<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80</id>
	<title>आरती - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80&amp;action=history"/>
	<updated>2026-08-24T10:45:51Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.43.6</generator>
	<entry>
		<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80&amp;diff=1796&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;QueerEcofeminist: Revert; Vandalism</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80&amp;diff=1796&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2021-04-30T09:27:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Revert; Vandalism&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{धार्मिक ग्रन्थ प्राथमिक|date=दिसंबर 2015}}&lt;br /&gt;
{{आज का आलेख}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;अधिक विकल्पों के लिए यहां जाएं - [[आरती (बहुविकल्पी)]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Aarti.jpg|thumb|right|280px| मंदिर में भगवाण की मूर्ति की आरती करता हुआ एक पुजारी]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आरती&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; [[हिन्दू]] उपासना की एक विधि है। इसमें जलती हुई लौ या इसके समान कुछ खास वस्तुओं से आराध्य के सामाने एक विशेष विधि से घुमाई जाती है। ये लौ घी या तेल के दीये की हो सकती है या [[कपूर]] की। इसमें वैकल्पिक रूप से, घी, धूप तथा सुगंधित पदार्थों को भी मिलाया जाता है। कई बार इसके साथ [[संगीत]] ([[भजन]]) तथा नृत्य भी होता है। [[मंदिर|मंदिरों]] में इसे प्रातः, सांय एवं रात्रि (शयन) में द्वार के बंद होने से पहले किया जाता है। प्राचीन काल में यह व्यापक पैमाने पर प्रयोग किया जाता था। [[तमिल भाषा]] में इसे &amp;#039;&amp;#039;दीप आराधनई&amp;#039;&amp;#039; कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामान्यतः पूजा के अंत में आराध्य भगवान की आरती करते हैं। आरती में कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें सम्मिलित होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। किसी भी [[देवता]] की आरती करते समय उन्हें तीन बार पुष्प अर्पित करने चाहियें। इस बीच ढोल, नगाडे, घड़ियाल आदि भी बजाये जाते हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;याहू-धर्म&amp;quot;&amp;gt;[http://in.jagran.yahoo.com/dharm/?page=article&amp;amp;category=3&amp;amp;articleid=4639 आरती क्यों और कैसे?] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100811030156/http://in.jagran.yahoo.com/dharm/?page=article&amp;amp;category=3&amp;amp;articleid=4639 |date=11 अगस्त 2010 }}। याहू जागरण- धर्म। मीता जिंदल&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
== विधि ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Incense smoke Aarti, Ganges, Varanasi.jpg|right|thumb|200px| [[गंगा]] मैया की धूप-लोबान से आरती, [[वाराणसी]] का उठता हुआ धुआं]]&lt;br /&gt;
आरती करते हुए भक्त के मान में ऐसी भावना होनी चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारती कहलाती है।&lt;br /&gt;
आरती प्रायः दिन में एक से पांच बार की जाती है। इसे हर प्रकार के धामिक समारोह एवं त्यौहारों में पूजा के अंत में करते हैं। एक पात्र में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या (जैसे ३, ५ या ७) में बत्तियां जलाकर आरती की जाती है। इसके अलावा कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पंच प्रदीप&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; भी कहते हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;डिस्कवरी&amp;quot;/&amp;gt; आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरी धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग ([[मस्तिष्क]], [[हृदय]], दोनों कंधे, [[हाथ]] व घुटने) से। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती मानव शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक मानी जाती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;याहू-धर्म&amp;quot;/&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Evening Ganga Aarti, at Dashashwamedh ghat, Varanasi.jpg|left|thumb|200px|वाराणसी में दशाश्वमेध घाट पर गंगा मैया की आरती]]&lt;br /&gt;
आरती की थाली या [[दीपक]] (या सहस्र दीप) को ईष्ट देव की मूर्ति के समक्ष ऊपर से नीचे, गोलाकार घुमाया जाता है। इसे घुमाने की एक निश्चित संख्या भी हो सकती है, व गोले के व्यास भी कई हो सकते हैं। इसके साथ आरती गान भी समूह द्वारा गाय़ा जाता है जिसको संगीत आदि की संगत भी दी जाती है। आरती होने के बाद पंडित या आरती करने वाला, आरती के दीपक को उपस्थित भक्त-समूह में घुमाता है, व लोग अपने दोनों हाथों को नीचे को उलटा कर जोड़ लेते हैं व आरती पर घुमा कर अपने मस्तक को लगाते हैं। इसके दो कारण बताये जाते हैं। एक मान्यता अनुसार ईश्वर की शक्ति उस आरती में समा जाती है, जिसका अंश भक्त मिल कर अपने अपने मस्तक पर ले लेते हैं। दूसरी मानयता अनुसा ईश्वर की नज़र उतारी जाती है, या बलाएं ली जाती हैं, व भक्तजन उसे इस प्रकार अपने ऊपर लेने की भावना करते हैं, जिस प्रका एक मां अपने बच्चों की बलाएं ले लेती है। ये मात्र सांकेतिक होता है, असल में जिसका उद्देश्य ईश्वर के प्रति अपना समर्पण व प्रेम जताना होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== थाल ===&lt;br /&gt;
[[File:(1) Aarti Thali, Prayer Plate India.jpg|thumb|200x200px|[[पूजा की थाली]]]]&lt;br /&gt;
