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	<title>आलोचना - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;Rajan Kumar BHU २८ जून २०२१ को १९:३५ बजे</title>
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		<updated>2021-06-28T19:35:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{स्रोतहीन|date=दिसम्बर 2017}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आलोचना&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; या &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;समालोचना&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (Criticism) किसी वस्तु/विषय की, उसके लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, उसके गुण-दोषों एवं उपयुक्ततता का विवेचन करने वालि साहित्यिक विधा है। हिंदी आलोचना की शुरुआत १९वीं सदी के उत्तरार्ध में [[भारतेन्दु युग]] से ही मानी जाती है। &amp;#039;समालोचना&amp;#039; का शाब्दिक अर्थ है - &amp;#039;अच्छी तरह देखना&amp;#039;।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;आलोचना&amp;#039; शब्द &amp;#039;लुच&amp;#039; धातु से बना है। &amp;#039;लुच&amp;#039; का अर्थ है &amp;#039;देखना&amp;#039;। समीक्षा और समालोचना शब्दों का भी यही अर्थ है। [[अंग्रेजी]] के &amp;#039;क्रिटिसिज्म&amp;#039; शब्द के समानार्थी रूप में &amp;#039;आलोचना&amp;#039; का व्यवहार होता है। [[संस्कृत]] में प्रचलित &amp;#039;टीका-व्याख्या&amp;#039; और &amp;#039;काव्य-सिद्धान्तनिरूपण&amp;#039; के लिए भी आलोचना शब्द का प्रयोग कर लिया जाता है किन्तु [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] का स्पष्ट मत है कि आधुनिक आलोचना, [[संस्कृत]] के काव्य-सिद्धान्तनिरूपण से स्वतंत्र चीज़ है। आलोचना का कार्य है किसी साहित्यक रचना की अच्छी तरह परीक्षा करके उसके रूप, गणु और अर्थव्यस्था का निर्धारण करना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डॉक्टर [[श्यामसुन्दर दास]] ने आलोचना की परिभाषा इन शब्दों में दी है:&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें तो आलोचना को उस व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा।&lt;br /&gt;
अर्थात् आलोचना का कर्तव्य साहित्यक कृति की विश्लेषण परक व्याख्या है। साहित्यकार जीवन और अनभुव के जिन तत्वों के संश्लेषण से साहित्य रचना करता है, आलोचना उन्हीं तत्वों का विश्लेषण करती है। साहित्य में जहाँ रागतत्व प्रधान है वहाँ आलोचना में बुद्धि तत्व। आलोचना ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों और शिस्तयों का भी आकलन करती है और साहित्य पर उनके पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तिगत रुचि के आधार पर किसी कृति की निन्दा या प्रशंसा करना आलोचना का धर्म नहीं है। कृति की व्याख्या और विश्लेषण के लिए आलोचना में पद्धति और प्रणाली का महत्त्व होता है। आलोचना करते समय आलोचक अपने व्यक्तिगत राग-द्वेष, रुचि-अरुचि से तभी बच सकता है जब पद्धति का अनुसरण करे, वह तभी वस्तुनिष्ठ होकर साहित्य के प्रति न्याय कर सकता है। इस दृष्टि से [[हिन्दी]] में [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] को सर्वश्रेष्ठ आलोचक माना जाता है।{{by whom}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== आलोचना के प्रकार ==&lt;br /&gt;
आलोचना करते समय जिन मान्यताओं और पद्धतियों को स्वीकार किया जाता है, उनके अनुसार आलोचना के प्रकार विकसित हो जाते हैं। सामान्यत: समीक्षा के चार प्रकारों को स्वीकार किया गया है:-&lt;br /&gt;
# सैद्धान्तिक आलोचना&lt;br /&gt;
# निर्णयात्मक आलोचना&lt;br /&gt;
# प्रभावाभिव्यजंक आलोचना&lt;br /&gt;
# व्याख्यात्मक आलोचना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== सैद्धान्तिक आलोचना ===&lt;br /&gt;
सैद्धान्तिक आलोचना में साहित्य के सिद्धान्तों पर विचार होता है। इसमें प्राचीन शास्त्रीय काव्यागों - रस, अलंकार आदि और साहित्य की आधुनिक मान्यताओं तथा नियमों की मुख्य रूप से विवचेना की जाती है। सैद्धान्तिक आलोचना में विचार का बिन्दु यह है कि साहित्य का मानदंड शास्त्रीय है या ऐतिहासिक। मानदंड का शास्त्रीय रूप, स्थिर और अपरिवर्तनशील होता है किन्तु मानदंडों को ऐतिहासिक श्रेणी माननेपर उनका स्वरूप परिवर्तनशील और विकासात्मक होता है। दोनों प्रकार की सैद्धान्तिक आलोचनाएँ उपलब्ध हैं। किन्तु अब उसी सैद्धान्तिक आलोचना का महत्त्व अधिक है जो साहित्य के तत्वों और नियमों की ऐतिहासिक प्रक्रिया में विकासमान मानती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== निर्णयात्मक आलोचना ===&lt;br /&gt;
