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	<title>काव्य - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;Saurabh1204: एक छवि के साथ सुधार #WPWP</title>
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		<updated>2021-07-04T18:14:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;एक छवि के साथ सुधार #WPWP&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति &lt;br /&gt;
| image = Rafael - El Parnaso (Estancia del Sello, Roma, 1511).jpg&lt;br /&gt;
| caption=राफेल द्वारा पारनासस (1511): प्रसिद्ध कवियों ने माउंट पारनासस के ऊपर नौ muses के साथ पढ़ा।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;काव्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;, &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कविता&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; या &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पद्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;, [[साहित्य]] की वह विधा है जिसमें किसी [[कहानी]] या [[मनोभाव]] को कलात्मक रूप से किसी [[भाषा]] के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। [[भारत]] में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ [[भरत मुनि|भरतमुनि]] से समझा जा सकता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वहजिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। [[रसगंगाधर]] में &amp;#039;रमणीय&amp;#039; अर्थ के प्रतिपादक शब्द को &amp;#039;काव्य&amp;#039; कहा है। &amp;#039;अर्थ की रमणीयता&amp;#039; के अंतर्गत शब्द की रमणीयता (शब्दलंकार) भी समझकर लोग इस लक्षण को स्वीकार करते हैं। पर &amp;#039;अर्थ&amp;#039; की &amp;#039;रमणीयता&amp;#039; कई प्रकार की हो सकती है। इससे यह लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं है। [[साहित्य दर्पण|साहित्य दर्पणाकार विश्वनाथ]] का लक्षण ही सबसे ठीक जँचता है। उसके अनुसार &amp;#039;रसात्मक वाक्य ही काव्य है&amp;#039;। रस अर्थात् मनोवेगों का सुखद संचार की काव्य की आत्मा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[काव्यप्रकाश]] में काव्य तीन प्रकार के कहे गए हैं, ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र। ध्वनि वह है जिस, में शब्दों से निकले हुए अर्थ (वाच्य) की अपेक्षा छिपा हुआ अभिप्राय (व्यंग्य) प्रधान हो। गुणीभूत ब्यंग्य वह है जिसमें गौण हो। चित्र या अलंकार वह है जिसमें बिना ब्यंग्य के चमत्कार हो। इन तीनों को क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम भी कहते हैं। काव्यप्रकाशकार का जोर छिपे हुए भाव पर अधिक जान पड़ता है, रस के उद्रेक पर नहीं। काव्य के दो और भेद किए गए हैं, [[महाकाव्य]] और [[खण्डकाव्य|खंड काव्य]]। महाकाव्य सर्गबद्ध और उसका नायक कोई देवता, राजा या धीरोदात्त गुंण संपन्न [[क्षत्रिय]] होना चाहिए। उसमें [[शृंगार रस|शृंगार]], [[वीर रस|वीर]] या [[शान्त रस|शांत]] [[रस (काव्य शास्त्र)|रसों]] में से कोई रस प्रधान होना चाहिए। बीच बीच में करुणा; हास्य इत्यादि और रस तथा और और लोगों के प्रसंग भी आने चाहिए। कम से कम आठ [[सर्ग]] होने चाहिए। महाकाव्य में संध्या, सूर्य, चंद्र, रात्रि, प्रभात, मृगया, पर्वत, वन, ऋतु, सागर, संयोग, विप्रलम्भ, मुनि, पुर, यज्ञ, रणप्रयाण, विवाह आदि का यथास्थान सन्निवेश होना चाहिए। काव्य दो प्रकार का माना गया है, दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य वह है जो [[अभिनय]] द्वारा दिखलाया जाय, जैसे, नाटक, प्रहसन, आदि जो पढ़ने और सुनेन योग्य हो, वह श्रव्य है। श्रव्य काव्य दो प्रकार का होता है, गद्य और पद्य। पद्य काव्य के महाकाव्य और खंडकाव्य दो भेद कहे जा चुके हैं। गद्य काव्य के भी दो भेद किए गए हैं- कथा और आख्यायिका। [[चंपू]], विरुद और कारंभक तीन प्रकार के काव्य और माने गए है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
