<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF</id>
	<title>उपपत्ति - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;action=history"/>
	<updated>2026-08-23T19:30:56Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.43.6</generator>
	<entry>
		<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=4365&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;InternetArchiveBot: Rescuing 3 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=4365&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2020-06-16T02:52:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Rescuing 3 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;प्रकरण से प्रतिपादित अर्थ के साधन में जो युक्ति प्रस्तुत की जाती है उसे &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;उपपत्ति&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; कहते हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;प्रकरण प्रतिपाद्यार्थसाधने तत्र तत्र श्रूयमाणा युक्तिः उपपत्तिः।&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्ञान के साधन में उपपत्ति का महत्वपूर्ण स्थान है। आत्मज्ञान की प्राप्ति में जो तीन क्रमिक श्रेणियाँ [[उपनिषद्|उपनिषदों]] में बतलाई गई हैं उनमें &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;मनन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; की सिद्धि उपपत्ति के ही द्वारा होती है। [[वेद]] के उपदेश को श्रुतिवाक्यों से प्रथमतः सुनना चाहिए (श्रवण) और तदनन्तर उनका मनन करना चाहिए (मनन)। युक्तियों के सहारे ही कोई तत्व दृढ़ और हृदयंगम बताया जा सकता है। बिना युक्ति के मनन निराधार रहता है और यह आत्मविश्वास नहीं उत्पन्न कर सकता। मनन की सिद्धि के अनंतर निदिध्यासन करने पर ही आत्मा की पूर्ण साधना निष्पन्न होती है। &amp;quot;मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः&amp;quot; की व्याख्या में माथुरी उपपत्ति को हेतु का पर्याय मानती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारतीय गणित और उपपत्ति==&lt;br /&gt;
बहुत से लोगों को यह गलतफहमी है कि भारतीय गणितज्ञों ने अपने गणितीय प्रमेयों (या, परिणामों) के कोई उपपत्ति (प्रूफ) नही प्रस्तुत किया, किन्तु बात इसके बिलकुल विपरीत है। भारतीय गणित और खगोलिकी के बहुत सारे ग्रन्थों (मुख्यतः टीका ग्रन्थों में) में विस्तारपूर्वक उपपत्तियाँ दी गयीं हैं, जिन्हें &amp;#039;उपपत्ति&amp;#039; या &amp;#039;युक्ति&amp;#039; कहते हैं। प्रकाशित ग्रन्थों में, [[गोविंदस्वामी|गोविन्दस्वामी]] (८००ई) तथा चतुर्वेद प्रथूदकस्वामी (८६०ई) के टीका ग्रन्थों में उपपत्तियाँ मिलतीं हैं जिन्हें सबसे &amp;#039;पहली उपपत्तियाँ&amp;#039; कहा जा सकता है। इसके उपरान्त [[भास्कराचार्य|भास्कराचार्य द्वितीय]] (११५० ई)की रचनाओं में उपपत्तियाँ प्राप्त होतीं हैं। मध्यकाल में [[शंकर वरियार]] (१५३५ ई), [[गणेश दैवज्ञ]] (१५४५ ई),  [[कृष्णदैवज्ञ]] (१६००) तथा [[ज्येष्ठदेव]] (१५३०ई) के [[युक्तिभाष]]ा आदि टीका ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक उपपत्तियाँ दी गयीं हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.ms.uky.edu/~sohum/ma330/files/chennai_talks/Emch_Sridharan_Srinivas%20-%20Contributions%20ot%20the%20History%20of%20Indian%20Mathematics%20%282005%29.pdf Proofs in Indian Mathematics] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170406201122/http://www.ms.uky.edu/~sohum/ma330/files/chennai_talks/Emch_Sridharan_Srinivas%20-%20Contributions%20ot%20the%20History%20of%20Indian%20Mathematics%20%282005%29.pdf |date=6 अप्रैल 2017 }} (पृष्ट २०९)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[गणेश दैवज्ञ]] अपनी [[बुद्धिविलासिनी]] के प्राक्कथन में लिखते हैं:&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;व्यक्तेवाव्यक्तसंज्ञे यदुदितमखिलं नोपपत्तिं बिना तन्निर्भ्रान्तो&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;वा ऋते तां सुगणकसदसि प्रौढ़तां नैति चायं&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;प्रत्यक्षं दृश्यते सा करतलकलितादर्शवत् सुप्रसन्ना &lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;तस्मादग्रयोपपत्तिं निगदितुमखिलं उत्साहे बुद्धिवृद्ध्यै॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;अर्थ:&lt;br /&gt;
