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	<title>किरण मजूमदार-शॉ - अवतरण इतिहास</title>
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		<updated>2020-06-16T05:33:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Rescuing 2 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{ज्ञानसन्दूक व्यक्ति&lt;br /&gt;
| image = Kiran Mazumdar-Shaw BNC.jpg&lt;br /&gt;
| name = Kiran Mazumdar-Shaw&lt;br /&gt;
| kannada = ಕಿರಣ್ ಮಜುಮ್ದರ್ ಷ&lt;br /&gt;
| birth_date = {{Birth date and age|1953|3|23}}&lt;br /&gt;
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| occupation = Chairperson of [[बायोकॉन]]&lt;br /&gt;
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| ethnicity =&lt;br /&gt;
| religion =&lt;br /&gt;
| footnotes =&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;किरण मजूमदार-शॉ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ({{lang-kn|ಕಿರಣ್ ಮಜುಮ್ದರ್ ಷ}}; जन्म 23 मार्च 1953) एक [[भारत|भारतीय]] [[उद्यमी]] हैं। वे [[बायोकॉन]] की अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जीवन वृत ==&lt;br /&gt;
किरण मजूमदार-शॉ (जन्म: 23 मार्च 1953) एक भारतीय महिला व्यवसायी, टेक्नोक्रेट, अन्वेषक और बायोकॉन की संस्थापक है, जो भारत के बंगलौर में एक अग्रणी [[जैवप्रौद्योगिकी|जैव प्रौद्योगिकी]] संस्थान है। वे बायोकॉन लिमिटेड की अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक तथा [[सिनजीन इंटरनेशनल लिमिटेड]] और [[क्लिनिजीन इंटरनेशनल लिमिटेड]] की अध्यक्ष हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने 1978 में बायोकॉन को शुरू कर दीया और उत्पादों के अच्छी तरह से संतुलित व्यापार पोर्टफोलियो तथा [[मधुमेह]], [[कर्कट रोग|कैंसर-विज्ञान]] और आत्म-प्रतिरोध बीमारियों पर केंद्रित शोध के साथ इसे एक औद्योगिक एंजाइमों की निर्माण कंपनी से विकासित कर पूरी तरह से एकीकृत जैविक दवा कंपनी बनाया। उन्होंने दो सहायक कंपनियों की भी स्थापना की: खोज अनुसंधान हेतु विकास सहायक सेवाएं प्रदान करने के लिए सिनजीन (1994) और नैदानिक विकास सेवाओं को पूरा करने के लिए क्लिनिजीन (2000)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे जैव प्रौद्योगिकी को एक क्षेत्र के रूप में बढ़ावा देने में रुचि रखती हैं और कर्नाटक राज्य के विजन ग्रुप ऑन बायोटेक्नोलॉजी की अध्यक्षा है। भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सलाहकार परिषद की एक सदस्य के रूप में, उन्होंने भारत में जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास के मार्गदर्शन के लिए भारत सरकार, उद्योग और शिक्षा को एक साथ लाने में एक निर्णायक भूमिका निभाई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस क्षेत्र में अपने अग्रणी कार्यों के लिए उन्होंने भारत सरकार से प्रतिष्ठित पद्मश्री (1989) और पद्म भूषण (2005) समेत कई पुरस्कार अर्जित किए हैं। जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके द्वारा लीक से हट कर किए गए कार्यों को कॉर्पोरेट दुनिया में बहुत ही सम्मान दिया गया है तथा इससे भारतीय उद्योग और बायोकॉन दोनों को विश्व स्तर पर मान्यता मिली है। हाल ही में टाइम पत्रिका के दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में इनका नाम भी शामिल किया गया था। वे दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की फोर्ब्स की