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	<title>त्रिलोक - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-08-24T00:33:11Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>2409:4064:238B:6A25:F032:1A79:6769:633D: हमने तीनों लोक के बारे में जो भी ज्ञान लिया था वो आपके साथ साझा किया</title>
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		<updated>2021-07-01T02:47:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हमने तीनों लोक के बारे में जो भी ज्ञान लिया था वो आपके साथ साझा किया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;त्रिलोक&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; हिन्दू मान्यता में तीन विश्व अर्थात् तीन लोक कहे जाते हैं। यह तीन लोक [[देवलोक]], [[भूलोक]] तथा [[पाताल]] लोक माने जाते हैं।&lt;br /&gt;
{{आधार}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]अनिरुद्ध जोशी &amp;#039;शतायु&amp;#039;&lt;br /&gt;
हिंदू इतिहास ग्रंथ पुराणों में त्रैलोक्य का वर्णन मिलता है। ये तीन लोक हैं- (1) कृतक त्रैलोक्य (2) महर्लोक, (3) अकृतक त्रैलोक्य।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(1) कृतक त्रैलोक्य- कृतक त्रैलोक्य जिसे त्रिभुवन भी कहते हैं। इसके बारे में पुराणों की धारणा है कि यह नश्वर है, कृष्ण इसे परिवर्तनशील मानते हैं। इसकी एक निश्‍चित आयु है। उक्त त्रैलोक्य के भी तीन भेद हैं- भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक (स्वर्ग)।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
A. भूलोक : जितनी दूर तक सूर्य, चंद्रमा आदि का प्रकाश जाता है, वह पृथ्वी लोक कहलाता है। हमारी पृथ्वी सहित और भी कई पृथ्वियां हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
B. भुवर्लोक : पृथ्वी और सूर्य के बीच के स्थान को भुवर्लोक कहते हैं। इसमें सभी ग्रह-नक्षत्रों का मंडल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
C. स्वर्लोक : सूर्य और ध्रुव के बीच जो चौदह लाख योजन का अंतर है, उसे स्वर्लोक या स्वर्गलोक कहते हैं। इसी के बीच में सप्तर्षि का मंडल है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
हम यहां बात कर रहे हैं- भूलोक में स्थित पाताल लोक की। आगे पढ़ें....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
WD&lt;br /&gt;
हिन्दू धर्म ग्रंथों में पाताल लोक से संबंधित असंख्य घटनाओं का वर्णन मिलता हैं। कहते हैं कि एक बार माता पार्वती के कान की बाली (मणि) यहां गिर गई थी और पानी में खो गई। खूब खोज-खबर की गई, लेकिन मणि नहीं मिली। बाद में पता चला कि वह मणि पाताल लोक में शेषनाग के पास पहुंच गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब शेषनाग को इसकी जानकारी हुई तो उसने पाताल लोक से ही जोरदार फुफकार मारी और धरती के अंदर से गरम जल फूट पड़ा। गरम जल के साथ ही मणि भी निकल पड़ी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में पाताल लोक के बारे में सबसे लोकप्रिय प्रसंग भगवान विष्णु के अवतार वामन और राजा बलि का माना जाता है। बली ही पाताल लोक के राजा माने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामायण में भी अहिरावण द्वारा राम-लक्ष्मण का हरण कर पाताल लोक ले जाने पर श्री हनुमान के वहां जाकर अहिरावण वध करने का प्रसंग आता है। इसके अलावा भी ब्रह्मांड के तीन लोकों में पाताल लोक का भी धार्मिक महत्व बताया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों अनुसार भू-लोक यानी पृथ्वी के नीचे सात प्रकार के लोक हैं जिनमें पाताल लोक अंतिम है। पाताल लोक को नागलोक का मध्य भाग बताया गया है। पाताल लोकों की संख्या सात बताई गई है।&lt;br /&gt;
