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	<title>जठरांत्ररोगविज्ञान - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-28T11:25:43Z</updated>
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		<title>imported&gt;EatchaBot: बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है</title>
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		<updated>2020-03-03T20:51:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[Image:Stomach colon rectum diagram-en.svg|thumb|आमाशय, कॉलिन, गुदा का चित्र]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;जठरांत्ररोगविज्ञान&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (Gastroenterology) [[आयुर्विज्ञान|चिकित्सा शास्त्र]] का वह विभाग है जो [[मानव का पोषण नाल|पाचन तंत्र]] तथा उससे सम्बन्धित रोगों पर केंद्रित है। इस शब्द की उत्पत्ति प्राचीन ग्रीक शब्द gastros (उदर), enteron (आँत) एवं logos (शास्त्र) से हुई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जठरांत्ररोगविज्ञान [[मानव का पोषण नाल|पोषण नाल]] (alimentary canal) से सम्बन्धित मुख से [[गुदा]]द्वार तक के सारे अंगों और उनके रोगों पर केन्द्रित है। इससे सम्बन्धित चिकित्सक जठरांत्ररोगविज्ञानी (gastroenterologists) कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
[[पाचकतंत्र]] बृहत्‌ तंत्र है, जो मुँह से लेकर गुहा तक फैला हुआ है। इसमें कितने ही भाग हैं और प्रत्येक भाग में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं। यहाँ उन सभी का वर्णन संभव नहीं है। केवल मुख्य रोगों का संक्षेप में उल्लेख नीचे किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राय: [[दाँत]] में खुड़रा (caries), [[मसूड़े|मसूड़ों]] में [[पायरिया]], नासाविवरों का शोथ (inflammation of nasal sinuses), टौंसिल शोथ (tonsillitis), ज्वर तथा रोगों की विषमयता (toxaemias), फुप्फुस की विद्रधि, आमाशय तथा आंत्रशोथ हो जाने अथवा दुर्गंधयुक्त पदार्थों (प्याज, लहसुन) के खाने से मुँह से [[दुर्गंधित श्वास]] (helitosis) आता है। वास्तविक कारण को ढूँढकर उसे दूर करना इसकी चिकित्सा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवाणु संक्रमण (bacterial infection), [[विषाणु|वाइरस]] तथा फफूँद संक्रमण, विटामिन न्यूनता, कुछ रक्तरोग तथा रासायनिक पदार्थों (अम्ल, क्षार आदि) के कारण जिह्वाशोथ तथा कपोलों के भीतर शोथ तथा व्रण (stomatitis) हो सकते हैं। जिह्वा और कपोलों की श्लेष्मिक कला पर व्रणों का बनना विशेष लक्षण है। कारणों के अनुसार चिकित्सा अभीष्ट है। [[साधारण नमक]] जल में मिलाकर, [[हाइड्रोजन पेरॉक्साइड|हाइड्रोजन परऑक्साइड]] (0.5% विलयन), या [[पोटैसियम परमैंगनेट]] विलयन से कुल्ले करवाना विशेष लाभदायक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;हृद्दाह&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (heart burn / हृदय दाह) का कारण प्राय: अपच तथा ग्रासनाल के निम्न भाग, आभाशय तथा यकृत संबंधी कुछ रोग हो सकते हैं। जी मिचलाना और वमन (nausea and vomitting) प्राय: संक्रामक रोगों तथा ज्वर में होते हैं। वमन केवल तंत्रिकातंत्र के कारण भी होते हैं और बहुत समय तक होते रहते हैं। कारण को ढूंढ़कर दूर करना आवश्यक है। शामक औषधियाँ इस दशा में लाभ करती हैं। हिचकी (hiccup) भी ऐसा ही रोग है जो अधिकतर तंत्रिकातंत्र