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	<title>जमदग्नि ऋषि - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;रोहित साव27: 112.79.139.121 (Talk) के संपादनों को हटाकर InternetArchiveBot के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/112.79.139.121&quot; title=&quot;विशेष:योगदान/112.79.139.121&quot;&gt;112.79.139.121&lt;/a&gt; (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:112.79.139.121&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य वार्ता:112.79.139.121 (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;Talk&lt;/a&gt;) के संपादनों को हटाकर &lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:InternetArchiveBot&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य:InternetArchiveBot (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;InternetArchiveBot&lt;/a&gt; के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Jamadagni telling Parasuram about kartyaveerarjun.jpg|अंगूठाकार|जमदग्नि ऋषि]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;जमदग्नि ऋषि&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; एक [[ऋषि]] थे, जो [[भृगु संहिता|भृगुवंशी]] [[ऋचीक]] के पुत्र थे तथा जिनकी गणना [[सप्तर्षि|सप्तऋषियों]] में होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://pustak.org:4300/bs/home.php?mean=31803 पुस्तक.ऑर्ग]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} पर शब्दकोश में&amp;lt;/ref&amp;gt; पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी [[रेणुका]] थीं, व इनका आश्रम [[सरस्वती नदी]] के तट पर था। [[वैशाख]] शुक्ल [[तृतीया]] इनके पांचवें प्रसिद्ध पुत्र प्रदोषकाल में जन्मे थे जिन्हें [[परशुराम]] के नाम से जाना जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== आश्रम ==&lt;br /&gt;
[[हरियाणा]] में [[कैथल]] से उत्तरपूर्व की ओर २८ किलोमीटर की दूरी पर जाजनापुर गाँव स्थित है। यहां महर्षि जमदग्नि का आश्रम था। अब यहां एक सरोवर अवशेष रूप में हैं। यहां प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की दसवीं को मेला लगता है। महर्षि जमदग्नि की परम्परा में बाबा साधु राम ने जहां तपस्या की है और अपने शरीर का त्याग किया है। उस स्थान को बाबा साधु राम की समाधि के रूप में पूजा जाता है। इस सरोवर की आज भी विशेष बात यह मानी जाती है कि इसमें पानी भरने के बाद फूंकार-हंकार की आवाज आती है। पूर्ण लबालब भरा सरोवर भी पन्द्रह दिनों में सुख जाता है। सांपों की इस जगह अधिकता माना जाती है। लेकिन आज तक कोई नुकसान नहीं हुआ।&amp;lt;ref name=&amp;quot;जाजनपुर&amp;quot;&amp;gt;[http://amansandesh.blogspot.com/2009/06/blog-post_25.html जमदग्नि स्थल -जाजनपुर] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160305120430/http://amansandesh.blogspot.com/2009/06/blog-post_25.html |date=5 मार्च 2016 }}। अमन संदेश। २५ जून २००९&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनश्रुति के अनुसार महर्षि जमदग्नि ऋचीक के पुत्र और भगवान परशुराम के पिता थे। इनके आश्रम में इच्छित फलों को प्रदान करनी वाली गाय थी जिसे कार्तवीर्य छीनकर अपनी राजधानी माहिष्मति ले गया। परशुराम को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने कार्तवीर्य को मार दिया ओर कामधेनु वापिस आश्रम में ले आए और एक दिन अवसर पाकर कीर्तवीर्य के पुत्रों को भी मार डाला और समस्त पृथ्वी पर घूम-घूमकर इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया तब उन्होंने अपने पिता के मस्तक को धड़ से जोडा और उनका अन्त्येष्टि संस्कार [[माहूर]], जिला- [[नांदेड़|नांदेड]] [[महाराष्ट्र]] मे सम्पन्न किया। यहां माता रेणुका का प्राचीन मंदिर स्थापित है और प्रमुख [[शक्ति पीठ|शक्तिपीठों]] में से एक माना जाता है। कुरूक्षेत्र भूमि में पांच कुण्ड बनाकर पितरों का तर्पण किया। ये पांचों सरोवर समन्त पंचक-तीर्थ के नाम से विख्यात हुए। जिसे ब्रह्मा जी उतर वेदी कहते हैं वह यही समन्त पंचम तीर्थ है। वामन पुराण में लिखा है कि समन्त पंचक नाम धर्मस्थल चारों ओर पांच-पांच योजन तक फैला हुआ है। सम्भवतः परशुराम द्वारा स्थापित पांचकुण्डों में से एक कुण्ड जाजनपुर का यही स्थल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरूणाचल प्रदेश में लोहित नदी के तट पर ही परशुराम कुण्ड स्थित है। पौराणिक मान्यता अनुसार परशुराम अपनी माता रेणुका की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए यहां आए थे। इस कुण्ड में स्नान के बाद वे मां की हत्या के पाप से मुक्त हुए थे। इस संदर्भ में पौराणिक आख्यान है कि किसी कारण वश परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि अपनी धर्मपत्नी रेणुका पर कुपित हो गए। उन्होंने तत्काल अपने पुत्रों को रेणुका का वध करने का आदेश दे दिया। लेकिन उनके आदेश का पालन करने के लिए कोई पुत्र तैयार नहीं हुआ। परशुराम पितृभक्त थे, जब पिता ने उनसे कहा तो उन्होंने अपने फरसे से मां का सर धड़ से अलग कर दिया। इस आज्ञाकारिता से प्रसन्न पिता ने जब वर मांगने को कहा तो परशुराम ने माता को जीवित करने का निवेदन किया। इस पर जमदग्नि ऋषि ने अपने तपोबल से रेणुका को पुन: जीवित कर दिया।&amp;lt;ref name=&amp;quot;वाटर&amp;quot;&amp;gt;[http://hindi.indiawaterportal.org/share/3134 परशुराम कुण्ड पर कुण्डली]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}। इंडिया वॉटर पोर्टल। राकेश उपाध्याय&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेणुका तो जीवित हो गईं लेकिन परशुराम मां की हत्या के प्रयास के कारण आत्मग्लानि से भर उठे। यद्यपि मां जीवित हो उठीं थीं लेकिन मां पर परशु प्रहार करने के अपराधबोध से वे इतने ग्रस्त हो गए कि उन्होंने पिता से अपने पाप के प्रायश्चित का उपाय भी पूछा। पौराणिक प्रसंगों के अनुसार ऋषि जमदग्नि ने तब अपने पुत्र परशुराम को जिन जिन स्थानों पर जाकर पापविमोचन तप करने का निर्देश दिया उन स्थानों में परशुराम कुण्ड सर्वप्रमुख है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
{{ऋषि}}&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:सप्तर्षि]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:ऋषि मुनि]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;रोहित साव27</name></author>
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