<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4</id>
	<title>दशकुमारचरित - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4&amp;action=history"/>
	<updated>2026-08-25T23:08:36Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.43.6</generator>
	<entry>
		<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4&amp;diff=6647&amp;oldid=prev</id>
		<title>imported&gt;चक्रबोट: ऑटोमैटिड वर्तनी सुधार</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4&amp;diff=6647&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2021-05-06T04:32:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऑटोमैटिड वर्तनी सुधार&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{स्रोतहीन}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;दशकुमारचरित&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;, [[दण्डी|दंडी]] (षष्ठ या सप्तम शताब्दी ई.) द्वारा प्रणीत [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] गद्यकाव्य है। इसमें दश कुमारों का चरित वर्णित होने के कारण इसका नाम &amp;quot;दशकुमारचरित&amp;quot; है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== रचयिता ==&lt;br /&gt;
दंडी द्वारा रचित &amp;quot;[[अवन्तिसुन्दरी कथा|अवंतिसुंदरी कथा]]&amp;quot; नामक गद्यकाव्य (अनंतशयन ग्रंथावली, त्रिवेंद्रम से प्रकाशित) की खोज से दशकुमारचरित की समस्या और भी जटिल बन गई है। ये विकल्प उपस्थित होते हैं कि क्या दशकुमारचरित और अवंतिसुंदरी कथा दोनों के रचयिता दंडी एक ही हैं अथवा भिन्न-भिन्न हैं; और यदि इन दोनों के लेखक एक ही दंडी मान लिए जाएँ, तो क्या ये दोनों गद्यकाव्य एक दूसरे के पूरक हैं अथवा दो स्वतंत्र गद्यकाव्य हैं। कुछ विद्वान् इस पक्ष में हैं कि अवंतिसुंदरी कथा ही मूल दशकुमारचरित का खोया हुआ भाग है और दोनों मिलाकर एक ही गद्यकाव्य हैं। विद्वानों का दूसरा वर्ग इस विचार से बिलकुल सहमत नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संरचना ==&lt;br /&gt;
दशकुमारचरित के हस्तलिखित तथा प्रकाशित संस्करणों में प्राय: तीन भाग हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:(1) आरंभिक अथवा भूमिका भाग, जिसमें पाँच उच्छ्वास हैं, &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पूर्वपीठिका&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के नाम से प्रसिद्ध हैं; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:(2) मध्यम भाग, जिसमें आठ उच्छ्वास हैं, &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;दशकुमारचरित&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के नाम से जाना जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:(3) अंतिम अथवा परिशिष्ट भाग, जो &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;उत्तरपीठिका&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के नाम से प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनमें से ग्रंथ का मध्य भाग ही, जो आठ उच्छ्वासों में विभक्त है, दंडी की मौलिक कृति माना जाता है, परन्तु क्योंकि इनमें राजवाहन की असम्पूर्ण कथा एवं सात मित्रों की कथाएँ हैं अत: वह असम्पूर्ण है। शेष भाग अर्थात् पूर्वपीठिका और उत्तरपीठिका अन्य लेखकों की रचनाएँ हैं जो कालांतर में मूल ग्रंथ के आदि और अंत में क्रमश: जोड़ दी गई है। विद्वानों