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	<title>जय-विजय - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;संजीव कुमार: 103.206.51.168 (Talk) के संपादनों को हटाकर ಮಲ್ನಾಡಾಚ್ ಕೊಂಕ್ಣೊ के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया</title>
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		<updated>2021-08-25T19:13:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/103.206.51.168&quot; title=&quot;विशेष:योगदान/103.206.51.168&quot;&gt;103.206.51.168&lt;/a&gt; (&lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:103.206.51.168&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य वार्ता:103.206.51.168 (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;Talk&lt;/a&gt;) के संपादनों को हटाकर &lt;a href=&quot;/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%B2%AE%E0%B2%B2%E0%B3%8D%E0%B2%A8%E0%B2%BE%E0%B2%A1%E0%B2%BE%E0%B2%9A%E0%B3%8D_%E0%B2%95%E0%B3%8A%E0%B2%82%E0%B2%95%E0%B3%8D%E0%B2%A3%E0%B3%8A&amp;amp;action=edit&amp;amp;redlink=1&quot; class=&quot;new&quot; title=&quot;सदस्य:ಮಲ್ನಾಡಾಚ್ ಕೊಂಕ್ಣೊ (पृष्ठ मौजूद नहीं है)&quot;&gt;ಮಲ್ನಾಡಾಚ್ ಕೊಂಕ್ಣೊ&lt;/a&gt; के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{धर्म प्राथमिक|date=दिसम्बर 2014}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sculpture of Jaya, guardian to the entrance of the sanctum of Vishnu in Chennakeshava temple at Belur.jpg|right|thumb|200px|[[बेलूर]] के चेन्नकेशव मन्दिर में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;जय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; की मूर्ति]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;जय और विजय&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; दोनों भगवान [[विष्णु]] के द्वारपाल हैं। इनकी मूर्खता के कारण इनको [[शाप]] मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कथा ==&lt;br /&gt;
एक बार [[सनक]], [[सनन्दन]], [[सनातन]] और [[सनत्कुमार]] (ये चारों [[सनकादिक]] ऋषि कहलाते हैं और देवताओं के पूर्वज माने जाते हैं) सम्पूर्ण लोकों से विरक्त होकर चित्त की शान्ति के लिये भगवान [[विष्णु]] के दर्शन करने हेतु उनके [[बैकुण्ठ]] लोक में गये। बैकुण्ठ के द्वार पर जय और विजय नाम के दो द्वारपाल पहरा दिया करते थे। जय और विजय ने इन सनकादिक ऋषियों को द्वार पर ही रोक लिया और बैकुण्ठ लोक के भीतर जाने से मना करने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनके इस प्रकार मना करने पर सनकादिक ऋषियों ने कहा, &amp;quot;अरे मूर्खों! हम तो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। हमारी गति कहीं भी नहीं रुकती है। हम देवाधिदेव के दर्शन करना चाहते हैं। तुम हमें उनके दर्शनों से क्यों रोकते हो? तुम लोग तो भगवान की सेवा में रहते हो, तुम्हें तो उन्हीं के समान समदर्शी होना चाहिये। भगवान का स्वभाव परम शान्तिमय है, तुम्हारा स्वभाव भी वैसा ही होना चाहिये। हमें भगवान विष्णु के दर्शन के लिये जाने दो।&amp;quot; ऋषियों के इस प्रकार कहने पर भी जय और विजय उन्हें बैकुण्ठ के अन्दर जाने से रोकने लगे। जय और विजय के इस प्रकार रोकने पर सनकादिक ऋषियों ने क्रुद्ध होकर कहा, &amp;quot;भगवान विष्णु के समीप रहने के बाद भी तुम लोगों में अहंकार आ गया है और अहंकारी का वास बैकुण्ठ में नहीं हो सकता। इसलिये हम तुम्हें शाप देते हैं कि तुम लोग पापयोनि में जाओ और अपने पाप का फल भुगतो।&amp;quot; उनके इस प्रकार शाप देने पर जय और विजय भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह जान कर कि सनकादिक ऋषिगण भेंट करने आये हैं भगवान विष्णु स्वयं लक्ष्मी जी एवं अपने समस्त पार्षदों के साथ उनके स्वागत के लिय पधारे। भगवान विष्णु ने उनसे कहा, &amp;quot;हे मुनीश्वरों! ये जय और विजय नाम के मेरे पार्षद हैं। इन दोनों ने अहंकार बुद्धि को धारण कर आपका अपमान करके अपराध किया है। आप लोग मेरे प्रिय भक्त हैं और इन्होंने आपकी अवज्ञा करके मेरी भी अवज्ञा की है। इनको शाप देकर आपने उत्तम कार्य किया है। इन अनुचरों ने तपस्वियों का तिरस्कार किया है और उसे मैं अपना ही तिरस्कार मानता हूँ। मैं इन पार्षदों की ओर से क्षमा याचना करता हूँ। सेवकों का अपराध होने पर भी संसार स्वामी का ही अपराध मानता है। अतः मैं आप लोगों की प्रसन्नता की भिक्षा चाहता हूँ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान के इन मधुर वचनों से सनकादिक ऋषियों का क्रोध तत्काल शान्त हो गया। भगवान की इस उदारता से वे अति अनन्दित हुये और बोले, &amp;quot;आप धर्म की मर्यादा रखने के लिये ही अपने इतना आदर देते हैं। हे नाथ! हमने इन निरपराध पार्षदों को क्रोध के वश में होकर शाप दे दिया है इसके लिये हम क्षमा चाहते हैं। आप उचित समझें तो इन द्वारपालों को क्षमा करके हमारे शाप से मुक्त कर सकते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान विष्णु ने कहा, &amp;quot;हे मुनिगण! मै सर्वशक्तिमान होने के बाद भी ब्राह्मणों के वचन को असत्य नहीं करना चाहता क्योंकि इससे धर्म का उल्लंघन होता है। आपने जो शाप दिया है वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। ये अवश्य ही इस दण्ड के भागी हैं। ये दिति के गर्भ में जाकर दैत्य योनि को प्राप्त करेंगे और मेरे द्वारा इनका संहार होगा। ये मुझसे शत्रुभाव रखते हुये भी मेरे ही ध्यान में लीन रहेंगे। मेरे द्वारा इनका संहार होने के बाद ये पुनः इस धाम में वापस आ जावेंगे।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://theglobalviews.com/%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%AA-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82/ |title=जय विजय को श्राप |access-date=31 मई 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140531124313/http://theglobalviews.com/%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%AA-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82/ |archive-date=31 मई 2014 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== स्रोत ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:श्रीमद्भागवत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धर्म ग्रंथ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पौराणिक कथाएँ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;संजीव कुमार</name></author>
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