<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%80</id>
	<title>आन्वीक्षिकी - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%80"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%80&amp;action=history"/>
	<updated>2026-08-26T15:40:50Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.43.6</generator>
	<entry>
		<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%80&amp;diff=337&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;EatchaBot: बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%80&amp;diff=337&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2020-03-04T17:50:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आन्वीक्षिकी&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;, [[न्यायशास्त्र]] का प्राचीन अभिधान। प्राचीन काल में आन्वीक्षिकी, विचारशास्त्र या [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] की सामान्य संज्ञा थी और यह त्रयी ([[वेद]]त्रयी), वार्ता ([[अर्थशास्त्र]]), [[दण्डनीति|दंडनीति]] (राजनीति) के साथ चतुर्थ विद्या के रूप में प्रतिष्ठित थी (&amp;#039;&amp;#039;आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दंडनीतिश्च शाश्वती। विद्या ह्येताश्चतस्रस्तु लोकसंसृतिहेतवः&amp;#039;&amp;#039;) जिसका उपयोग लोक के व्यवहार निर्वाह के लिए आवश्यक माना जाता था। कालांतर में इस शब्द का प्रयोग केवल न्यायशास्त्र के लिए संकुचित कर दिया गया। [[वात्स्यायन]] के [[न्यायभाष्य]] के अनुसार अन्वीक्षा द्वारा प्रवृत्त होने के कारण ही इस विद्या की संज्ञा &amp;quot;आन्वीक्षिकी&amp;quot; पड़ गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आन्वीक्षिकी के सर्वाधिक महत्व को सर्वप्रथम [[चाणक्य]] ने प्रतिपादित किया है। उनका कहना है-&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;प्रदीपः सर्वविद्यानां उपायः सर्वकर्मणाम्। &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वद् आन्वीक्षिकी मता॥&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;( अर्थ: आन्वीक्षिकी सभी विद्याओं की शाश्वत प्रदीप है, सभी कार्यों का शाश्वत साधन है, और सभी धर्मों का शाश्वत आश्रय है।)&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;अन्वीक्षा&amp;#039; के दो अर्थ हैं :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*(१) प्रत्यक्ष तथा आगम पर आश्रित अनुमान तथा&lt;br /&gt;
*(२) प्रत्यक्ष और शब्दप्रमाण की सहायता से अवगत होनेवाले विषयों का अनु (पश्चात्‌) ईक्षण (पर्यालोचन, अर्थात्‌ ज्ञान), अर्थात्‌ अनुमिति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यायशास्त्र का प्रधान लक्ष्य तो है [[प्रमाण (भारतीय दर्शन)|प्रमाणों]] के द्वारा अर्थो का परीक्षण (&amp;#039;&amp;#039;प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः&amp;#039;&amp;#039; - न्यायभाष्य १.१.१), परंतु इन प्रमाणों में भी अनुमान का महत्वपूर्ण स्थान है और इस अनुमान द्वारा प्रवृत्त होने के कारण तर्कप्रधान &amp;quot;आन्वीक्षिकी&amp;#039; का प्रयोग न्यायभाष्यकार वात्स्यायन मुनि ने न्यायदर्शन के लिए ही उपयुक्त माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी धारा में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द, इन चार प्रमाणों का गंभीर अध्ययन तथा विश्लेषण मुख्य उद्देश्य था। फलत: इस प्रणाली को &amp;quot;प्रमाणमीमांसात्मक&amp;#039; (एपिस्टोमोलाजिकल) कहते हैं। इसका प्रवर्तन [[गंगेश उपाध्याय]] (१२वीं शताब्दी) ने अपने प्रख्यात ग्रंथ &amp;quot;तत्वचिंतामणि&amp;#039; में किया। &amp;quot;प्राचीन न्याय&amp;#039; (प्रथम धारा) में पदार्थों की मीमांसा मुख्य विषय है, &amp;quot;[[नव्य न्याय|नव्यन्याय]]&amp;#039; (द्वितीय धारा) में प्रमाणों का विश्लेषण मुख्य लक्ष्य है। नव्यन्याय का उदय [[मिथिला]] में हुआ, परंतु इसका अभ्युदय [[बंगाल]] में संपन्न हुआ। मध्ययुगीन बौद्ध तार्किकों के साथ घोर संघर्ष होने से खंडन-मंडन के द्वारा यह शास्त्र विकसित होता गया। प्राचीन न्याय के मुख्य आचार्य हैं गौतम, वात्स्यायन, उद्योतकर, वाचस्पति मिश्र, जयन्त भट्ट, भा सर्वज्ञ तथा उदयनाचार्य। [[नव्य न्याय|नव्यन्याय]] के आचार्य हैं [[गंगेश उपाध्याय]], [[पक्षधर मिश्र]], [[रघुनाथ शिरोमणि]], [[मथुरानाथ]], [[जगदीश भट्टाचार्य]] तथा [[गदाधर भट्टाचार्य]]। इन दोनों धाराओं में मध्य [[न्याय (बौद्ध)|बौद्ध न्याय]] तथा [[जैन न्याय]] के अभ्युदय का काल आता है। बौद्ध नैयायिकों में [[वसुबन्धु]], [[दिङ्नाग]], [[धर्मकीर्ति]] के नाम प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[भारतीय तर्कशास्त्र]] (इंडियन लॉजिक)&lt;br /&gt;
* [[वैज्ञानिक विधि]]&lt;br /&gt;
अनु + ईक्षा + इक + ई = आन्वीक्षिकी (तर्कशास्त्र) अनु _उपसर्ग;इक एवं ई प्रत्यय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ग्रन्थ ==&lt;br /&gt;
* डॉ॰ विद्याभूषण : हिस्ट्री ऑव लाजिक, कलकत्ता, १९२५।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:दर्शन]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:न्यायशास्त्र]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:तर्कशास्त्र]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:चित्र जोड़ें]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;EatchaBot</name></author>
	</entry>
</feed>