सूची और फाइनेंशियल टाइम्स के कारोबार में शीर्ष 50 महिलाओं की सूची में भी शामिल हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्रारंभिक जीवन ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बंगलौर में जन्मी, किरण मजूमदार-शॉ ने शहर के बिशप कॉटन गर्लस हाई स्कूल में (1968) अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। वे मेडिकल स्कूल में भरती होना चाहती थीं, लेकिन इसके बदले उन्होंने जीव विज्ञान लिया और बीएससी जूलॉजी ऑनर्स लेकर बंगलौर विश्वविद्यालय (1973) से बीएससी का पाठ्यक्रम पूरा किया। उसके बाद उन्होंने मॉल्टिंग और ब्रूइंग पर बैलेरैट कॉलेज, मेलबोर्न यूनिवर्सिटी, (1975) से स्नातक स्तर की पढ़ाई की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेलबोर्न के कार्लटोन और यूनाइटेड ब्रुअरीज में उन्होंने बतौर प्रशिक्षु ब्रुअर के और ऑस्ट्रेलिया के बैरेट ब्रदर्स तथा बर्स्टोन में बतौर प्रशिक्षु माल्स्टर के रूप में काम किया। उन्होंने कुछ समय के लिए कलकत्ता की जूपिटर ब्रुअरीज लिमिटेड में तकनीकी सलाहकार के रूप में और 1975 से 1977 तक बड़ौदा के स्टैंडर्ड मॉल्टिंग कॉरपोरेशन में तकनीकी प्रबंधक के रूप में भी काम किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बायोकॉन ==&lt;br /&gt;
1978 में, वे आयरलैंड के कॉर्क के बायकॉनकैमिकल्स लिमिटेड से एक प्रशिक्षु प्रबंधक के रूप में जुड़ीं। उसी वर्ष उन्होंने आरंभिक पूंजी के साथ जो 10,000 थी, बंगलौर के किराये के मकान के गैरेज में बायोकॉन शुरू किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रारंभ में, उन्हें अपनी कम उम्र, लिंग और बगैर परखे गए व्यापार मॉडल के कारण विश्वसनीयता संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कोई भी बैंक उन्हें ऋण नहीं देना चाहता था, इसलिए समस्या केवल धन की ही नहीं थी, बल्कि अपने नए काम पर लोगों को नियुक्त करना भी कठिन था। उन्होंने ढांचागत क्षेत्र में उदासीनता के माहौल वाले देश में एक बायोटेक व्यवसाय को खड़ा करने की कोशिश में एकनिष्ठ दृढ़ संकल्प के साथ प्रौद्योगिकी से जुड़ी चुनौतियों का सामना किया और इनसे बाहर निकलीं। उस समय भारत में निर्बाध विद्युत, बेहतर गुणवत्तावाले पानी, रोगाणुरहित प्रयोगशालाओं, आयातित अनुसंधान उपकरण और उन्नत वैज्ञानिक कौशल आसानी से उपलब्ध नहीं था। वे किसी भी चीज़ को आसानी से जाने देनेवाली नहीं रही हैं, इसीलिए उन्होंने तमाम चुनौतियों का सामना किया और सीमित परिस्थिति में बायोकॉन को नई और प्रगति की ऊंचाइयों पर पहुंचाने का काम किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्हें ऐसा कहते हुए उद्धृत किया गया है, &amp;quot;उद्देश्यपरक और चुनौती झेलने की भावना के साथ सपने का पीछा करना ही सफलता है। सफलता को प्राप्त करने का कोई आसान रास्ता नहीं है और न ही मेहनत का कोई विकल्प है। मेरा यह भी मानना है कि अलग तरीके से काम करना भी सफलता का मंत्र है - मजबूती से खड़े होने के लिए कुछ अलग करने की हिम्मत होनी चाहिए। बायोकॉन के नाम के साथ लिखा होता है &amp;#039;अंतर हमारे डीएनए (DNA) में रहता है&amp;#039; और हम सब इसमें विश्वास रखते हैं। हम अन्य कंपनियों की नकल नहीं करते, बल्कि हमने अपने व्यापार के भाग्य की रूपरेखा स्वयं तैयार की है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बायोकॉन के परिचालन के लिए सालों से विकास के प्रक्षेप पथ और नवाचारों के साथ बायोकॉन के परिचालन का श्रेय उन्हीं को जाता है। अपनी स्थापना के एक वर्ष के भीतर, बायोकॉन एंजाइमों का विनिर्माण करनेवाली और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोप को उनका निर्यात करनेवाली भारत की पहली कंपनी बन गई। 