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	<title>गोशाला (काव्य) - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-26T15:34:35Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;EatchaBot: बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है</title>
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		<updated>2020-03-03T04:37:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[आचार्य धर्मेन्द्र]] महाराज ने १९५९ में डॉक्टर [[हरिवंश राय बच्चन]] की [[&amp;quot;मधुशाला&amp;quot;]] के जवाब में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;quot;गोशाला&amp;quot;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; नामक काव्य लिखा. &lt;br /&gt;
== रचना काल == आचार्य श्री ने इसका प्रथम पथ अपने विवाह के उपलक्ष्य में, &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;जहानाबाद (बिहार)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; स्थित उनके सव्सुराल्या के उधन में &lt;br /&gt;
आयोजित काव्यगोष्ठी में २० फ़रवरी १९६० की संध्या में किया था। श्रोताओ में उनकी नववधू परम श्रेध्य श्रीमती प्रतिभा देवी जी भी सम्मलित थी। &lt;br /&gt;
सन २००८ की २३ जनवरी को&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के उपलक्ष्य में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;संस्कृत संस्था &amp;#039;परचन&amp;#039; ने आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज &lt;br /&gt;
की &amp;quot;गोशाला&amp;quot;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; को स्वयं उनके कंठ से सुनने का दुर्लभ अवसर प्रदान किया। प्रथम संस्करण सों १९६० में प्रकाशित हुआ था। पेश है गोशाला के कुछ अवतरण : &lt;br /&gt;
[[राम]] कृष्ण के इतिहासों का सार तत्त्व है गोशाला,&lt;br /&gt;
स्मृतियों, वेदो, उपनिषदों में एक तत्त्व है गोशाला।। &lt;br /&gt;
धर्म स्वयं गो बनकर मानो बसता है गोशाला में,&lt;br /&gt;
देश, धर्म एवं [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] में की परिभाषा है गोशाला।। &lt;br /&gt;
किंचित अधिक सुरा पी ली तो लगा बहकने मतवाला, &lt;br /&gt;
प्याले पर प्याले टी पीकर सूख गया पीने वाला।।&lt;br /&gt;
पर जी भर कर गोपय पीने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं,&lt;br /&gt;
जितना अधिक पियो उतना ही सबल बनाती गोशाला।।&lt;br /&gt;
विमुख हुए पितु-मत, बंधू सब विमुख हुए साली साला, &lt;br /&gt;
विमुख हुआ जग, रुष्ट हुए प्रभु, खफा हुए अल्लाहताला।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टूटे सब सम्बन्ध जगत से, मदिरा पीने वाले के, &lt;br /&gt;
सहज स्नेह सम्बन्ध जोड़कर सुदृढ़ बनाती गोशाला।।&lt;br /&gt;
प्रीतिभोज में चाहे कोई खूब पिला दे टी प्याला, &lt;br /&gt;
चाहे कलश खाली कर, क्यों न पिला डाले हाला।। &lt;br /&gt;
पर मिष्ठान अगर न हुए तो, सब कुछ व्यर्थ कहलायेगा,&lt;br /&gt;
सहभोजों में सरस मिठाई हमें खिलाती गोशाला।। &lt;br /&gt;
मेरे आगे, मेरे पीछे, दायें - बाएं गोशाला, &lt;br /&gt;
मेरे बाहर, मेरे भीतर जो कुछ है, बस गोशाला।। &lt;br /&gt;
मैं गायो का [[गाय]] मेरी, ऐसा हो सदभाव सदा,&lt;br /&gt;
