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	<title>औद्योगिक न्यायालय - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;InternetArchiveBot: Rescuing 3 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1</title>
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		<updated>2020-06-16T04:11:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Rescuing 3 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{स्रोतहीन|date=जुलाई 2015}}&lt;br /&gt;
विश्व के विभिन्न देशों में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;औद्योगिक न्यायालय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (इंडस्ट्रियल कोर्ट) शब्द अनेक अर्थों में व्यवहृत हुआ है। एक साधारण व्यक्ति इसे [[न्यायालय]] समझता है जहाँ विभिन्न प्रकार के औद्योगिक विधानों के कारण उत्पन्न मामलों की सुनवाई होती है, किंतु वास्तव में यह न्यायालय नहीं है। यह एक ऐसा संगठन है जहाँ सरकार अथवा संबद्ध पक्षों की पारस्परिक सहमति से रोजगार की अवस्थाएँ, औद्योगिक घटनाएँ, पारस्परिक तथा लाभांश आदि से संबद्ध मामले पंचायत या समझौते के लिए भेजे जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इतिहास ==&lt;br /&gt;
सन्‌ १९१५ में ब्रिटेन में सरकारी पंचप्रणाली का न्यायाधिकरण स्थापित हुआ, जिससे इस प्रकार के न्यायालयों की नींव पड़ी। सन्‌ १९१९ में औद्योगिक न्यायालय अधिनियम स्वीकृत हो जाने के बाद सरकारी पंचप्रणाली के न्यायाधिकरण का पुनस्संघटन हुआ और इसका नाम औद्योगिक न्यायालय रखा गया। जब मामले इस न्यायालय में भेजे जाते थे तब वह उनपर अपना निर्णय देता था। ये निर्णय औपचारिक रूप से उभय पक्षों के लिए मान्य समझे जाते थे, फिर भी यदि उभय पक्ष उनको स्वीकार न करते तो स्वीकार कराने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछले दोनों महायुद्धकालों में इस प्रकार के न्यायालय उन देशों में स्थापित हो चुके थे जहाँ उद्योग पर्याप्त विकसित हो चुके थे। उस समय यह प्रतीत हुआ कि औद्योगिक विवादों में समझौते के लिए एक नियमित साधन आवश्यक है। औद्योगिक-विवाद-विधान का इतिहास भारत में उतना प्राचीन नहीं है जितना अन्यान्य उद्योगप्रधान देशों में, क्योंकि व्यापक रूप से औद्योगिक हड़तालें इस देश में सामन्यत: प्रचलित नहीं थीं। सन्‌ १९१९ के ब्रिटिश औद्योगिक न्यायालय अधिनियम के आधार पर भारत सरकार ने सन्‌ १९२० में औद्योगिक विवादों के संबंध में एक विधान स्वीकृत करना चाहा, किंतु सन्‌ १९१४-१८ के महायुद्ध के बादवाले अशांतिकाल में इस प्रकार का कार्य आरंभ करना उसने उचित नहीं समझा। इसके अतिरिक्त ब्रिटेन में उद्योगों की जो अवस्थाएँ रही हैं वे भारत में प्रचलित अवस्थाओं से भिन्न रही हैं। अतएव उस समय इस प्रकार के विचारों को छोड़ देना पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्‌ १९२४ में [[मुम्बई|बंबई]] की सूती मिलों में व्यापक हड़ताल हुई। उस हड़ताल से सरकार को एक विधान तैयार कराने की प्ररेणा मिली। फलस्वरूप सन्‌ १९२९ में मजदूर-विवाद-अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम में इस बात की व्यवस्था थी कि उपयुक्त अधिकारी द्वारा जाँच-अदालत अथवा संराधन मंडल (कॉनसिलिएशन बोर्ड) स्थापित किया जाए जो विवादग्रस्त