1989 में, बायोकॉन भारत की पहली जैव प्रौद्योगिकी कंपनी बनी, जिसे ट्रेडमार्क युक्त प्रौद्योगिकियों के लिए अमेरिका से धन प्राप्त हुआ। 1990 में, उन्होंने बायोकॉन के उन्नत आन्तरिक अनुसंधान कार्यक्रम को ट्रेडमार्क युक्त सान्द्र अधःस्तर खमीरण प्रौद्योगिकी पर आधारित बनाया। इस कार्यक्रम की व्यावसायिक सफलता के कारण 1996 तक इसका तीन गुना विस्तार हुआ और बायोकॉन ने जैवफार्मास्युटिकल्स और स्टैटिन के क्षेत्र में प्रवेश किया। 1997 में, समर्पित निर्माण की सुविधा के जरिए उन्होंने मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहल की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1998 में, जब यूनीलीवर अपनी हिस्सेदारी बायोकॉन में भारतीय प्रमोटरों को बेचने पर सहमत हुआ तब बायोकॉन एक स्वतंत्र संस्था बन गई। दो साल बाद, बायोकॉन का ट्रेडमार्क युक्त सान्द्र मैट्रिक्स खमीरण पर आधारित बायोरिएक्टर, जिसका नामकरण प्लैफरेक्टरटीएम (Plafractor TM) किया गया था, ने यू.एस। पेटेंट प्राप्त किया और किरण मजूमदार-शॉ ने बायोकॉन को विशेष दवाइयों के उत्पादन के लिए पहला पूरी तरह से स्वचालित जलमग्न खमीरण संयंत्र बनाया। 2003 तक बायोकॉन पिचिया प्रकटन प्रणाली पर मानव इंसुनिल विकसित करनेवाली दुनिया की पहली कंपनी बन गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी साल, उन्होंने बायोकॉन बायोफ़ार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड को क्यूबन सेंटर ऑफ मॉलीक्युलर इम्यूनोलॉजी के साथ संयुक्त उद्यम में बायोथेप्युटिक के चुनिंदा रेंज के विनिर्माण और विपणन में शामिल किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2004 में, उन्होंने पूंजी बाजार तक पहुंचने के लिए बायोकॉन के शोध कार्यक्रमों की पाइप लाइन को विकसित करने का फैसला किया। बायोकॉन का आईपीओ 32 बार अत्यधिदत्त (ओवरसब्सक्राइब) हुआ और पहले दिन 1.11 बिलियन डॉलर के बाजार मूल्य के साथ बंद हुआ, सूचीबद्ध होने के पहले ही दिन बायोकॉन 1 बिलियन डॉलर के निशान को पार करनेवाली भारत की दूसरी कंपनी बन गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने 2,200 से अधिक उच्च मूल्य अनुसंधान एवं विकास (R&amp;amp;amp;D) लाइसेंस तथा 2005 और 2010 के बीच फार्मास्यूटिकल्स और जैव फार्मास्यूटिकल्स के अन्य सौदों में उन्होंने कदम रखा; इससे बायोकॉन को अधिग्रहण, भागीदारी और लाइसेंस के जरिए उभरने और विकसित बाजार में विस्तार कर विश्व में अपने कदमों के निशान छोड़ने में मदद मिली। उनका विश्वास है कि स्वास्थ्य के देखभाल की जरूरत केवल सस्ते आविष्कार के साथ पूरी हो सकती है, यही वह दर्शन है जिसने बायोकॉन को प्रभावी ढंग से विनिर्माण करने और बाजार में अनुकूल लागत के साथ दवाओं के विपणन में मदद की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 2007-08 में अमेरिका के एक प्रमुख व्यापार प्रकाशन, मेड एड न्यूज ने बायोकॉन को दुनिया भर की जैव प्रौद्योगिकी कंपनियों में 20वां और दुनिया के सबसे बड़े नियोक्ताओं में 7वां स्थान दिया। बायोकॉन को सर्वश्रेष्ठ सूचीबद्ध कंपनी का 2009 का बायोसिंगापुर एशिया पेसिफिक बायोटेक्नोलॉजी पुरस्कार भी मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनके नेतृत्व को धन्यवाद है, जिससे बायोकॉन ने आज लाभदायक क्षमता और वैश्विक विश्वसनीयता तथा अपने विनिर्माण और विपणन गतिविधियों में विश्व स्तर को प्राप्त किया है। यह एशिया की सबसे बड़ी इंसुलिन और स्टैटिन सुविधाएं हैं तथा इसके पास शरीर के अंगों और उत्तकों में एंटीबॉडी का छिड़काव-आधारित उत्पादन की सुविधाएं भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परोपकारी गतिविधियां ==&lt;br /&gt;
