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	<title>गोत्र - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;InternetArchiveBot: Rescuing 2 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1</title>
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		<updated>2020-06-14T19:29:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Rescuing 2 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;गोत्र&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; मोटे तौर पर उन लोगों के समूह को कहते हैं जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है। [[व्याकरण]] के प्रयोजनों के लिये [[पाणिनि]] में गोत्र की परिभाषा है &amp;#039;अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्&amp;#039; (४.१.१६२), अर्थात &amp;#039;गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक साधु की) संतान्। गोत्र, कुल या वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है। गोत्र को हिन्दू लोग लाखो हजारो वर्ष पहले पैदा हुए पूर्वजो के नाम से ही अपना गोत्र चला रहे हैंं। जिससे वैवाहिक जटिलताएं उतपन्न नहींं हो रही हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गोत्रीय तथा अन्य गोत्रीय==&lt;br /&gt;
[[भारत]] में हिंदू विधि के [[मिताक्षरा]] तथा [[दायभाग]] नामक दो प्रसिद्ध सिद्धांत हैं। इनमें से दायभाग विधि [[बंगाल]] में तथा मिताक्षरा [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]] के अतिरिक्त शेष भारत में प्रचलित है। [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]] में इसमें रूढ़िगत परिवर्तन हो गए हैं। मिताक्षरा विधि के अनुसार रक्तसंबंधियों के दो सामान्य प्रवर्ग हैं :&lt;br /&gt;
*(१) गोत्रीय अथवा गोत्रज सपिंड, और&lt;br /&gt;
*(२) अन्य गोत्रीय अथवा भिन्न गोत्रीय अथवा बंधु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[हिंदू विधि]] के [[मिताक्षरा]] सिद्धांत के अनुसार रक्त संबंधियों को दो सामान्य प्रवर्गों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम प्रवर्ग को गोत्रीय अर्थात् &amp;#039;सपिंड गोत्रज&amp;#039; कहा जा सकता है। गोत्रीय अथवा गोत्रज सपिंड वे व्यक्ति हैं जो किसी व्यक्ति से पितृ पक्ष के पूर्वजों अथवा वंशजों की एक अटूट श्रृखंला द्वारा संबंधित हों। वंशपरंपरा का बने रहना अत्यावश्यक है। उदाहरणार्थ, किसी व्यक्ति के पिता, दादा और परदादा आदि उसके गोत्रज सपिंड या गोत्रीय हैं। इसी प्रकार इसके पुत्र पौत्रादि भी उसके गोत्रीय अथवा गोत्रज सपिंड हैं, या यों कहिए कि गोत्रज सपिंड वे व्यक्ति हैं जिनकी धमनियों में समान रक्त का संचार हो रहा हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्त-संबंधियों के दूसरे प्रवर्ग को &amp;#039;अन्य गोत्रीय&amp;#039; अथवा भिन्न गोत्रज सपिंड या बंधु भी कहते हैं। अन्य गोत्रीय या बंधु वे व्यक्ति हैं जो किसी व्यक्ति से मातृपक्ष द्वारा संबंधित होते हैं। उदाहरण के लिये, भानजा अथवा भतीजी का पुत्र बंधु कहलाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोत्रीय से आशय उन व्यक्तियों से है जिनके आपस में पूर्वजों अथवा वंशजों की सीधी पितृ परंपरा द्वारा रक्तसंबंध हों। परंतु यह वंश परंपरा किसी भी ओर अनंतता तक नहीं जाती। यहाँ केवल वे ही व्यक्ति गोत्रीय हैं जो समान पूर्वज की सातवीं पीढ़ी के भीतर आते हैं। हिंदू विधि के अनुसार पीढ़ी की गणना करने का जो विशिष्ट तरीका है वह भी भिन्न प्रकार का है। यहाँ व्यक्ति को अथवा उस व्यक्ति को अपने आप को प्रथम पीढ़ी के रूप में गिनना पड़ता है जिसके बार में हमें यह पता लगाना है कि वह किसी विशेष व्यक्ति