मामलों में समझौता कराए। जाँच अदालत के जिम्मे यह काम रखा गया कि वह मामले की जाँच कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे तथा संराधन मंडल उस मामले में समझौता कराने का प्रयास करे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त दोनों संघटन स्थायी नहीं थे। इसके अतिरिक्त, अधिनियम में औद्योगिक विवाद रोकने की कोई व्यवस्था भी नही थी। श्रम के प्रश्न पर जो राजकीय आयोग स्थापित हुआ उसने सुझाव दिया कि राज्य सरकार द्वारा स्थायी रूप से संराधन अधिकारी नियुक्त किए जाएँ, जिनका यह कर्तव्य हो कि औद्योगिक विवाद उठ खड़ा होने पर आरंभ में ही उभय पक्षों में समझौता करा दें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्‌ १९३४ में एक संशोधन द्वारा सन्‌ १९२९ के अधिनियम को स्थायी रूप दिया गया। सन्‌ १९३८ में &amp;quot;श्रमिक विवाद&amp;#039; की परिभाषा के संबंध में उपर्युक्त अधिनियम में फिर से संशोधन किया गया। संशोधित अधिनियम ने इस बात की भी व्यवस्था की कि गैरकानूनी हड़तालें और तालाबंदी कम प्रतिबंधात्मक हों। इतना होते हुए भी विवादों के हल के लिए अधिनियम में स्थायी व्यवस्था नहीं थी और न यही व्यवस्था थी कि संराधन मंडल अथवा जाँच-अदालत के निर्णय दोनों पक्षों के लिए अनिवार्य रूप से मान्य हों।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्‌ १९३८ में बंबई सरकार ने बंबई-औद्योगिक-विवाद-अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम का लक्ष्य इसके पहले के विधानों की त्रुटियों का निवारण करना था। सन्‌ १९३९ में बंबई राज्य में औद्योगिक न्यायालय स्थापित कर दिए गए। द्वितीय महायुद्ध के समय सन्‌ १९४२ में भारत-रक्षा-नियमावली में एक व्यवस्था की गई जिसके द्वारा सरकार को अधिकार दिया गया कि हड़ताल और तालाबंदी रोकने के लिए वह सामान्य अथवा विशेष नियम बनाए तथा ऐसे किसी भी विवाद को संराधन अथवा न्यायिक निर्णय के लिए सौंपे जिससे जनता को कष्ट पहुँचता हो अथवा युद्धसामग्री की पूर्ति के कार्य में बाधा पहुँचती हो। इन युद्धकालीन नियमों की सफलता देखकर भारत सरकार ने सन्‌ १९४७ में सन्‌ १९२९ के मूल अधिनियम के स्थान पर औद्योगिक-विवाद-अधिनियम पारित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्‌ १९४७ के अधिनियम में मुख्य व्यवस्थाएँ ये थीं : &lt;br /&gt;
*(१) श्रम समितियों का संगठन जिनमें मालिक और मजदूर दोनों के प्रतिनिधि रखे जाएँ और &lt;br /&gt;
*(२) औद्योगिक न्यायाधिकरणों की स्थापना जिनमें दो से अधिक स्वतंत्र सदस्य रखे जाएँ। &lt;br /&gt;
इसके साथ ही इस अधिनियम द्वारा सरकार को यह भी अधिकार दिया गया कि वह संराधन अधिकारी नियुक्त करे जो औद्योगिक विवादों में समझौता कराने का मार्ग निकालें और आवश्यकतानुसार मध्यस्थता भी करें। संराधन अधिकारी को यह अधिकार दिया गया कि जनोपयोगी सेवा विषयक सभी झगड़े अनिवार्य रूप से पंचप्रणाली द्वारा सुलझाएँ। सन्‌ १९४७ के अधिनियम के अंतर्गत विभिन्न न्यायाधिकरणों ने जो जो मत व्यक्त किए वे आपस में मेल नहीं खा रहे थे, क्योंकि उनके बीच संपर्क स्थापित करनेवाली कोई संस्था नहीं थी। फलत: सन्‌ १९५० में औद्योगिक विवाद (अपीली न्यायाधिकरण) अधिनियम पारित किया गया और देश में अपीली न्यायाधिकरणों की स्थापना की गई। इन न्यायाधिकरणों को अधिकार मिला कि वे