सामान्यत: [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] के काव्य-साहित्य के दो भेद किये जाते हैं- दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य शब्दों के अतिरिक्त पात्रों की वेशभूषा, भावभंगिमा, आकृति, क्रिया और अभिनय द्वारा दर्शकों के हृदय में रसोन्मेष कराता है। दृश्यकाव्य को &amp;#039;रूपक&amp;#039; भी कहते हैं क्योंकि उसका रसास्वादन नेत्रों से होता है। श्रव्य काव्य शब्दों द्वारा पाठकों और श्रोताओं के हृदय में रस का संचार करता है। श्रव्यकाव्य में पद्य, गद्य और चम्पू काव्यों का समावेश किया जाता है। गत्यर्थक में पद् धातु से निष्पन ‘पद्य’ शब्द गति की प्रधानता सूचित करता है। अत: पद्यकाव्य में ताल, लय और छन्द की व्यवस्था होती है। पुन: पद्यकाव्य के दो उपभेद किये जाते हैं—महाकाव्य और खण्डकाव्य। खण्डकाव्य को ‘मुक्तकाव्य’ भी कहते हैं। खण्डकाव्य में महाकाव्य के समान जीवन का सम्पूर्ण इतिवृत्त न होकर किसी एक अंश का वर्णन किया जाता है—&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;खण्डकाव्यं भवेत्काव्यस्यैकदेशानुसारि च। – [[साहित्य दर्पण|साहित्यदर्पण]], ६/३२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवित्व के साथ-साथ संगीतात्कता की प्रधानता होने से ही इनको हिन्दी में ‘गीतिकाव्य’ भी कहते हैं। ‘गीति’ का अर्थ हृदय की रागात्मक भावना को छन्दोबद्ध रूप में प्रकट करना है। गीति की आत्मा भावातिरेक है। अपनी रागात्मक अनुभूति और कल्पना के कवि वर्ण्यवस्तु को भावात्मक बना देता है। गीतिकाव्य में काव्यशास्त्रीय रूढ़ियों और परम्पराओं से मुक्त होकर वैयक्तिक अनुभव को सरलता से अभिव्यक्त किया जाता है। स्वरूपत: गीतिकाव्य का आकार-प्रकार महाकाव्य से छोटा होता है। इन सब तत्त्वों के सहयोग से संस्कृत मुक्तककाव्य को एक उत्कृष्ट काव्यरूप माना जाता है। मुक्तकाव्य महाकाव्यों की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय हुए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्कृत में गीतिकाव्य मुक्तक और प्रबन्ध दोनों रूपों में प्राप्त होता है। प्रबन्धात्मक गीतिकाव्य का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण [[मेघदूतम्|मेघदूत]] है। अधिकांश प्रबन्ध गीतिकाव्य इसी के अनुकरण पर लिखे गये हैं। मुक्तक वह हैजिसमें प्रत्येक पद्य अपने आप में स्वतंत्र होता है। इसके सुन्दर उदाहरण [[अमरूकशतक]] और [[भतृहरि]]शतकत्रय हैं। संगीतमय छन्द मधुर पदावली गीतिकाव्यों की विशेषता है। शृंंगार, नीति, वैराग्य और प्रकृति इसके प्रमुख प्रतिपाद्य विषय है। नारी के सौन्दर्य और स्वभाव का स्वाभाविक चित्रण इन काव्यों में मिलता है। उपदेश, नीति और लोकव्यवहार के सूत्र इनमें बड़े ही रमणीय ढंग से प्राप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि मुक्तकाव्यों में सूक्तियों और [[सुभाषित|सुभाषितों]] की प्राप्ति प्रचुरता से होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुक्तककाव्य की परम्परा स्फुट सन्देश रचनाओं के रूप में वैदिक युग से ही प्राप्त होती है। [[ऋग्वेद]] में सरमा नामक कुत्ते को सन्देशवाहक के रूप में भेजने का प्रसंग है। वैदिक मुक्तककाव्य के उदाहरणों में वसिष्ठ और वामदेव के सूक्त, उल्लेखनीय हैं। रामायण, महाभारत और उनके परवर्ती ग्रन्थों में भी इस प्रकार के स्फुट प्रसंग विपुल