2004 में, उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग को फायदा पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और पर्यावरण कार्यक्रम संचालित करने के र्लिए बायोकॉन फाउंडेशन शुरू किया। फाउंडेशन के सूक्ष्म-स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम ने 70,000 ग्रामीण सदस्यों का नामांकन किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके सात एआरवाई (ARY) क्लीनिक ऐसी जगहों पर स्थित हैं जहां स्वास्थ्य सुविधाएं बहुत खराब हैं तथा जो लोग इन्हें खरीदने में समर्थ नहीं हैं उन्हें चिकित्सीय देखभाल, जेनेरिक दवाएं और बुनियादी परीक्षण प्रदान किया जाता है। प्रत्येक क्लीनिक 10 किलोमीटर के भीतर रहनेवाली 50,000 आबादी के लिए कार्य करता हैं। सभी क्लीनिक नियमित रूप से नेटवर्क अस्पतालों से चिकित्सकों और डॉक्टरों को दूरदराज के गांवों में ले जाकर सामान्य स्वास्थ्य की जांच कराते हैं। प्रत्येक वर्ष, स्वास्थ्य के देखभाल के लिए फाउंडेशन अपने समग्र दृष्टिकोण के माध्यम से 300,000 लोगों को सेवा प्रदान करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फाउंडेशन चलती-फिरती चिकित्सा सेवाएं भी प्रदान करता है और रोगनिरोधक स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम तथा मुफ्त स्वास्थ्य देखभाल शिविर का भी आयोजन करता है।‍&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने 2007 में डॉ॰ देवी शेट्टी के नारायण दृदयालय के साथ मिलकर बंगलौर के बूम्मसंद्रा के नारायण हेल्थ सिटी परिसर में 1,400 शय्यावाले कैंसर देखभाल केंद्र की स्थापना की है। यह मजूमदार-शॉ कैंसर सेंटर (MSCC) कहलाता है, यह अपनी तरह के सबसे बड़े कैंसर अस्पतालों में से एक है, जो कि पांच लाख वर्गफीट से भी अधिक बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। यह विशेष रूप से सिर और गर्दन के कैंसर, स्तन कैंसर और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के लिए है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अन्य भूमिकाएं ==&lt;br /&gt;
किरण मजूमदार-शॉ भारत सरकार की एक स्वायत्त निकाय इंडियन फार्माकोपिया कमीशन के प्रबंध निकाय और सामान्य निकाय की सदस्य हैं। वे स्टेम सेल बायोलॉजी एंड रिजेनरेटिव मेडिसीन के लिए बने संस्थान की सोसाइटी की संस्थापक सदस्य हैं। उन्हें वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा व्यापार मंडल और विदेश व्यापार महानिदेशालय की सदस्य के रूप में नामित किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे भारत सरकार के नेशनल इनोवेशन काउंसिल की एक सदस्य और बंगलौर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रशासक मंडल की सदस्य हैं। वे विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान परिषद (एसईआरसी (SERC)), भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य के लिए बायो वेंचर्स की बोर्ड सदस्य और कर्नाटक में आयरिश दूतावास की मानद वाणिज्य दूत हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निजी जीवन‍ ==&lt;br /&gt;