की धारणा है कि दंडी ने पहले अवश्य पूर्ण ग्रंथ की रचना की होगी, किंतु बाद में कारणवश वे भाग नष्ट हो गए। दंडी के मूल ग्रंथ के आठ उच्छ्वासों में केवल आठ कुमारों की कथा आती है। किंतु पूर्वपीठिका में दी गई दो कुमारों ( पुष्पोदभव एवं सोमदत्त ) की कथा मिलाकर दस कुमारों की संख्या पूरी हो जाती है। इसी प्रकार मूल ग्रंथ के आठवें उच्छ्वास में वर्णित अपूर्ण विश्रुत चरित को उत्तरपीठिका में पूरा किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[परमार भोज|भोज]] ने अपने [[सरस्वतीकंठाभरण|सरस्वती कण्ठाभरण]] में पूर्वपीठिका का स्तुति श्लोक उद्धृत किया है। अत: यह भाग ग्यारहवीं शताब्दी र्इ. पूर्व ही जुड़ चुका होगा। उत्तरपीठिका के कर्इ संस्करण हैं- एक चक्रपाणि का, दूसरा नारायण का, और कुछ भाग पद्मनाभ के। क्योंकि मुख्य कथा में उल्लिखित बातों से पूर्वपीठिका एवं उत्तरपीठिका में कर्इ स्थानों पर विरोध पाया है अत: पूर्वपीठिका तथा उत्तरपीठिका को पश्चाद्वर्ती सिद्ध करना सुगम है। उदाहरणत: मुख्य भाग में अर्थपाल तथा प्रमति कामपाल के पुत्र हैं जिनकी माताओं के नाम क्रमश: कान्तिमति तथा तारावली है, परन्तु पूर्व-पीठिका में अर्थपाल, तारावली का पुत्र है और प्रमति, सुमति नामक मंत्री का। इसी प्रकार मुख्य भाग में विश्रुत के पितामह का नाम सिन्धुदत्त है परन्तु पूर्वपीठिका में उनका नाम पद्मोद्भव है। पुनश्च मुख्य भाग में राजकुमार राजकुमारी के अनुज की सहायता से अन्त:पुर में प्रवेश पाता है परन्तु पूर्वपीठिका में एक सहकारी [[विद्याधर]] की सहायता से। इसी प्रकार ग्रन्थ में अनेक विरोध एवं विप्रतिपत्तियाँ विधमान हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;दशकुमारों के नाम &lt;br /&gt;
* राजवाहन&lt;br /&gt;
* सोमदत्त&lt;br /&gt;
* पुष्पोद्भव&lt;br /&gt;
* अपहारवर्मन&lt;br /&gt;
* उपहारवर्मन&lt;br /&gt;
* अर्थपाल&lt;br /&gt;
* प्रमति&lt;br /&gt;
* मित्रगुप्त&lt;br /&gt;
* मंत्रगुप्त&lt;br /&gt;
* विश्रुत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कथा ==&lt;br /&gt;
मूल दशकुमारचरित के प्रथम उच्छ्वास का आरंभ एकाएक मुख्य नायक राजकुमार राजवाहन को एक बन्दी के रूप में प्रस्तुत करते हुए होती है। बाद में चम्पा के अभियान में राजवाहन को उसके भूले भटके सभी साथी मिल जाते हैं जो शेष सात उच्छवासों में अपनी-अपनी रोमांचकारी एवं कुतूहलजनक घटनाओं को राजवाहन से कहते हैं। दूसरे उचछ्वास में उपहार वर्मा की कथा आती है जो अत्यंत विस्तृत एव विनोदपूर्ण हैं। मारीचि नाम के ऋषि तथा वास्तु-पाल नाम के श्रेष्ठी का प्रवंचना बहुत रोचक है। नायक के द्युतशाला में अनुभव तथा घरों में सेंध लगाना आदि हास्यपूर्ण घटनाएँ हैं। तृतीय उच्छ्वास से लेकर षष्ठ उच्छ्वास तक क्रमश: उपहार वर्मा, अर्थपाल, प्रमति तथा मित्रगुप्त की कथाएँ हैं। तीसरे उच्छ्वास में उपहार वर्मा की कथा है। उसने राज्यापहारी के मन पर अधिकार करके अपनी अदभुत सौन्दर्य देने की शक्ति के विषय में सुझाया। इस प्रकार सौन्दर्यशक्ति के बहाने से उनकी हत्या कर दी तथा अपने पिता के खोए हुए राज्य को वापस लिया। चतुर्थ उच्छ्वास में बतलाया गया है कि अर्थपाल ने अपने पिता के खोए मन्त्रिपद तथा मणिकार्णिका नामक राजकुमारी को प्राप्त किया। पंचम उच्छ्वास में प्रमति श्रावस्ती की राजकुमारी का पाणिग्रहण करता है। युवराज की यात्रा के वर्णन में ग्राम्य तथा नागरिक जीवन का अनेक प्रकार का उल्लेख प्राप्त होता है। पष्ठ उच्छ्वास में मित्रगुप्त के द्वारा खुँह देश की राजकुमारी की प्राप्ति का वर्णन है। इसमें दण्डी ने समुद्र पर किये गये साहसों का वर्णन किया है। सप्तम उच्छ्वास में मंत्रगुप्त की कथा है। इस उच्छ्वास की यह विशेषता उल्लेखनीय है कि इसमें कथावक्ता का ओष्ठ उसकी प्रेयसी द्वारा काटे जाने के कारण ओष्ठ से उच्चार्यमाण [[पवर्ग]] के वर्णों का प्रयोग नहीं हुआ है। अष्टम उच्छ्वास में विश्रुत के साहसिक कार्यो का वर्णन है जो विदर्भ देश के राजकुमार को उसका खोया हुआ राज्य दिलाता है। इसमें राजनीतिशास्त्र पर परिष्कृत व्यंग्य है। आनन्द एवं सुगम जीवन का सशक्त प्रतिपादन त्रुटिपूर्ण हेतु पर आधरित है। एकाएक प्रारम्भ के समान यहाँ कृति एकाएक समाप्त हो जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== महत्त्व ==&lt;br /&gt;
संस्कृत साहित्य में दशकुमारचरित का अनुपम स्थान है। वस्तुत: यह संस्कृत गद्यकाव्य आधुनिक उपन्यासों के बहुत निकट है। यह तत्कालीन समाज का सर्वांगीण यथार्थ चित्र उपस्थित करता है। दशकुमारचरित धूर्तता से पूर्ण काव्य कहा जाता है। द्युतक्रीड़ा, सेंध लगाना, चालाकी, धूर्तता, प्रवंचना, हिंसा, हत्या, जालसाजी, अपहरण एवं अवैध प्रेम एक-एक अथवा सामूहिक रूप में सब कथाओं में मिलते हैं। लेखक का समाज के प्रति व्यवहार अतीव सोपालम्भ है। ब्राह्राण, संन्यासी, राजा, राजकुमारियाँ एवं पवित्र साधुओं का उपहास किया गया है। देवताओं को भी नहीं छोड़ा गया। परन्तु इसका उद्देश्य अनैतिकता का समर्थन करना नहीं है। लोगों की मिथ्या मान्यताओं का विश्लेषण करके समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना ही इनका मुख्य उद्देश्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य कथावस्तु को अवांतर कथाओं के साथ बड़ी कुशलता से पिरोया गया है। कथा का प्रवाह जो आदि से अंत तक अबाधगति से चलता है, रोचक एवं कुतूहलवर्धक है। उपलब्ध प्राचीन संस्कृत गद्यकाव्यों में दंडी का दशकुमारचरित ही एक ऐसा गद्यकाव्य है, जो सरल एवं स्वाभाविक गद्य शैली में लिखा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दण्डी का चरित्र-चित्रण बहुत प्रभावशाली है। उन्होंने मारीचि ऋषि, गणिका काममंजरी, तथा धात्री श्रृंगालिका तथा सिपाहियों के अफसर कान्तक के जीवन-चित्र प्रदर्शित किए हैं। कवि द्वारा प्रस्तुत मनोरंजन स्थितियों में हास्य एवं व्यंग्य अभिव्याप्त हैं। निस्सन्देह दण्डी का भाषा पर अधिकार है परन्तु वह बढ़ा चढ़ाकर वस्तुओं का वर्णन नहीं करते और अपनी काव्यकला की प्रौढ़ता का सूक्ष्म दृष्टि से प्रदर्शन कर पाठक के हृदय पर प्रभाव डालते हैं। संस्कृत आलोचक उनके उत्कृष्ट शब्द सौन्दर्य की सराहना करते हैं। विद्वानों में यह प्रसिद्ध उक्ति प्रचलित है &amp;#039;दण्डिनः पदलालित्यम्&amp;#039; और इसके दण्डी अधिकारी भी हैं। अनुप्रास के ललित प्रयोग से दण्डी मनोरंजक ध्वनि प्रभाव उत्पन्न करते हैं। वे लम्बे समासों का प्रयोग करते हैं परन्तु अर्थ की व्यक्ति में अस्पष्टता नहीं आने देते। उनके वर्णन प्रभावशाली एवं हृदयग्राही होते हैं परन्तु वे पाठक के हृदय को आकर्षित किये रखते हैं क्योंकि उनके अलंकारों के प्रयोग एवं वर्णनीय विषय में एक कलात्मक सन्तुलन रहता है। दण्डी के पदलालित्य के उदाहरण रूप प्रस्तुत हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;अथ संगतगीतसंगीतं-संउतांगना सहस्रश्रृंगार हेलानिरगानंगसंघर्षहर्षितै:।