का गोत्रीय है अथवा नहीं। उदाहरण के लिये, यदि &amp;#039;क&amp;#039; वह व्यक्ति है जिसके पूर्वजों की हमें गणना करनी है तो &amp;#039;क&amp;#039; को एक पीढ़ी अथवा प्रथम पीढ़ी के रूप में गिना जायगा। उसके पिता दूसरी पीढ़ी में तथा उसके दादा तीसरी पीढ़ी में आएँगे और यह क्रम सातवीं पीढ़ी तक चलेगा। ये सभी व्यक्ति &amp;#039;क&amp;#039; के गोत्रीय होंगे। इसी प्रकार हम पितृवंशानुक्रम में अर्थात् पुत्र पौत्रादि की सातवीं पीढ़ी तक, अर्थात् &amp;#039;क&amp;#039; के प्रपौत्र के प्रपौत्र तक, गणना कर सकते हैं। ये सभी गोत्रज सपिंड हैं परंतु केवल इतने ही गोत्रज सपिंड नहीं हैं। इनके अतिरिक्त सातवीं पीढ़ी तक, जिसकी गणना में प्रथम पीढ़ी के रूप में पिता सम्मिलित हैं, किसी व्यक्ति के पिता के अन्य पुरुष वंशज अर्थात् भाई, भतीजा, भतीजे के पुत्रादि भी गोत्रज सपिंड हैं। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के दादा के छ: पुरुष वंशज और परदादा के पिता के छ: पुरुष वंशज भी गोत्रज सपिंड हैं। हम इन छ: वंशजों की गणना पूर्वजावलि के क्रम में तब तक करते हैं जब तक हम &amp;#039;क&amp;#039; के परदादा के परदादा के छ: पुरुष वंशजों को इसमें सम्मिलित नहीं कर लेते। इस वंशावलि में और गोत्रज सपिंड भी सम्मिलित किए जा सकते हैं जैसे &amp;#039;क&amp;#039; की धर्मपत्नी तथा पुत्री और उसका दौहित्र। &amp;#039;क&amp;#039; के पितृपक्ष के छह वंशजों की धर्मपत्नियाँ अर्थात् उसकी माता, दादी, परदादी और उसके परदादा के परदादा की धर्मपत्नी तक भी गोत्रज सपिंड हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्यक् तथा संकुचित वैधिक निर्वचन के अनुसार, गोत्रज सपिंडों की कुल संख्या ५७ है। &amp;#039;क&amp;#039; के समान पूर्वज की १३वीं पीढ़ी तक के इन पूर्वजों के वंशजों के परे जो व्यक्ति होंगे वे &amp;#039;क&amp;#039; के समानोदक होंगे। इनके अतिरिक्त &amp;#039;क&amp;#039; के परदादा के परदादा के परे पितृपरंपरा के सात पूर्वज और उस परंपरा में ४१वीं पीढ़ी तक के उनके वंशज भी &amp;#039;क&amp;#039; के समानोदक होंगे। समानोदक वे व्यक्ति हैं जिन्हें &amp;#039;क&amp;#039; [[श्राद्ध]] करते समय [[जल]] देता है। परतु व्यापक दृष्टि से समानोदक भी गोत्रीय ही हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिनके गोत्र ज्ञात न हों उन्हें काश्यपगोत्रीय माना जाता है।&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते। &lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039;यस्मादाह श्रुतिस्सर्वाः प्रजाः कश्यपसंभवाः।। (हेमाद्रि चन्द्रिका)&lt;br /&gt;
यादव जाति में भी अनेक गौत्र हैं जिनमें से प्रमुख हैं बिछवालिया गौत्र|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
*[[वैयक्तिक विधि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20171106155037/http://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A3_%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%AE_/_%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0_/_%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6_%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80 गोत्र प्रवर और साधारण होम / महर्षि वंश विस्तार] (सहजानन्द सरस्वती)&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20170929231733/http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1058 गोत्र , जाति, वंश और उपजाति]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:विधि]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;InternetArchiveBot</name></author>
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