के कारण उत्पन्न होता है। रोगों में वह विषम दशा का सूचक है। कब्ज (constipation), मलत्याग का पूर्ण न होना है। जिनको सदा कब्ज रहता है, वे आहार और व्यायाम द्वारा इस दशा को दूर कर सकते हैं। उग्र दशा में, जो प्राय: ज्वरों में हो जाती है, विरेचक औषधियों द्वारा इसको दूर किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ग्रासनली|ग्रासनाल]] (oesophagus) में अन्य रोगों की अपेक्षा [[कर्कट रोग|कैंसर]] (cancer) [[अर्बुद]] अधिक होता है। निगलने में कष्ट इसका प्रथम लक्षण है। प्राय: लक्षण तब प्रकट होते हैं जब रोग बढ़ चुकता है। शल्य क्रिया द्वारा ग्रासनाल का छेदन उन्हीं रोगियों में संभव है जिनमें अर्बुद का दूसरे अंगों में प्रसार (metstasis) न हुआ हो। गहन रेडियम चिकित्सा (deep radium therapy) ऐसी दशा में अपेक्षित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ तंत्रिकाविकारों के कारण ग्रासनाल के सिरे में आकर्ष या ऐंठन (cardiospasm) होने लगती है, जिसके मुख्य लक्षण निगलने में कठिनाई, खाए हुए आहार का वमन द्वारा अपचित दशा में बाहर निकल जाना और उदर के ऊर्ध्व भाग में पीड़ा है।&lt;br /&gt;
[[Image:Flexibles Endoskop.jpg|thumb|लचीला अंतदर्शी (endoscope)]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आमाशय में व्रणोत्पत्ति (Peptic ulcer in stomach)&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - यह बड़ा दुष्ट और कष्टसाध्य रोग है। इसके दो रूप हैं। एक उग्र व्रण (acute ulcer) और दूसरा जीर्ण व्रण (chronic ulcer) हैं। उग्र व्रण छोटे किंतु गहरे होते हैं, जा श्लैष्मिक कला से मांस स्तर में पहुँच जाते हैं। ये त्रिकोणाकर गहरे होते हैं, जिनका शिखर बाहर मांसस्तर पर और आधार श्लेष्मल कला पर होता है। जीर्ण व्रण अधिक विस्तृत होते हैं। इनमें श्लैष्मिक कला के विस्तृत भाग गलकर पृथक्‌ हो जाते हैं ऐसे व्रणों से रक्तस्त्राव भी अधिक होता है, जो वमन द्वारा बाहर आ जाता है, किंतु बहुतेरे रोगियों में रक्त नहीं आता। कुछ में वमन द्वारा न निकलकर केवल मल में आता है और केवल सूक्ष्मदर्शी द्वारा परीक्षा करने पर दिखाई देता है। ग्रहणी (duodenum) में भी ऐसे ही व्रण बन जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीड़ा इन व्रणों का मुख्य लक्षण है। भोजन के साथ इसका विशेष संबध है। आमाशय में व्रण की स्थिति के अनुसार भोजन करने के उपरांत पीड़ा तुरंत ही, या कुछ विलंब से, प्रारंभ होती है। ग्रहणी के व्रण में पीड़ा भोजन के डेढ़ दो घंटे पश्चात्‌ आरंभ होती है जब आमाशय बहुत कुछ खाली हो जाता है। फिर से कुछ भोजन करने पर वह शांत हो जाती है। उदर पर अँगुली से दबाकर पीड़ा की स्थिति से व्रण की स्थिति का अनुमान किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ऍक्स किरण|एक्स किरण]] द्वारा परीक्षा से भी रोग को पहचानने में बहुत सहायता मिलती है। जाँचआहार (test meal) परीक्षा भी आवश्यक है। अम्ल का बाहुल्य (hyperacidity) सदा पाया जाता है। यह भली भाँति प्रमाणित हो चुका है कि मानसिक उद्वेग इस दशा की उत्पत्ति के विशेष कारण होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिकित्सा कष्टसाध्य होती है। मानसिक उपचार (psychotherapy) चिकित्सा का आवश्यक अंग है। आहार का विशेष महत्व है। उदासीन क्रियावाले पदार्थों का आहार में प्रयोग होना चाहिए, जैसे दूध, क्रीम, मक्खन, अंडा। तीन आैंस आधा दूध आधा क्रीम मिलाकर, प्रात: 7 बजे से रात के 7 बजे