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;नीलनीरदनिकरपीवरतमोनिविडितायां राजवीथ्याम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार के उदाहरण प्राय: प्राचुर्य से मिलते हैं और &amp;#039;दण्डिनः पदलालित्यम्&amp;#039; की उक्ति को सिद्ध करते हैं। दण्डी का पदलालित्य गौरव का विषय है। उनकी भाषा में सुकुमारता, परिष्कार, प्रांजलता, प्रसाद और माधुर्य गुण प्राप्त होते हैं। दशकुमारचरित पढ़ने पर पाठक को यह अनुभूति होती है कि वह कुछ सरस रचना का रसास्वाद कर रहा है। जीवन की अनुभूतियाँ आँखों के समक्ष उतर आती हैं और वह कवि को अपना एक अतरंग मित्र सा अनुभव करता है। दण्डी के गगद्य में न तो [[सुबन्धु]] के तुल्य &amp;#039;प्रत्यक्षरश्लेष&amp;#039; की योजना है और न [[बाणभट्ट|बाण]] के सदृश &amp;#039;सरसस्यरवर्णपद&amp;#039; की कृत्रिमता। उसमें दैनिक व्यवहार की प्रवाहशील भाषा है। छोटे-छोटे पद और वाक्य नवशिशुओं के समान क्रीड़ा करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं और वे सहसा हृदय को आकृष्ट कर लेते हैं। कथाओं और उपन्यासों में प्रयुक्त मनीश शैली का इसमें अंतर्भाव दीखता है। भाषा की सरसता, मधुरता और सहज सुन्दरता नीरस में भी सरसता का आभास कर देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा राजहंस और उनकी पत्नी बसुमती के वर्णन में पदलालित्य और माधुर्य दर्शनीय है :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;#039;&amp;#039;अनवरतयागदक्षिणारक्षितशिष्टविशिष्टविधासंभारभासुर-भूसुर निकर राज हंसी नाम ध्नदर्पकन्दर्पसौन्दर्यसौदर्यहृधनिरवध-रूपो भूपो बभूव। तस्य वसुमती नाम सुमती लीलावतीकुलशेखरमणी रमणीबभूव। (पूर्व उच्छ्वास 1)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाह्यसूत्र ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20110312060726/http://sa.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D संस्कृत विकिस्रोत पर संस्कृत में &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;दसकुमारचरितम्&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;]&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=wguTpuu1FWMC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=true &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;दशकुमारचरितम्&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (हिन्दी टीका सहित)] (गूगल पुस्तक ; टीकाकार : डॉ विश्वनाथ झा)&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20150108084316/https://books.google.co.in/books?id=feQfSWrCBHYC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false दस साहसी कुमार] (गूगल पुस्तक ; डॉ ओम शिवराज द्वारा दशकुमारचरितम का हिन्दी रूपान्तर)&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20170721215442/http://www.sanskrit.nic.in/DigitalBook/D/DushkumarCharitam.pdf दशकुमारचरितम्] (राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान)&lt;br /&gt;
*[https://books.google.co.in/books?id=zyPqWSzxOVoC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false दशकुमारचरित]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:ग्रन्थ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:संस्कृत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:साहित्य]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;चक्रबोट</name></author>
	</entry>
</feed>