विभिन्न औद्योगिक न्यायाधिकरणों द्वारा दिए गए निर्णयों के विरुद्ध की जानेवाली अपीलें सुनें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्‌ १९४७ के [[औद्योगिक विवाद अधिनियम]] में सन्‌ १९५२, १९५३ और अंतिम बार सन्‌ १९५६ में संशोधन किए गए, जिसमें अकारण छुट्टी एवं छँटनी के मामलों में श्रमजीवियों को प्रतिकर (मुआवजा) दिलाया जा सके। इसके साथ ही श्रमजीवी पत्रकार भी इस विधि के अंतर्गत श्रमजीवी मान लिए गए। सन्‌ १९५६ के औद्योगिक विवाद (संशोधन एवं विधि व्यवस्थाएँ) अधिनियम ने &amp;quot;श्रमजीवी&amp;#039; शब्द की परिभाषा को और विस्तृत किया तथा पहले की न्यायाधिकरण प्रणाली के स्थान पर त्रिस्तरीय प्रणाली का निर्माण किया। नवीन त्रिस्तरीय प्रणाली के अंतर्गत (क) श्रम न्यायालय, (ख) औद्योगिक न्यायाधिकरण और (ग) राष्ट्रीय न्यायाधिकरण बनाए गए। अपने-अपने क्षेत्रों में सामान्य एवं विशेष समस्याओं के समाधान के लिए बंबई, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, केरल और जम्मू-कश्मीर राज्यों में औद्योगिक विवादों के संबंध में अलग-अलग विधान भी बने हुए हैं।&lt;br /&gt;
== कर्मचारियों के हित में लाए गए अधिनियम – ==&lt;br /&gt;
भारत में कर्मचारियों के साथ हो रहे शोषण एवं परेशानियों को देखते हुए भारत सरकार द्वारा समय-समय पर कर्मचारियों के हित में कानून बनाए गए हैं | अब तक कर्मचारियों के हित में बनाए गए कानून इस प्रकार हैं –&lt;br /&gt;
1. औद्योगिक विवाद अधिनियम – 1947&lt;br /&gt;
2. औद्योगिक रोज़गार (स्थाई आदेश) अधिनियम – 1946&lt;br /&gt;
3. न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम – 1948&lt;br /&gt;
4. मज़दूरी संदाय अधिनियम – 1936 – (खदान, महत्वपूर्ण बन्दरगाह और वायु परिवहन सेवाएँ)&lt;br /&gt;
5. ठेका श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम – 1970&lt;br /&gt;
6. प्रसूति लाभ अधिनियम – 1961&lt;br /&gt;
7. बाल श्रम (निषेध एवंविनियमन) अधिनियम – 1986&lt;br /&gt;
8. रेलवे कर्मचारियों के लिए रोज़गार के घंटे संबंधी विनियमन&lt;br /&gt;
9. बोनस संदाय अधिनियम – 1965&lt;br /&gt;
10. उपदान संदाय अधिनियम – 1972&lt;br /&gt;
11. समान पारिश्रमिक अधिनियम – 1976&lt;br /&gt;
12. अन्तर राज्यीय प्रवासी श्रमिक (रोज़गार एवं सेवा शर्त विनियमन) अधिनियम – 1979&lt;br /&gt;
13. भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक (रोज़गार एवं सेवा शर्त विनियमन) अधिनियम – 1996&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20131023233758/http://business.gov.in/hindi/legal_aspects/indl_disputes.php औद्योगिक विवाद अधिनियम]&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20150129093836/http://www.cglabour.gov.in/content/legal-wing राज्य औद्योगिक न्यायालय, छत्तीसगढ़, रायपुर]&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20150129093900/http://www.labour.nic.in/contenthi/division/introduction.php केन्द्रीय सरकार औद्योगिक अधिकरण एवं श्रम न्यायालय]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:विधि]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;InternetArchiveBot</name></author>
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