तक, प्रत्येक घंटे घंटे पर दिया जाना चाहिए। आगे चलकर इसमें गेहूँ की सूजी, या मैदा, या पिसा हुआ चावल मिलाकर इसको गाढ़ा कर देना चाहिए। दशा के और सुधरने पर अंडा और शाक तथा मांस भी दिया जा सकता है, किंतु इनमें मसाले बहुत कम होने चाहिए। आहार स्निग्ध, एकरस और कणों से मुक्त हो। इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक हो। प्रोटीन हाइड्रोलाइसेट के कितने ही योग औषधियों के रूप में बाजार में बिकते हैं। इनको आहार में मिलाकर आहार की पोषकशक्ति बढ़ाई जा सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
औषधियों में अम्ल के निराकरण करनवले प्रत्यम्लों (antacids) का सदा प्रचुर मात्रा में प्रयोग करवाया जाता है। कैलसियम, बिस्मथ, मैग्नीशियम के कारबोनेट लवण ऐसे पदार्थ हैं। ऐल्यूमिनियम हाइड्रॉक्साइड जेल (gel) की टिकियाँ तथा मैग्निशियम ट्राइसिलिकेट का मिश्रण बनाकर, दशा के अनुसार दो दो या चार चार घंटे पर दिया जाता है। शामक ओषधियों की भी आवश्यकता होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;उपद्रव&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - रक्तस्त्राव (haemorrhage) और छिद्रण (perforation) विशेष उपद्रव हैं, जिनकी तुरंत चिकित्सा अवश्यक है। आमाशय व्रण पर कैंसर की उत्पत्ति का बहुत भय रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कैंसर या कर्कटार्बुद&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - 40 वर्ष के अधिक आयुवालों में यदि अपच के लक्षण हों, जो साधारण चिकित्सा से न ठीक होते हों, तो कैंसर का संदेह करना चाहिए, जब तक परीक्षाओं से कैंसर न होने के संतोषजनक प्रमाण न मिल जाएँ। कैंसर घातक अबुंद है और एक्स किरण, रासायनिक तथा अन्य प्रकार की परीक्षाओं द्वारा प्रारंभ ही में इसका निदान कर लेने से रोगी की रक्षा संभव है। इसके लक्षण, पीड़ा तथा वमन में रक्त आदि, जब तक प्रकट होते हैं तब तक रोग अन्य अंगों में फैल चुकता और असाध्य हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आमाशय शोथ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (gastritis) के लक्षण बहुत कुछ [[व्रण]] के समान होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== आंत्र के रोग ==&lt;br /&gt;
क्षुद्रांत्र तथा बृहदांत्र दोनों के शोथ (enteritis तथा colitis) से अतिसार (diarrhoea) के लक्षण होते हैं। जीवाणु संक्रमण से प्रवाहिका (dysentery) हो सकती है, जिसमें रक्त और श्लेष्मा भी आते हैं। बृहदांत्र का व्रणयुक्त शोथ (ulcerative colitis) प्राय: जीर्ण रूप ले लेता है और उसकी पुनरावृत्ति (relapse) होती रहती है। कब्ज भी हो सकता है। प्राय: प्रवाहिका के लक्षण दस्तों में रक्त और श्लेष्मा होते हैं। ज्वर, अरुचि, शरीर भार का ्ह्रास, दुर्बलता तथा रक्ताल्पता (anaemia) भी होते हैं। रोग कष्टसाध्य होता है। प्रवाहिका (पेचिश) का अन्यत्र वर्णन किया गया है। आहारजन्य विषाक्तता (food poisonnig) आहार पदार्थों को बनाने, डिब्बों में बंद करने, उनको कुछ काल तक रखने या वितरण करने में किसी त्रुटि से उत्पन्न हुए विषों के कारण उग्र विषाक्तता की दशा है। भोजन करने के कुछ समय पश्चात्‌ यदि खानेवाले व्यक्तियों को अकस्मात्‌ वमन, दस्त आना, ऐंठन, आदि आरंभ हो जाए तो आहार विषाक्तता समझनी चाहिए। तुरंत उपयुक्त चिकित्सा अपेक्षित है। अर्श (haemorrhoids) बहुत सामान्य रोग है, जिससे अनेक व्यक्ति ग्रस्त होते हैं। इस रोग का विशेष लक्षण मल