उन्होंने भारत के एक बड़े प्रशंसक और स्कॉटलैंड निवासी जॉन शॉ से ब्याह रचाया, जो 1991-1998 तक मदुरा कोट्स के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक रहे। वर्तमान समय में जॉन शॉ बायोकॉन लिमिटेड के उपाध्यक्ष हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किरण मजूमदार-शॉ कला पारखी है और उनके पास चित्रों और कला से संबंधित चीजों का बहुत विशाल संग्रह है। वे एक कॉफी टेबल पुस्तक, एले एंड आर्टि, द स्टोरी ऑफ बीयर की लेखिका भी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे एक नागरिक कार्यकर्ता के रूप में, बंगलौर शहर के विकास के लिए बंगलौर एजेंडा टास्क फोर्स (बीएटीएफ (BATF)) जैसे विभिन्न कार्यक्रमों से वे जुड़ी हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुरस्कार ==&lt;br /&gt;
किरण मजूमदार-शॉ को निक्की एशिया पुरस्कार (2009) समेत, क्षेत्रीय विकास के लिए एक्सप्रेस फार्मसूटिकल लीडरशिप समिट अवार्ड (2009), सक्रिय उद्यमी के लिए, इकोनॉमिक टाइम्स का ‍&amp;#039;साल की महिला व्यवसायी&amp;#039; (2004) का पुरस्कार, एशिया के आर्थिक विकास के लिए क्लिक्क्वाट वयूवे इनिसिएटिव पुरस्कार, जीव विज्ञान और स्वास्थ्य देखभाल के लिए अर्न्स्ट एंड यंग का साल का उद्यमी (2002) पुरस्कार, व्लर्ड इकोनॉमिक्स फोरम द्वारा &amp;#039;टेक्नोलॉजी पायोनियर&amp;#039; की मान्यता तथा इंडियन चैंबर्स का जीवन भर की उपलब्धियों का पुरस्कार मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार (2002), भारतीय व्यापार नेतृत्व पुरस्कार समिति द्वारा साल की सवोत्कृष्ट महिला व्यावसायी का पुरस्कार, सीएनबीसी- टीवी 18 (2006), के भारतीय व्यापारी परिसंघ डायमंड जुबली प्रतिभा ट्रस्ट का &amp;#039;साल की प्रमुख व्यवसायी&amp;#039; (2006) पुरस्कार और अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन द्वारा &amp;#039;कॉर्पोरेट लीडरशिप अवार्ड&amp;#039;(2005) भी प्राप्त किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2004 में जैव प्रौद्योगिकी में उनके योगदानों को मान्यता देने के लिए उनके मातृ संस्थान बैलेरैट यूनिवर्सिटी ने उन्हें विज्ञान का मानद डॉक्टरेट प्रदान किया, इसके अलावा यूके के डंडी यूनिवर्सिटी (2007), यूके की ग्लासगो युनिवर्सिटी (2008) और यूके के एडिनबर्ग की हेरिएट-वाट यूनिवर्सिटी (2008) ने भी उन्हें मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20101026031837/http://biocon.com/docs/AR10-BIOCON.pdf बायोकॉन की वार्षिक रिपोर्ट, 2010]&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20140807042606/http://www.biocon.com/ बायोकॉन वेबसाइट]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{२००५ पद्म भूषण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारतीय महिलाएँ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:जीवित लोग]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:उद्यमी]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:महिला उद्यमी]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:1953 में जन्मे लोग]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:२००५ पद्म भूषण]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पद्मश्री प्राप्तकर्ता]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:बेंगलुरु के लोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;InternetArchiveBot</name></author>
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