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	<title>टिल्ला जोगियाँ - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>imported&gt;InternetArchiveBot: Rescuing 4 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1</title>
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		<updated>2020-06-14T22:40:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Rescuing 4 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Hindu Temple at Tilla Gogian.jpg|thumb|240px|[[नमक कोह]] के दुसरे सबसे ऊँचे पहाड़, टिल्ला जोगियाँ (यानि &amp;#039;योगियों का टीला&amp;#039;), पर [[हिन्दू]] मंदिर]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tilla Jogian - Main entrance of Yogis&amp;#039; Temple School.jpg|thumb|240px|योगियों की पाठशाला का मुख्य द्वार]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tilla Jogian.jpg|thumb|240px|दूर से टिल्ला जोगियाँ का नज़ारा]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tilla Jogain 3.jpg|thumb|240px|ढलान वाले रस्ते के साथ लगे दो बुर्ज]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tilla Jogain 5.jpg|thumb|240px|टिल्ला जोगियाँ परिसर से दिखने वाला एक दृश्य]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;टिल्ला जोगियाँ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (&amp;lt;small&amp;gt;{{Nastaliq|ur|ٹِلّہ جوگیاں}}, ਟਿੱਲਾ ਜੋਗੀਆਂ, Tilla Jogian&amp;lt;/small&amp;gt;) [[पाकिस्तान]] के [[पंजाब (पाकिस्तान)|पंजाब]] प्रान्त के मध्य भाग में स्थित [[नमक कोह]] पर्वतमाला के पूर्वी भाग में एक ९७५ मीटर (३,२०० फ़ुट) ऊँचा पहाड़ है। यह नमक कोह शृंखला का सबसे ऊँचा पहाड़ भी है। प्रशासनिक रूप से टिल्ला जोगियाँ [[झेलम ज़िला|झेलम ज़िले]] में स्थित है और उस ज़िले का सबसे ऊँचा स्थान है। क्योंकि यह आसपास के सभी इलाक़ों से ऊँचा है इसलिए यहाँ से दूर-दूर तक देखा जा सकता है। नीचे से भी इसे चार ज़िलों - झेलम, चकवाल, गुजरात और मंडी बहाउद्दीन - के लोग देख सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== हिन्दू तीर्थ स्थल ==&lt;br /&gt;
[[पंजाबी भाषा]] में टिल्ला जोगियाँ का अर्थ &amp;#039;योगियों का टीला&amp;#039; है और यह पहाड़ हजारों सालों से एक हिन्दू तीर्थ स्थल रहा है। माना जाता है कि यहाँ पर सन् १०० ईसापूर्व के आसपास एक हिन्दू मठ बनाया गया था। यहाँ गुरु [[गोरखनाथ]] के अनुयायी रहा करते थे जिन्हें अपने कान छिदवा लेने के कारण &amp;#039;कानफटे जोगी&amp;#039; कहा जाता था।&amp;lt;ref name=&amp;quot;ref40yileb&amp;quot;&amp;gt;[http://books.google.com/books?id=DXPa3jZDQZUC Gorakhnāth and the Kānphaṭa Yogīs] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20180507204037/https://books.google.com/books?id=DXPa3jZDQZUC |date=7 मई 2018 }}, George Weston Briggs, Motilal Banarsidass Publishers, 1938, ISBN 978-81-208-0564-4, &amp;#039;&amp;#039;... The Kanphatas possess many monasteries ... but that at Tilla, in the Panjab, is generally considered to be the chief seat of the Gorkhnathis ...