निश्चित सिद्धान्तों केआधार पर जब साहित्य के गणु-दोष, श्रेष्ठ-निकृष्ट का निर्णय कर दिया जाता है तब उसे निर्णयात्मक आलोचना कहते हैं। इसे एक प्रकार की नैतिक आलोचना भी माना जाता है। इसका मुख्य स्वभाव न्यायाधीश की तरह साहित्यक कृतियों पर निर्णय देना है। ऐसी आलोचना प्राय: ही सिद्धान्त का यांत्रिक ढंग से उपयोग करती है। इसलिए निर्णयात्मक आलोचना का महत्त्व कम हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि मूल्य या श्रेष्ठ साहित्य और निकृष्ट साहित्य का बोध पैदा करना आलोचना के प्रधान धर्मों में से एक है लेकिन वह सिद्धान्तों के यांत्रिक उपयोग से नहीं सभंव है। &amp;#039;हिन्दी साहित्य कोश&amp;#039; में निर्णयात्मक आलोचना के विषय में बताया गया है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;वह कृतियों की श्रेष्ठता या अश्रेष्ठता के सबंधं में निर्णय देती है। इस निर्णय में वह साहित्य तथा कला संबन्धी नियमों से सहायता लेती है किन्तु ये नियम साहित्य और कला के सहज रूप से सबंधंन रख वाह्य रूप से आरोपित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार आलोचना में निर्णय विवाद का बिन्दु उतना नहीं है जितना निर्णय के लिए अपनाया गया तरीका। जसै, [[रामचन्द्र शुक्ल]] की आलोचना में मूल्य निर्णय है, लेकिन उसका तरीका सृजनात्मक है, यांत्रिक नहीं। निर्णयात्मक आलोचना में मूल्य और तरीका, दोनों की में लचीलापन नहीं होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रभावाभिव्यजंक आलोचना ===&lt;br /&gt;
इस आलोचना में काव्य का जो प्रभाव आलोचक केमन पर पड़ता है उसे वह सजीले पद-विन्यास में व्यस्त कर देता है। इसमें वयैक्तिक रुचि ही मुख्य है। प्रभावाभिव्यजंक समालोचना कोई ठौर-ठिकाने की वस्तु नहीं है। न ज्ञान के क्षेत्र में उसका मूल्य है न भाव के क्षेत्र में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[साहित्यिक समालोचना]]&lt;br /&gt;
* [[समालोचनात्मक सिद्धांत]]&lt;br /&gt;
* [[आलोचनात्मक चिन्तन]] (क्रिटिकल थिंकिंग)&lt;br /&gt;
* [[समालोचनात्मक सिद्धांत]] (क्रिटिकल थिअरी)&lt;br /&gt;
* [[परीक्षावाद]] (क्रिटिकल फिलास्फी)&lt;br /&gt;
* [[विरोध]]&lt;br /&gt;
* [[शिकायत]]&lt;br /&gt;
* [[उपालम्भ]] (काव्य)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20121215063509/http://books.google.co.in/books?id=l8eHcR8kT9YC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false हिन्दी आलोचना : इतिहास और सिद्धान्त] (गूगल पुस्तक ; लेखक - योगेन्द्र प्रताप सिंह)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20121215041749/http://books.google.co.in/books?id=3ibZA9LmyCAC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false हिन्दी आलोचना] (गूगल पुस्तक; लेखक - विश्वनाथ त्रिपाठी)&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=gxVWtMVJDZgC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false समकालीन हिन्दी समीक्षा] (गूगल पुस्तक ; लेखक -डॉ हुकुमचंद राजपाल)&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=fgYAACSIDBEC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false आधुनिक हिन्दी काव्यालोचन के सौ वर्ष] (गूगल पुस्तक ; लेखिका - पुष्पिता अवस्थी)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20060826075639/http://www.citigraphics.net/jenner/djenner/archive/CritiqueAndCriticalThinking.pdf What &amp;quot;Critical&amp;quot; means in &amp;quot;Critical Thinking&amp;quot;] by Donald Jenner&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=NIDt1JjxqToC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आलोचना&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; त्रैमासिक का सहस्राब्दी अंक]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20150504231218/http://www.prernamagazine.com/html/aalekh/mohan.html हिन्दी की आरंभिक आलोचना] (वीरेन्द्र मोहन)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:समालोचना]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;Rajan Kumar BHU</name></author>
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