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	<title>कविशिक्षा - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;EatchaBot: बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है</title>
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		<updated>2020-03-05T10:42:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[काव्य]]रचना संबंधी विधिविधान अथवा रीति की शिक्षा को &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कविशिक्षा&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; कहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काव्यसर्जना की प्रतिभा यद्यपि प्राचीन काल से नैसर्गिक किंवा जन्मजात मानी जाती रही है, तथापि [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] [[काव्यशास्त्र]] के लगभग सभी प्रमुख आचार्यों ने कवि के लिए सुशिक्षित एवं बहुश्रुत होना आवश्यक बताया है। [[भामह]] ([[काव्यलंकार]], १.१०) ने ईसा की छठी-सातवीं शताब्दी में कवियों के लिए शब्दार्थज्ञान की प्राप्ति, शब्दार्थवेत्ताओं की सेवा तथा अन्य कवियों के निबंधों का मनन कर लेने के पश्चात्‌ ही कविकर्म में प्रवृत्त होना उचित माना है। ८०० ई. के लगभग वामन (काव्यालंकारसूत्र, १:३ तथा ११) ने लोकव्यवहार, शब्दशास्त्र, अभिधान, कोश, [[छन्दशास्त्र|छंदशास्त्र]], [[कामशास्त्र]] कला तथा [[दण्डनीति|दंडनीति]] का ज्ञान प्राप्त करने के अतिरिक्त कवियों के लिए काव्यशास्त्र का उपदेश करनेवाले गुरुओं की सेवा भी जरूरी बताई है। ९०० ई. के लगभग राजशेखर ने &amp;quot;काव्यमीमांसा&amp;#039; के १८ अध्यायों में शास्त्रपरिचय, पदवाक्य, विवेक, पाठप्रतिष्ठा, काव्य के स्रोत, अर्थव्याप्ति, कविचर्या, राजचर्या, काव्यहरण, कविसमय, देशविभाग, कालविभाग, आदि विविध कविशिक्षोपयोगी विषयों का निरूपण किया है। वस्तुत: कविशिक्षा संबंधी सामग्री के लिए राजशेखरकृत &amp;quot;काव्यमीमांसा&amp;#039; मानक ग्रंथ है। इसीलिए राजशेखर के परवर्ती आचार्यों के कविशिक्षा पर लिखते समय &amp;quot;काव्यमीमांसा&amp;#039; में उपलब्ध सामग्री का जमकर उपयोग किया है। [[क्षेमेंद्र]] ने १०५० ई. के समीप अपने ग्रंथ कविकंठाभरण (संधि १ : २) में काव्यरचना में रुचि रखनेवाले व्यक्तियों को निर्देश दिया है कि वे नाटक, शिल्पकौशल, सुंदर चित्र, मानवस्वभाव, समुद्र, नदी, पर्वत आदि विभिन्न स्थानों का निरीक्षण करने के साथ-साथ साहित्यमर्मज्ञ गुरुओं की सेवा तथा वाक्यार्थशून्य पदों के संनिवेश से काव्यसर्जना का अभ्यास आरंभ करें। [[वाग्भट]] (वाग्भटालंकार, १: २, ७ १६ तथा २६) ने ईसा की १२वीं शती के पूर्वार्ध में काव्यरचना के लिए विविध शास्त्रों, कविसमयों आदि के ज्ञान के अतिरिक्त कवि का छंदयोजना तथा अलंकारप्रयोग पर अधिकार होना भी आवश्यक माना है। इतना ही नहीं, वाग्भट ने तो यह भी कहा है कि कवि तभी काव्यरचना करे जब उसका मन प्रसन्न हो। हेमचंद्र (१०८८-११७२) के &amp;quot;[[काव्यानुशासन]]&amp;quot; [[अमरचंद्र]] (१३वीं शती ई.) के &amp;quot;काव्यकल्पलता&amp;#039;, देवेश्वर (१४वीं शती ई.) के &amp;quot;कविकल्पलता&amp;#039; तथा केशव मिश्र (१६वीं शती ई.) के &amp;quot;अलंकारशेखर&amp;#039; इत्यादि ग्रंथों में कविशिक्षा संबंधी पर्याप्त विवरण उपलब्ध हैं जो अधिकांशत: राजशेखर के अनुसार हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंदी काव्यशास्त्र में कविशिक्षा संबंधी ग्रंथ बहुत कम हैं, तो भी [[रीति काल|रीतिकाल]] का पूरा काव्य संस्कृत के उपर्युक्त ग्रंथों से प्रभावित है और इस काल में संस्कृत ग्रंथों की मान्यताओं का परंपरा के रूप में अनुसरण भी किया गया है। आचार्य केशवदास (१५५५-१६१७ ई.) ने &amp;quot;कविप्रिया&amp;#039; में कविता के विषय, काव्यरचना के तरीके, कविनियम (कविसमय) तथा वर्णन परिपाटी को प्रस्तुत किया है। लेकिन उक्त ग्रंथ की अधिकांश सामग्री &amp;quot;अलंकारशेखर&amp;#039; और &amp;quot;काव्यकल्पलता&amp;#039; पर आधृत है। जगन्नाथप्रसाद &amp;quot;भानु&amp;#039; कृत &amp;quot;काव्यप्रभाकर&amp;#039; (१९१० ई. में प्रकाशित) में भी कविशिक्षा संबंधी प्रामाणिक सामग्री मिलती है। उर्दू साहित्य में नए कवि पुराने या प्रतिष्ठित कवियों के संमुख अपनी रचनाएँ इस्लाह (संशोधन) के लिए प्रस्तुत करते रहे हैं। यह भी एक प्रकार की कविशिक्षा ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधुनिक [[हिंदी साहित्य]] (१९०० ई. से प्रारंभ) में न केवल साहित्य एवं काव्य संबंधी मान्यताएँ बदली हैं अपितु कविता के प्रतिमान भी परिवर्तित हो गए हैं। आज का कवि रूढ़ परिपाटियों से मुक्त होकर स्वंतत्रचेता होने का प्रयास कर रहा है। प्रकृति, व्यक्ति और समसामयिक सामाजिक परिवेश को वह नए ढंग से नवीन बिंबविधान एवं स्वप्रसूत सरलीकृत छंदों के माध्यम से रूपायित करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है। अत: काव्यरचना संबंधी पुराने विधिविधान उसे यथावत्‌ ग्राह्य नहीं हैं। परंतु कविता के स्वरूप तथा शक्ति को बनाए रखने के लिए प्राचीन काल की तरह आज भी यह आवश्यक है कि कवि काव्यरचना आरंभ करने के पूर्व काव्यभाषा, छंद, सामाजिक व्यवहार एवं परिवेश आदि से पूरी तरह परिचित हो जाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
*[[कविसमय]]&lt;br /&gt;
*[[काव्यशास्त्र]]&lt;br /&gt;
*[[कवि सम्मेलन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:साहित्य|कविशिक्षा]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;EatchaBot</name></author>
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