&amp;#039;&amp;#039;&amp;lt;/ref&amp;gt; इसकी ऊँचाई के कारण श्रद्धालु इस पर चढ़ा करते थे और योगी अक्सर यहाँ अपना डेरा लगते थे क्योंकि यहाँ सुबह के वक़्त [[सूर्य|सूरज]] की किरणें सबसे पहले पड़ती हैं। इसके महत्व के कारण [[अकबर|सम्राट अकबर]] भी एक दफ़ा इसका दौरा करने आए थे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;ref94gigeq&amp;quot;&amp;gt;[http://books.google.com/books?id=GQTABKAGaVgC Culture and customs of Pakistan] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140704183412/http://books.google.com/books?id=GQTABKAGaVgC |date=4 जुलाई 2014 }}, Iftikhar Haider Malik, Greenwood Publishing Group, 2006, ISBN 978-0-313-33126-8, &amp;#039;&amp;#039;... The temple and adjacent complex at Tilla Jogian ... was a bustling religious center ... Tilla Jogian, like Pir Kattas, was a Brahminical seminary with extensive residences around, and had been visited by Emperor Akbar ...&amp;#039;&amp;#039;&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ आज भी मंदिरों का एक जमघट्टा है जिसमें कम-से-कम तीन स्नानघर और दो छोटे बांधों के साथ-साथ और भी जल-वितरण का बंदोबस्त है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही टीला गुरु गोरक्षनाथ मंदिर को भारत में योगियों का परम पावन तीर्थस्थल माना जाता है जिस कारण इस टीला गुरु गोरक्षनाथ मंदिर का पौराणिक महत्व भी है। टीला गुरु गोरक्षनाथ हिमाचल पर्वत की ही शाखा समझा जाता है तथा यह भी मान्यता है कि [[शिव]]&amp;lt;nowiki/&amp;gt;-[[पार्वती]] कई बार भ्रमण करते-करते इस टीले पर जाकर विश्राम करते थे। इस टीले को बाल गुदाई और लक्ष्मण का टीला भी कहा जाता है जो अब पाकिस्तान में है। जनश्रुति के अनुसार पूर्व कल्प में जब सती का दूसरे जन्म में भगवान शिव से विवाह हुआ था तो शिव की बारात इसी गुरु गोरक्षनाथ टीले से चली थी तथा त्रेतायुग में राम अवतार के बाद अपने अंतिम चरण में लक्ष्मण योगी बनकर टीले में आए और उन्होंने गोरक्षनाथ का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया था। अनेक श्रद्धालु आस्थावश इस टीले को टिल्ला भी कहते हैं। नाथ संप्रदाय में धूने का बहुत अधिक महत्व है जिस कारण हर योगी के मठ या आश्रम में धूने का स्थान जरूर बना रहता है जिसे नाथजी का धूना कहा जाता है। श्रद्धालुओं को इसी धूने की भभूति प्रसाद के रूप में दी जाती है। टीले के भवन में भी गोरक्षनाथ का धूना स्थित था। श्रद्धालुओं की धारणा है कि सर्वप्रथम गोरक्षनाथ ने टीले के स्थान पर ही धूना जलाया था और तभी से वह धूना उसी स्थान पर स्थित है। जब गोरक्षनाथ टीले का स्थान छोड़कर जाने लगे तो योगियों ने गोरक्षनाथ से प्रार्थना की कि आपके जाने के बाद इस स्थान का महत्व कैसे प्रतीत होगा। तबगोरक्षनाथ ने जलते धूने में से एक लकड़ी निकाली और उस स्थान पर एक किल्ला गाड़ दिया। बाद में उस लकड़ी ने एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया जिसकी दो बड़ी टहनियां एक सूखी और दूसरी हरी बन गई। इस विषय में कहावत है :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