व्यक्तगणित या अव्यक्तगणित में जो कुछ भी कहा जाता है वह बिना उपपत्ति के निर्भ्रान्त नहीं होगा।&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रौढ गणितज्ञों की सभा में उसका कोई मूल्य नहीं होगा। &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
उपपत्ति हाथ में रखे दर्पण के समान प्रत्यक्ष दिखती है।&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
इसलिए, तथा बुद्धिवृद्धि के लिये, मैं पूरी उपपत्तियाँ देने के लिये अग्रसर हूँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार गणेशदैवज्ञ ने बुद्धिविलासिनी में कहा है-&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;श्रीभास्करोक्तवचसामपि संस्फुटानां&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;व्याख्याविशेषकथनेन न चास्ति चित्रम्।&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;अत्रोपपत्तिकथनेऽखिलेसारभूते&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;पश्यन्तु सुज्ञगणका मम बुद्धिचित्रम्॥&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;श्रीभास्कर द्वारा कही गयी सीधी बात की और अधिक व्याख्या करने में कोई महानता (चित्रम्) नहीं है। अतः ज्ञानी गणक (गणितज्ञ) उपपत्ति-कथन में मेरे बुद्धिचित्र को देखें जिसमें सबका सार निहित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपपत्ति और प्रूफ (proof) ==&lt;br /&gt;
गणितीय ज्ञान की प्रकृति तथा उसके प्रमाणीकरण के सम्बन्ध में भारतीय तथा पाश्चात्य विचार बहुत भिन्न हैं। उदाहरण के लिये, उपपत्ति के उद्देश्य के सम्बन्ध में [[गोलाध्याय]] के आरम्भ में भास्कराचार्य कहते हैं-&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;मध्याद्यं द्युसदां यदत्र गणितं तस्योपपत्तिं विना &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;प्रौढिं प्रौढसभासु नैति गणको निःसंशयो न स्वयम्। &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;गोले सा विमला करामलकवत प्रत्यक्षो दृश्यते&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;तस्मादस्म्युपपत्तिबोधविधये गोलप्रबन्धोद्यतः॥&lt;br /&gt;
: (उपपत्ति के ज्ञान के बिना ही, इस ग्रन्थ के मध्यमाधिकार (सिद्धान्तशिरोमणि का प्रथम अध्याय) से लेकर आगे तक के केवल गणित में प्रवीण हो जाने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि (उपपत्ति के बिना) वह गणक स्वयं संशयरहित नहीं हो पायेगा, क्योंकि गोल में वह (उपपत्ति ) हाथ में स्थित शुभ्र अमलक की भांति प्रत्यक्ष दिखती है। अतः मैं उपपत्ति की व्याख्या से ही गोलाध्याय का आरम्भ कर रहा हूँ।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार भाष्यकार [[नृसिंह दैवज्ञ]] कहते हैं-&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;उपपत्ति का फल पाण्डित्य तथा संशयनिवृत्ति है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{Reflist}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
*[[अल्गोरिद्म|कलनविधि]]&lt;br /&gt;
*[[गणितीय उपपत्ति]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20180314225651/http://www.open.edu/openlearncreate/mod/oucontent/view.php?id=80228 गणितीय तर्क शक्ति का विकास करना : गणितीय प्रमाण]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20160309094842/http://cpsindia.org/dl/science/mathematics-c3.pdf THE METHODOLOGY OF INDIAN MATHEMATICS]&lt;br /&gt;
* [http://www.vpmthane.org/bhaskara900/papers/M_D_Srinivas.pdf THE METHODOLOGY OF INDIAN MATHEMATICS AND ITS CONTEMPORARY RELEVANCE] (एम डी श्रीनिवास)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:दर्शन]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारतीय गणित]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;InternetArchiveBot</name></author>
	</entry>
</feed>