आरती का थाल धातु का बना होता है, जो प्रायः [[पीतल]], [[तांबा]], [[चांदी]] या [[सोना]] का हो सकता है। इसमें एक गुंधे हुए आटे का, धातु का, गीली मिट्टी आदि का [[दीपक]] रखा होता है। ये दीपक गोल, या पंचमुखी, सप्त मुखी, अधिक विषम संख्या मुखी हो सकता है। इसे तेल या शुद्ध घी द्वारा रुई की बत्ती से जलाया गया होता है। प्रायः तेल का प्रयोग रक्षा दीपकों में किया जाता है, व आरती दीपकों में घी का ही प्रयोग करते हैं। बत्ती के स्थान पर [[कपूर]] भी प्रयोग की जा सकती है। इस थाली में दीपक के अलावा पूजा के फ़ूल, धूप-अगरबत्ती आदि भी रखे हो सकते हैं। इसके स्थान पर सामान्य [[पूजा की थाली]] भी प्रयोग की जा सकती है। कई स्थानों पर, विशेषकर नदियों की आरती के लिये थाली की जगह आरती दीपक प्रयोग होते हैं। इनमें बत्तियों की संख्या १०१ भी हो सकती है। इन्हें शत दीपक या सहस्रदीप भी कहा जाता है। ये विशेष ध्यानयोग्य बात है, कि आरती कभी सम संख्य़ा दीपकों से नहीं की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सामग्री का महत्व ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Multi-tiered aarti stand being lit, during Ganga Aarti, Varanasi.jpg|thumb|200px|आरती के सहस्रदीप की तैयाई करते हुए पुजारी]]&lt;br /&gt;
आरती के समय कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। पूजा में न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे धार्मिक एवं वैज्ञानिक आधार भी हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;याहू-धर्म&amp;quot;/&amp;gt;&amp;lt;ref name=&amp;quot;डिस्कवरी&amp;quot;&amp;gt;[http://hi.brajdiscovery.org/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80 आरती पूजन ] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20110512095733/http://hi.brajdiscovery.org/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80 |date=12 मई 2011 }}। बृज डिस्कवरी&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name=&amp;quot;डिस्कवरी&amp;quot;/&amp;gt;{{Better source|reason=Scientific journal संदर्भित करें|date=October 2015}}&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[कलश]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;: कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। मान्यतानुसा इस खाली स्थान में शिव बसते हैं। यदि आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि भक्त शिव से एकाकार हो रहे हैं। समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[जल]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:	जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। जल को शुद्ध तत्व माना जाता है, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[नारियल]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:	आरती के समय कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में उपस्थित ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[सोना]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:	ऐसी मान्यता है कि स्वर्ण धातु अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। इसीलिये सोने को शुद्ध कहा जाता है। यही कारण है कि इसे भक्तों को भगवान से जोड़ने का माध्यम भी माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[तांबा|तांबे]] की मुद्रा&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;: तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका अर्थ है कि भक्त में सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[सप्तनदी|सप्तनदियों]] का जल&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:	[[गंगा]], [[गोदावरी]], [[यमुना]], [[सिंधु]], [[सरस्वती]], [[कावेरी]] और [[नर्मदा]] नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। क्योंकि अधिकतर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[पान]] [[सुपारी]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:	यदि जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें रजोगुण को समाप्त कर देती हैं और भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ जाती है। पान की बेल को नागबेल भी कहते हैं। नागबेलको भूलोक और ब्रह्मलोक को जोड़ने वाली कड़ी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही, इसे सात्विक भी कहा गया है। देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[तुलसी]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;:	[[आयुर्वेद]] में [[तुलसी]] का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
{{commonscat|Aarti|आरती}}&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20190831060818/https://www.hindirasayan.com/religion/worship/aarti-sangrah 50 से भी अधिक आरतियों का संग्रह pdf सहित]&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20100928144922/http://dinman.com/index.php?option=com_content&amp;amp;task=category&amp;amp;sectionid=5&amp;amp;id=14&amp;amp;Itemid=28 आरती संग्रह]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20100811030218/http://in.jagran.yahoo.com/dharm/?category=3 विभिन्न आरतियां]&lt;br /&gt;
* [http://pustak.org:4300/bs/home.php?bookid=923 १५९१ आरती संग्रह]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}- पुस्तक.ऑर्ग&lt;br /&gt;
* [https://spiritualworld.co.in/religious-songs-and-vrat-kathayen/hindu-aarti-collection/aarti-kya-hai-aur-kaise-karni-chiye-what-is-aarti-and-how-to-do-aarti आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए?]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}&lt;br /&gt;
* [[चित्र:Aarti.ogg|50px|left|आरती की मीडिया फ़ाइल]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:आरती]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पूजा]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धार्मिक संगीत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दु परंपरा]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दु आराधना]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारतीय नाम]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;QueerEcofeminist</name></author>
	</entry>
</feed>