::&amp;#039;&amp;#039;जब तक किल्ला, तब तक टीला, आधा सूखा, आधा गीला।&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस टीले के बारे में गोरखनाथ ख़ुद कह गए थे कि जब तक यह किल्ला इस स्थान पर स्थापित रहेगा, तक तक इस टीले का मठ सुरक्षित रहेगा। जब इस किल्ले की हरी टहनी भी सूख जाएगी तो यह स्थान भी परिवर्तित हो जाएगा। [[भारत का विभाजन|भारत के विभाजन]] तक वह वृक्ष अपने स्थान पर यथावत स्थित था तथा [[हिन्दू]] और [[मुसलमान]] सभी टीले के प्रति तथा योगियों में गहरी आस्था रखते थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टीले की गद्दी पर वर्ष १९२० में पीर कलानाथ जी आसीन हुए थे और उन्हीं के समय में वर्ष १९४७ में भारत व पाकिस्तान का विभाजन हुआ। भारत आने के बाद [[अम्बाला]] शहर की सब्ज़ी मंडी के निकट वर्ष १९५१ में गुरु गोरक्षनाथ में आस्था का विस्तार करते हुए एक भवन ख़रीदा गया जिसे टीले की दरगाह अथवा गद्दी का स्थान माना जाता है। अंबाला के ऐतिहासिक व पौराणिक टीला गुरु गोरक्षनाथ मंदिर में शिवरात्रि और गुरु पूर्णिमा पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीर कलानाथ जी के बाद पीर समुंद्रनाथ जी वर्ष १९५२ से लेकर १९६६ तक गद्दीनशीन रहे। उनके बाद पीर श्रद्धानाथ जी १९९१ तक गद्दीनशीन रहे। सन् १९९१ में पीर श्रद्धानाथ जी ब्रह्मलीन हो गए तथा उनकी समाधि वहीं पर बना दी गई। माना जाता है कि इस समाधि पर जो भी भक्त सच्ची आस्था से आकर मन्नत मांगता है, उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। लोक मान्यता है कि यहाँ संतानहीन महिलाएँ आती हैं जो अपनी ख़ाली झोली भरके जाती हैं। इस समय पीर पारसनाथ जी टीला गुरु गोरक्षनाथ में गद्दीनशीन हैं और टीले की परंपराओं को जारी रख रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== हीर-राँझा की कहानी से सम्बन्ध ==&lt;br /&gt;
वारिस शाह ने अपनी प्रसिद्ध [[पंजाबी समुदाय|पंजाबी]] प्रेम-गाथा &amp;#039;किस्सा [[हीर राँझा|हीर-रांझा]]&amp;#039; में बताया है कि बीच में हीर से अलग होने से तिलमिलाया हुआ रांझा शान्ति पाने के लिए इस हिन्दू मठ की शरण में आ गया था और उसने गोरखनाथ के अन्य भक्तों की तरह अपने कान भी छिदवा लिए थे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;ref06qocax&amp;quot;&amp;gt;[http://books.google.com/books?id=EUPc5pDWKikC The social space of language: vernacular culture in British colonial Punjab], Farina Mir, University of California Press, 2010, ISBN 978-0-520-26269-0, &amp;#039;&amp;#039;... A fourth locale, Tilla Jogian, is the location of Gorakhnath&amp;#039;s dera (monastery) and the site of Ranjha&amp;#039;s transformation into a yogi ...&amp;#039;&amp;#039;&amp;lt;/ref&amp;gt; रांझे के सबसे पहले टिल्ला जोगियाँ पर चढ़कर गोरखनाथ जी का चेला बनने के प्रयास का वर्णन ऐसे किया:&amp;lt;ref name=&amp;quot;ref70rofuy&amp;quot;&amp;gt;[http://books.google.com/books?id=XaEIAAAAQAAJ The legends of the Panjab, Volume 2] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140101073200/http://books.google.com/books?id=XaEIAAAAQAAJ |date=1 जनवरी 2014 }}, Sir Richard Carnac Temple, Education Society&amp;#039;s Press, 1884, &amp;#039;&amp;#039;... Jis banjâre nûṅ ghâṭâ â gîâ, so banjârâ roveṅ, Chelâ ban chalâṅ Gorakh Nâth dâ, Chaudhar Takht Hazâre dî khoveṅ ...&amp;#039;&amp;#039;&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! मूल पंजाबी&lt;br /&gt;
! हिन्दी अर्थ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
:सुबह सार फ़जर दा वेला रांझे टिल्ले दा राह पछाइआ&lt;br /&gt;
:जूँ-जूँ टिल्ला नेड़े आउंदा दीदा दोन सवाइआ&lt;br /&gt;
:भेंकन शेर, चनीं न ओह नूँ देहदा, रांझा बोल्दा नहीं बुलाइआ&lt;br /&gt;
