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	<title>जाम्बवंती - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;InternetArchiveBot: Rescuing 5 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.1</title>
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		<updated>2020-06-14T21:39:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Rescuing 5 sources and tagging 1 as dead.) #IABot (v2.0.1&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;जाम्बवंती&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; रीछराज जामवन्त की पुत्री थी। एक बार जरासन्ध के भय से श्रीकृष्ण समुद्र के मध्य नगरी बसाकर रहने लगे। इसी नगरी का नाम आजकल द्वारिकापुरी है। द्वारिकापुरी में निवास करने वाले सत्राजित यादव ने सूर्यनारायण की आराधना की। तब भगवान सूर्य ने उसे नित्य आठ भार सोना देने वाली स्यमन्तक नामक मणि अपने गले से उतारकर दे दी। मणि पाकर सत्राजित यादव जब समाज में गया तो श्रीकृष्ण ने उस मणि को प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। सत्राजित ने वह मणि श्रीकृष्ण को न देकर अपने भाई प्रसेनजित को दे दी। एक दिन प्रसेनजित घोड़े पर चढ़कर शिकार के लिए गया। वहाँ एक शेर ने उसे मार डाला और मणि ले ली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रीछों का राजा जामवन्त उस सिंह को मारकर मणि लेकर गुफा में चला गया। जब प्रसेनजित कई दिनों तक शिकार से न लौटा तो सत्राजित को बड़ा दुःख हुआ। उसने सोचा, श्रीकृष्ण ने ही मणि प्राप्त करने के लिए उसका वध कर दिया होगा। अतः बिना किसी प्रकार की जानकारी जुटाए उसने प्रचार कर दिया कि श्रीकृष्ण ने प्रसेनजित को मारकर स्यमन्तक मणि छीन ली है। इस लोक-निन्दा के निवारण के लिए श्रीकृष्ण बहुत से लोगों के साथ प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहाँ पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मार डालना और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए। रीछ के पैरों की खोज करते-करते वे जामवन्त की गुफा पर पहुँचे और गुफा के भीतर चले गए। वहाँ उन्होंने देखा कि जामवन्त की पुत्री उस मणि से खेल रही है। श्रीकृष्ण को देखते ही जामवन्त युद्ध के लिए तैयार हो गया।&lt;br /&gt;
युद्ध छिड़ गया। गुफा के बाहर श्रीकृष्ण के साथियों ने उनकी सात दिन तक प्रतीक्षा की। फिर वे लोग उन्हें मर गया जानकर पश्चाताप करते हुए द्वारिकापुरी लौट गए। इधर इक्कीस दिन तक लगातार युद्ध करने पर भी जामवन्त श्रीकृष्ण को पराजित न कर सका। तब उसने सोचा, कहीं यह वह अवतार तो नहीं जिसके लिए मुझे रामचंद्रजी का वरदान मिला था। यह पुष्टि होने पर उसने अपनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। श्रीकृष्ण जब मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित अपने किए पर बहुत लज्जित हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने भी अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कडियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20100515172142/http://www.vedpuran.com/ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;वेद-पुराण&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] - यहाँ चारों वेद एवं दस से अधिक पुराण हिन्दी अर्थ सहित उपलब्ध हैं। पुराणों को यहाँ सुना भी जा सकता है।&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20080408110939/http://is1.mum.edu/vedicreserve/puran.htm महर्षि प्रबंधन विश्वविद्यालय]-यहाँ सम्पूर्ण वैदिक साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है। &lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20100928022018/http://tdil.mit.gov.in/vedicjan04/hdefault.html ज्ञानामृतम्] - वेद, अरण्यक, उपनिषद् आदि पर सम्यक जानकारी&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20100106153131/http://www.aryasamajjamnagar.org/vedang.htm वेद एवं वेदांग] - आर्य समाज, जामनगर के जालघर पर सभी वेद एवं उनके भाष्य दिये हुए हैं।&lt;br /&gt;
* [http://www.samaydarpan.com/july/pehal5.aspx जिनका उदेश्य है - &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;वेद प्रचार&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} &lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20100521212751/http://veda-vidya.com/puran.php वेद-विद्या_डॉट_कॉम]&lt;br /&gt;
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