं अनूपं अनामं अठामं ॥ अभीतं अजीतं महां धरम धामं ॥३२॥२५१॥ (चंडी चरित्र भाग २)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिसमें साफ़ कथित है कि हे देवी, तेरा कोई रूप नहीं है, तूं अनूप है, तेरा कोई नाम नहीं है। यही नहीं गुरु गोबिंद सिंह ने मूर्ती पूजा की घोर अज्ञानता बताया है और जहां मूर्ती पूजक को पशू कहा है वहीँ कर्म कांड को निष्फल बताया है। इन सब बातों को ध्यान में रखें तो यह बात कहीं से भी जाहिर नहीं होती की गुरु साहिब ने किसी चंडी को किसी मूर्ती, इस्त्री या किसी पदार्थ रूप में माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंडी की सारी जंग विवेक बुद्धी और अविवेक बुद्धी की जंग है। जहाँ विवेक बुद्धी को &amp;quot;चंडी&amp;quot; कहा गया है और अविवेक बुद्धी दैत्य के रूप में बताएं हैं। दैत्य धर्म के विपरीत हैं, देवते कर्म कांड में व्यस्त हैं और चंडी गुरमुख है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने पारसनाथ अवतार रचना में भी इसी तरहां की जंग का खुलासा किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरानो के दिग्गज भी यह बात मानते हैं कि चंडी आदि शक्ति ही होती है और अरूप होती है, उसके गुणों को ही मूर्ती में प्रदर्शित किया है लेकिन मूर्ती अपने आप में पूरी नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:सिख धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:चित्र जोड़ें]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Babitahamdard</name></author>
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