मात्रा में उपलब्ध होते हैं। कदाचित् महाकवि [[वाल्मीकि]] के शाकोद्गारों में यह भावना गोपित रूप में रही है। पतिवियुक्ता प्रवासिनी [[सीता]] के प्रति प्रेषित श्री राम के संदेशवाहक [[हनुमान]], दुर्योधन के प्रति धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा प्रेषित श्रीकृष्ण और सुन्दरी दयमन्ती के निकट राजा नल द्वारा प्रेषित सन्देशवाहक हंस इसी परम्परा के अन्तर्गत गिने जाने वाले प्रसंग हैं। इस सन्दर्भ में [[भागवत पुराण]] का वेणुगीत विशेष रूप से उद्धरणीय है जिसकी रसविभोर करने वाली भावना छवि संस्कृत मुक्तककाव्यों पर अंकित है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==काव्य का प्रयोजन==&lt;br /&gt;
[[राजशेखर]] ने कविचर्या के प्रकरण में बताया है कि [[कवि]] को विद्याओं और उपविद्याओं की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। व्याकरण, कोश, छन्द, और अलंकार - ये चार विद्याएँ हैं। [[६४ कलाएँ]] ही उपविद्याएँ हैं। कवित्व के ८ स्रोत हैं- स्वास्थ्य, प्रतिभा, अभ्यास, भक्ति, विद्वत्कथा, बहुश्रुतता, स्मृतिदृढता और राग।&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;स्वास्थ्यं प्रतिभाभ्यासो भक्तिर्विद्वत्कथा बहुश्रुतता। &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;स्मृतिदाढर्यमनिर्वेदश्च मातरोऽष्टौ कवित्वस्य ॥&amp;#039;&amp;#039; ([[काव्यमीमांसा]])&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=https://sa.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE |title=काव्यमीमांसा |access-date=1 मार्च 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160913201956/https://sa.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE |archive-date=13 सितंबर 2016 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[आचार्य मम्मट|मम्मट]] ने काव्य के छः प्रयोजन बताये हैं-&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039; काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039; सद्यः     परनिर्वृतये     कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥&lt;br /&gt;
: (काव्य यश और धन के लिये होता है। इससे लोक-व्यवहार की शिक्षा मिलती है। अमंगल दूर हो जाता है। काव्य से परम शान्ति मिलती है और कविता से कान्ता के समान उपदेश ग्रहण करने का अवसर मिलता है।)&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://www.exoticindiaart.com/book/details/great-sanskrit-poets-and-their-poetry-HAA421/ |title=संस्कृत के महाकवि और काव्य |access-date=1 मार्च 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20170301182709/http://www.exoticindiaart.com/book/details/great-sanskrit-poets-and-their-poetry-HAA421/ |archive-date=1 मार्च 2017 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== काव्य परिभाषा ==&lt;br /&gt;
{{main|कविता की परिभाषा}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कविता या काव्य क्या है&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; इस विषय में भारतीय साहित्य में आलोचकों की बड़ी समृद्ध परंपरा है— [[आचार्य विश्वनाथ]], [[जगन्नाथ पण्डितराज|पंडितराज जगन्नाथ]], [[पंडित अंबिकादत्त व्यास]], [[आचार्य श्रीपति]], [[भामह]] आदि संस्कृत के विद्वानों से लेकर आधुनिक [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचंद्र शुक्ल]] तथा [[जयशंकर प्रसाद]] जैसे प्रबुद्ध कवियों और आधुनिक युग की मीरा [[महादेवी वर्मा]] ने कविता का स्वरूप स्पष्ट करते हुए अपने अपने मत व्यक्त किए हैं। विद्वानों का विचार है कि मानव हृदय अनन्त रूपतामक जगत के नाना रूपों, व्यापारों में भटकता रहता है, लेकिन जब मानव अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक सम्बंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में [[सत्यं शिवं सुंदरम्]] की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== काव्य के भेद ==&lt;br /&gt;