के साथ रक्त आना है। अर्श दो प्रकार के होते हैं। एक में रक्त आता है, दूसरे में मलाशय के अंत पर शिराओं के अंतिम भाग फूलकर गाँठों के समान बन जाते हैं। इनसे रक्तस्त्राव नहीं होता। शल्यकर्म द्वारा इनका उच्छेदन (excision) उचित चिकित्सा है। बृहदांत्र तथा मलाशय दोनों में कैंसर उत्पन्न हो सकता है, जिसका पूर्ण अन्वेषण करके निदान करना आवश्यक है। कभी कभी तब तक कोई लक्षण स्पष्ट नहीं होता जब तक अर्बुद बढ़कर प्रतीत नहीं होने लगता। साधारणतया कोष्ठबद्धता और उसके पश्चात्‌ अतिसार के आक्रमण होते रहते हैं। मल में रक्त आने पर 40 वर्ष तक की आयुवालों में (कभी कभी इससे भी पहिले) कैंसर का संदेह होना आवश्यक है। प्रारंभ ही में रोग को पहचानने पर शस्त्रकर्म और गहन एक्सकिरण चिकित्सा से रोगमुक्ति की आशा की जा सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बद्धांत्र]] (intestinal obstruction) तथा [[हर्निया]] (hernia) और [[उंड्डकार्ति]] (appendicitis) पाचकनाल के विशेष रोग हैं। यकृत और पित्ताशय के रोग भी इसी तंत्र में गिने जाते हैं। इनका वर्णन अन्यत्र किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भगन्‍दर|भगंदर]] (fistula in anus) एक अत्यंत साधारण रोग है, जिससे बहुतेरे व्यक्ति ग्रस्त होते हैं। इसको साधारणतया नासूर कहा जाता है। यह गुदा के बाहर, चारों ओर किसी भी स्थान पर, विद्रधि (absess) बनने से हो जाता है। विद्रधि की पूय (pus) अपना मार्ग बनाकर गुदाद्वार (anus) के चारों ओर कहीं भी त्वचा में छेद करके निकलने लगती है। यह बाह्य भगंदर (external fistula) कहलाता है। गुदा के ही विद्रधि के फूट जाने से अंत: भंगदर (internal fistula) बनता है। उपयुक्त चिकित्सा न होने से इसके कई मुँह बन जाते हैं। शस्त्रचिकित्सा ही इस रोग का एकमात्र उपाय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[गुदभ्रंश]] (Prolapse of rectum) को काँच निकलना कहा जाता है। मलत्याग के लिए बैठने पर गुदा और तब आमाशय की सारी नलिका तक गुदाद्वार के बाहर आ जाती हैं। यह रोग बच्चों में अधिक होता है एवं पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ इससे अधिक आक्रांत होती हैं। कोष्ठबद्धता (constipation), अर्श, अतिसार, कृमि, कुकुरखाँसी, दमा, बहुप्रसव आदि दशाओं से, जिनमें उदर के भीतर दाब बढ़ जाता है, इस रोग की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उग्र दशा (acute) में रोग से बहुत पीड़ा होती है। संचरणी (sphincter) के संकोच के कारण बाहर निकला हुआ भाग भीतर नहीं जाता और फँसे हुए अंत्र (हर्निया) की सी दशा हो जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोग की उग्र दशा में शामक चिकित्सा की जाती है। रोग से स्थायी मुक्ति शस्त्रक्रिया द्वारा ही होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[यकृत और पित्ताशय के रोग]]&lt;br /&gt;
* [[एंडोस्कोपी (गुहांतदर्शन)|एन्डोस्कोपी]] या [[एंडोस्कोपी (गुहांतदर्शन)|गुहान्त दर्शन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{चिकित्सा}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:चिकित्सा पद्धति]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:ग्यास्त्रोएन्टेरोलोजी]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:जठरांत्र विज्ञान|*]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;EatchaBot</name></author>
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