:औखी घाटी, बकड़ा पैंदा, रांझे सम्भालके पैर टिकाइआ&lt;br /&gt;
:अस्ता मस्ता जोगी बैठे, रांझे ने दोहाँ नूँ सीस निवाइआ&lt;br /&gt;
:पंज रूपए, ताँ पानाँ दा बेड़ा, पहिली भेंट चढ़ाइआ&lt;br /&gt;
:&amp;#039;मौजू दा पुत, मैं मत्ते दा पोता, जोग लैन नूँ चलके आइआ&lt;br /&gt;
:कन फड़के मुन्द्रां पा देओ, मैनूं चढ़ जा रूप सवाइआ&amp;#039;&lt;br /&gt;
:&amp;#039;माँपिआँ झिड़की की? तूँ रिज़क भोना, जोगिआँ दी कोली लग खड़ोवें?&lt;br /&gt;
:चौबी हज़ार सांस ही तैनूं हासिल कोई न होवें&lt;br /&gt;
:जिस बंजारे नूँ घाटा आ गिआ, सो बंजारा रोवें&lt;br /&gt;
:चेला बन चलाँ गोरख नाथ दा, चौधर तख़्त हज़ारे दी खोवें&amp;#039;&lt;br /&gt;
:टिल्ले उत्ते गोरख बैठा, गोरख बड़ा असानी।&lt;br /&gt;
:&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
:सुबह फ़जर का वक़्त (यानि बहुत सुबह) को रांझे को टिल्ले का रास्ता मिल गया&lt;br /&gt;
:जैसे-जैसे टिल्ला पास आता गया उसकी महिमा का अहसास बढ़ता गया&lt;br /&gt;
:शेर दहाड़े और उसे पहाड़ न दिखा और बुलाने पर रांझे ने जवाब तक न दिया&lt;br /&gt;
:मुश्किल घाटी और तेज़ ढलान थी और राँझा संभल के चढ़ा&lt;br /&gt;
:अस्ता और मस्ता नामक जोगी बैठे थे और रांझे ने उन्हें शीश निवाया (झुकाया)&lt;br /&gt;
:पांच रूपए और पान का बीड़ा उन्हें पहली भेंट के रूप में चढ़ाया&lt;br /&gt;
:(राँझा बोला) &amp;#039;मैं मौजू का पुत्र और मत्ते का पोता, जोग लेने के लिए चलकर आया हूँ,&lt;br /&gt;
:मेरे कान पकड़कर उनमें बालियाँ दाल दो, ताकि मेरा रूप सवा (गुना) हो जाए&amp;#039;&lt;br /&gt;
:(उन्होंने कहा) &amp;#039;क्या तेरे माता-पिता ने झिड़का है? क्या जीना कठिन है कि तू जोगियों के साथ लग खड़ा हुआ है?&lt;br /&gt;
:अपनी चौबीस हज़ार साँसों में तुझे एक भी नहीं याद&lt;br /&gt;
:अगर व्यापारी को घाटा हो, तो व्यापारी रोता है&lt;br /&gt;
:अगर तू गोरखनाथ का चेला बना तो तख़्त हज़ारे (रांझे की पुश्तैनी ज़मीनें) का चौधरी नहीं रहेगा&amp;#039;&lt;br /&gt;
:अपने टिल्ले पर (आसन लगाए) बैठा गोरख बड़ा दयालु था।&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[नमक कोह]]&lt;br /&gt;
* [[पोठोहार]]&lt;br /&gt;
* [[हीर राँझा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20150713162554/https://www.youtube.com/watch?v=n9KXghev3_c यू-ट्यूब पर टिल्ला जोगियाँ की सैर जिसमें बहुत से मंदिर दिख रहे हैं]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;small&amp;gt;{{reflist|2}}&amp;lt;/small&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पंजाब (पाकिस्तान)]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पोठोहार]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पर्वत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू तीर्थ स्थल]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू मन्दिर]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धार्मिक पर्वत स्थल]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पाकिस्तान के पर्वत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:नमक के मैदान]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पंजाब का इतिहास]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;InternetArchiveBot</name></author>
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