काव्य के भेद दो प्रकार से किए गए हैं– &lt;br /&gt;
* स्वरूप के अनुसार काव्य के भेद और&lt;br /&gt;
* शैली के अनुसार काव्य के भेद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== स्वरूप के अनुसार काव्य के भेद ===&lt;br /&gt;
स्वरूप के आधार पर काव्य के दो भेद हैं - श्रव्यकाव्य एवं दृश्यकाव्य।&lt;br /&gt;
==== श्रव्य काव्य ====&lt;br /&gt;
जिस काव्य का रसास्वादन दूसरे से सुनकर या स्वयं पढ़ कर किया जाता है उसे श्रव्य काव्य कहते हैं। जैसे [[रामायण]] और [[महाभारत]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रव्य काव्य के भी दो भेद होते हैं - प्रबन्ध काव्य तथा मुक्तक काव्य।&lt;br /&gt;
===== प्रबंध काव्य =====&lt;br /&gt;
इसमें कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। कथा का क्रम बीच में कहीं नहीं टूटता और गौण कथाएँ बीच-बीच में सहायक बन कर आती हैं। जैसे [[श्रीरामचरितमानस|रामचरित मानस]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रबंध काव्य के दो भेद होते हैं - महाकाव्य एवं खण्डकाव्य।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;1- [[महाकाव्य]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; इसमें किसी ऐतिहासिक या पौराणिक महापुरुष की संपूर्ण जीवन कथा का आद्योपांत वर्णन होता है।&lt;br /&gt;
जैसे - पद्मावत, रामचरितमानस, कामायनी, साकेत आदि महाकव्य हैं।&lt;br /&gt;
 महाकाव्य में ये बातें होना आवश्यक हैं-&lt;br /&gt;
* महाकाव्य का नायक कोई पौराणिक या ऐतिहासिक हो और उसका धीरोदात्त होना आवश्यक है।&lt;br /&gt;
* जीवन की संपूर्ण कथा का सविस्तार वर्णन होना चाहिए।&lt;br /&gt;
* श्रृंगार, वीर और शांत रस में से किसी एक की प्रधानता होनी चाहिए। यथास्थान अन्य रसों का भी प्रयोग होना चाहिए।&lt;br /&gt;
* उसमें सुबह शाम दिन रात नदी नाले वन पर्वत समुद्र आदि प्राकृतिक दृश्यों का स्वाभाविक चित्रण होना चाहिए।&lt;br /&gt;
* आठ या आठ से अधिक सर्ग होने चाहिए, प्रत्येक सर्ग के अंत में छंद परिवर्तन होना चाहिए तथा सर्ग के अंत में अगले अंक की सूचना होनी चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;2- [[खण्डकाव्य|खंडकाव्य]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; इसमें किसी की संपूर्ण जीवनकथा का वर्णन न होकर केवल जीवन के किसी एक ही भाग का वर्णन होता है।&lt;br /&gt;
जैसे - पंचवटी, सुदामा चरित्र, हल्दीघाटी, पथिक आदि खंडकाव्य हैं।&lt;br /&gt;
 खंड काव्य में ये बातें होना आवश्यक हैं-&lt;br /&gt;
* कथावस्तु काल्पनिक हो।&lt;br /&gt;
* उसमें सात या सात से कम सर्ग हों।&lt;br /&gt;
* उसमें जीवन के जिस भाग का वर्णन किया गया हो वह अपने लक्ष्य में पूर्ण हो।&lt;br /&gt;
* प्राकृतिक दृश्य आदि का चित्रण देश काल के अनुसार और संक्षिप्त हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===== मुक्तक =====&lt;br /&gt;
इसमें केवल एक ही पद या छंद स्वतंत्र रूप से किसी भाव या रस अथवा कथा को प्रकट करने में समर्थ होता है। गीत कवित्त दोहा आदि मुक्तक होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दृश्य काव्य ====&lt;br /&gt;