आगे पढ़ें कौन-कौन से हैं पाताल लोक...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विष्णु पुराण के अनुसार पूरे भू-मंडल का क्षेत्रफल 50 करोड़ योजन है। इसकी ऊंचाई 70 सहस्र योजन है। इसके नीचे ही सात लोक हैं जिनमें क्रम अनुसार पाताल नगर अंतिम है। 7 पाताल लोकों के नाम इस प्रकार हैं- 1. अतल, 2. वितल, 3. सुतल, 4. रसातल, 5. तलातल, 6. महातल और 7. पाताल&lt;br /&gt;
आगे पढ़ें, कैसा है पाताल लोक और कौन है पाताल लोक के निवासी....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सात प्रकार के पाताल में जो अंतिम पाताल है वहां की भूमियां शुक्ल, कृष्ण, अरुण और पीत वर्ण की तथा शर्करामयी (कंकरीली), शैली (पथरीली) और सुवर्णमयी हैं। वहां दैत्य, दानव, यक्ष और बड़े-बड़े नागों और मत्स्य कन्याओं की जातियां वास करती हैं। वहां अरुणनयन हिमालय के समान एक ही पर्वत है।&lt;br /&gt;
आगे पढ़े, पाताल की अग्नि का रहस्य....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जल के भीतर अग्नि : माना जाता है कि जब देवताओं ने दैत्यों का नाश कर अमृतपान किया था तब उन्होंने अमृत पीकर उसका अवशिष्ट भाग पाताल में ही रख दिया था अत: तभी से वहां जल का आहार करने वाली आसुर अग्नि सदा उद्दीप्त रहती है। वह अग्नि अपने को देवताओं से नियंत्रित रहती है और वह अग्नि अपने स्थान के आस-पास नहीं फैलती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी कारण धरती के अंदर अग्नि है अर्थात अमृतमय सोम (जल) की हानि और वृद्धि निरंतर दिखाई पड़ती है। सूर्य की किरणों से मृतप्राय पाताल निवासी चन्द्रमा की अमृतमयी किरणों से पुन: जी उठते हैं।&lt;br /&gt;
आगे पढ़े, धरती के कि स स्थान से जा सकते हैं पाताल लोक....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपने धरती पर ऐसे कई स्थानों को देखा या उनके बारे में सुना होगा जिनके नाम के आगे पाताल लगा हुआ है, जैसे पाताल कोट, पाताल पानी, पाताल द्वार, पाताल भैरवी, पाताल दुर्ग, देवलोक पाताल भुवनेश्वर आदि। नर्मदा नहीं को भी पाताल नदी कहा जाता है। नदी के भीतर भी ऐसे कई स्थान होते हैं, जहां से पाताल लोक जाया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं कि ऐसी कई गुफाएं हैं, जहां से पाताल लोक जाया जा सकता है। ऐसी गुफाओं का एक सिरा तो दिखता है लेकिन दूसरा कहां खत्म होता है, इसका किसी को पता नहीं। कहते हैं कि जोधपुर के पास भी ऐसी गुफाएं हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इनका दूसरा सिरा आज तक किसी ने नहीं खोजा। इसके अलावा पिथौरागढ़ में भी है पाताल भुवनेश्वर गुफाएं। यहां पर अंधेरी गुफा में देवी-देवताओं की सैकड़ों मूर्तियों के साथ ही एक ऐसा खंभा है, जो लगातार बढ़ रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समुद्र में भी ऐसे कई रास्ते हैं, जहां से पाताल लोक पहुंचा जा सकता है। धरती के 75 प्रतिशत भाग पर तो जल ही है। पाताल लोक कोई कल्पना नहीं। पुराणों में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीनकाल में समुद्र के तटवर्ती इलाकों को भी पाताल लोक कहा जाता था। बंगाल की खाड़ी के आसपास नागलोक होने का जिक्र है। यहां नाग संप्रदाय भी रहता था। इतिहासकार मानते हैं कि वैदिक काल में धरती के तटवर्ती इलाके और खाड़ी देश को पाताल में माना जाता था।&lt;/div&gt;</summary>
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