तो सुरपुर से भी सुखकर है, मुझको मेरी गोशाला।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्म न मेरा हिन्दू-मुस्लिम एक धर्म है गोशाला,&lt;br /&gt;
कर्म और कर्त्तव्य, कार्यकर्म. दिनचर्या सब गोशाला।। &lt;br /&gt;
गोभक्त की जाति वर्ण है - गो, गोबिंद - उपासक का, &lt;br /&gt;
एक शब्द में मेरा पूरा, परिचय, केवल - गोशाला।।&lt;br /&gt;
हूण, यवन, शक, मलेछ मिट गये पीते पीते मधुहाला, &lt;br /&gt;
आत्मसात कर गयी सभी को मदिरालय की विष-जवाला।। &lt;br /&gt;
किन्तु आज तक किसके बल पर जाति हमारी जीवित है ?&lt;br /&gt;
हमको अब तक जिला रही है, बंधू, हमारी गोशाला,&lt;br /&gt;
टिड्डी दल का क्रूर असुर दल [[भारत]] पर छाया काला।।&lt;br /&gt;
हुआ दनुजता का तांडव भी हृदय हिला देने वाला,&lt;br /&gt;
गिरे वज्र मंदिरों मठों पर गोभाक्तो पर गाज गिरी।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु न झुकी पताका एवं रही सुरक्षित गोशाला,&lt;br /&gt;
देशद्रोहियों ने अपना औ किया जाति का मुह कला।। &lt;br /&gt;
सत्रह बार क्षमा कर रिपु को फंसा सिंह भोला भाला,&lt;br /&gt;
अँधा कर केहरी को मधप फुला नहीं समाता था।।&lt;br /&gt;
पर अंधी आँखों से भी, आखेट कर गयी गोशाला,&lt;br /&gt;
अग्निपरीक्षा हुई धैर्य की हुआ पलायित मतवाला।।&lt;br /&gt;
पयपायी ने किन्तु धरम्हित अपना शीश कटा डाला &lt;br /&gt;
टूट गए पर झुके नहीं जो, वे उन्नत शिर किनके थे ? &lt;br /&gt;
उनके - उनके, जिनको - जिनको, प्यारी थी वह गोशाला, &lt;br /&gt;
किनने साथ देश का छोड़ा और कर लिया मुँह काला?&lt;br /&gt;
वे जिनकी बाँहों मैं साकी औ होंठो पर थी हाला।।&lt;br /&gt;
देश - जाती के गौरव हित जो लड़-मरे, पयपापी थे, &lt;br /&gt;
पुत्रो के हृदय मैं प्रतिपल, रही मचलती गोशाला।।&lt;br /&gt;
कल ही तो [[चितौड़]] दुर्ग से पड़ा असुर को था पाला,&lt;br /&gt;
अभी कहाँ बुझ गयी है वह जौहर की जागृत ज्वाला।। &lt;br /&gt;
विफल हो गया असुरो का छल दिव्य देवियाँ अमर हुई,&lt;br /&gt;
हाथ मल रहे थे मद्यप औ दमक रही थी गोशाला।।&lt;br /&gt;
गोरी औ गजनवी लुटेरा अल्लाह्धीन विषधर काला, &lt;br /&gt;
बख्तियार औरंगजेब रिपु - दारुण दुःख देने वाला।। &lt;br /&gt;
हरे ! मुरारे ! गोशाला पर कितने संकट आये हैं, &lt;br /&gt;
सह - सह कर सबको सहस से, खडी रही है गोशाला।। &lt;br /&gt;
दाहर, पृथ्वीराज, सरिदर्ष नर बप्पारावल से आला, &lt;br /&gt;
राणा साँगा औ प्रताप से प्रकटे शुर लिए भाला।।&lt;br /&gt;
छत्रसाल, गोबिंद, शिव से, वैरागी सम वीरों से,&lt;br /&gt;
तिलक, सुभाष प्रभिर्ती पुत्रों से रही रक्षिता गोशाला।। &lt;br /&gt;
मेरे गौरव इतिहासों के पृष्ठ - पृष्ठ पर गोशाला, &lt;br /&gt;
मेरी प्रिय भारत माता के कण - कण मैं यह गोशाला।। &lt;br /&gt;
मेरे तन रक्त मास मैं गोशाला ही छाई है,&lt;br /&gt;
मिट जाऊंगा मैं उस दिन जब, नहीं रहेगी गोशाला।। &lt;br /&gt;
हट जायेगा छंट जायेगा यह नराश्य तिमिर काला,&lt;br /&gt;
नव - प्रभात लोटेगा भू पर, फिर स्वर्णिम स्वप्नों वाला।। &lt;br /&gt;
स्वर्ग - लोक सा अनुभव होगा, फिर से अपना देश हमे, &lt;br /&gt;
ग्राम - ग्राम घर - घर में जिस दिन, खुल जाएगी गोशाला।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:काव्य]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;EatchaBot</name></author>
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