जिस काव्य की आनंदानुभूति अभिनय को देखकर एवं पात्रों से कथोपकथन को सुन कर होती है उसे दृश्य काव्य कहते हैं। जैसे [[नाटक]] में या चलचित्र में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शैली के अनुसार काव्य के भेद ===&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;1- पद्य काव्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - इसमें किसी कथा का वर्णन काव्य में किया जाता है, जैसे  गीतांजलि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;2- गद्य काव्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - इसमें किसी कथा का वर्णन गद्य में किया जाता है, जैसे जयशंकर की कमायनी ।।। गद्य में काव्य रचना करने के लिए कवि को छंद शास्त्र के नियमों से स्वच्छंदता प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;3- चंपू काव्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - इसमें गद्य और पद्य दोनों का समावेश होता है। [[मैथिलीशरण गुप्त]] की &amp;#039;यशोधरा&amp;#039; [[चंपू|चंपू काव्य]] है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== काव्य का इतिहास ==&lt;br /&gt;
[[आधुनिक हिंदी पद्य का इतिहास]] लगभग ८०० साल पुराना है और इसका प्रारंभ तेरहवीं शताब्दी से समझा जाता है। हर भाषा की तरह हिंदी कविता भी पहले इतिवृत्तात्मक थी। यानि किसी कहानी को [[लय]] के साथ [[छंद]] में बांध कर [[अलंकारों]] से सजा कर प्रस्तुत किया जाता था। भारतीय साहित्य के सभी प्राचीन ग्रंथ कविता में ही लिखे गए हैं। इसका विशेष कारण यह था कि लय और छंद के कारण कविता को याद कर लेना आसान था। जिस समय छापेखाने का आविष्कार नहीं हुआ था और दस्तावेज़ों की अनेक प्रतियां बनाना आसान नहीं था उस समय महत्वपूर्ण बातों को याद रख लेने का यह सर्वोत्तम साधन था। यही कारण है कि उस समय साहित्य के साथ साथ [[राजनीति]], [[विज्ञान]] और [[आयुर्वेद]] को भी पद्य (कविता) में ही लिखा गया। भारत की प्राचीनतम कविताएं [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] भाषा में [[ऋग्वेद]] में हैं जिनमें प्रकृति की प्रशस्ति में लिखे गए छंदों का सुंदर संकलन हैं। जीवन के अनेक अन्य विषयों को भी इन कविताओं में स्थान मिला है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{Reflist}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[रस (काव्य शास्त्र)|रस]]&lt;br /&gt;
* [[छंद|छन्द]]&lt;br /&gt;
* [[अलंकार]]&lt;br /&gt;
* [[काव्यशास्त्र]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20121215052503/http://books.google.co.in/books?id=chTjEUQucWkC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q=&amp;amp;f=false काव्यशास्त्र के मानदण्ड] (गूगल पुस्तक; डॉ रामनिवास गुप्त)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20121215042123/http://books.google.co.in/books?id=wHeW_CuIsXkC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q=&amp;amp;f=false भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका] (गूगल पुस्तक; लेखक - योगेन्द्र प्रताप सिंह)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20120117073858/http://hi.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88%3F कविता क्या है?] विकिस्रोत पर, लेखक—आचार्य रामचन्द्र शुक्ल।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:साहित्य|काव्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दी|काव्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पद्य|काव्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:कविताएँ|*]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:शायरी]]&lt;/div&gt;</summary>
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