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	<title>देवता - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>2405:204:3288:A8EF:2699:173A:939B:BA7: /* अन्य धर्मों के पितृ देवता */बौद्ध धर्म पुनर्जन्म में विश्वास नहीं मानता है।</title>
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		<updated>2021-06-30T15:39:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;span class=&quot;autocomment&quot;&gt;अन्य धर्मों के पितृ देवता: &lt;/span&gt;बौद्ध धर्म पुनर्जन्म में विश्वास नहीं मानता है।&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;(देवी/देवता) ~ [[हिन्दू देवी देवताओं की सूची]]&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
{{स्रोतहीन}}{{हिन्दू धर्म सूचना मंजूषा}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Awatoceanofmilk01.JPG|right|thumb|250px|[[अंकोरवाट मंदिर|अंकोरवाट]] के मन्दिर में चित्रित [[समुद्र मन्थन]] का दृश्य, जिसमें देवता और दैत्य [[वासुकी|बासुकी नाग]] को रस्सी बनाकर [[मन्दार पर्वत|मन्दराचल]] की मथनी से समुद्र मथ रहे हैं। ]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;देवता&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (संस्कृत के &amp;#039;&amp;#039;दिव्&amp;#039;&amp;#039; [[धातु (संस्कृत के क्रिया शब्द)|धातु]] से, जिसका अर्थ दिव्य होना है) कोई भी परालौकिक शक्ति का पात्र है,या [[पराप्राकृतिक]] है और इसलिये पूजनीय/अमर है। देवता अथवा देव इस तरह के पुरुषों के लिये प्रयुक्त होता है और देवी इस तरह की स्त्रियों के लिये। [[हिन्दू धर्म]] में देवताओं को या तो [[परमेश्वर]] ([[ब्रह्म]]) का लौकिक रूप माना जाता है, या तो उन्हें ईश्वर का सगुण रूप माना जाता हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last1=Krishnan |first1=K. S. |title=Origin of Vedas |date=2019-08-12 |publisher=Notion Press |isbn=978-1-64587-981-7 |url=https://books.google.com.bd/books?id=O6SoDwAAQBAJ&amp;amp;pg=PT322&amp;amp;dq=vedic+deva+avestan+daeva&amp;amp;hl=en&amp;amp;sa=X&amp;amp;ved=2ahUKEwiskd6k1LPuAhVZxTgGHb6iAhEQ6AEwAHoECAIQAg#v=onepage&amp;amp;q=vedic%20deva%20avestan%20daeva&amp;amp;f=false |access-date=24 January 2021 |language=en}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last1=Boyce |first1=Mary |title=Zoroastrians: Their Religious Beliefs and Practices |date=2001 |publisher=Psychology Press |isbn=978-0-415-23902-8 |page=11 |url=https://books.google.com.bd/books?id=a6gbxVfjtUEC&amp;amp;pg=PA11&amp;amp;dq=vedic+deva+avestan+daeva&amp;amp;hl=en&amp;amp;sa=X&amp;amp;ved=2ahUKEwiskd6k1LPuAhVZxTgGHb6iAhEQ6AEwAnoECAYQAg#v=onepage&amp;amp;q=vedic%20deva%20avestan%20daeva&amp;amp;f=false |access-date=24 January 2021 |language=en}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |title=Essays on the History of Religions |date=2018 |publisher=BRILL |isbn=978-90-04-37792-9 |page=6 |url=https://books.google.com.bd/books?id=BN-mDwAAQBAJ&amp;amp;pg=PA6&amp;amp;dq=vedic+deva+avestan+daeva&amp;amp;hl=en&amp;amp;sa=X&amp;amp;ved=2ahUKEwiskd6k1LPuAhVZxTgGHb6iAhEQ6AEwBHoECAAQAg#v=onepage&amp;amp;q=vedic%20deva%20avestan%20daeva&amp;amp;f=false |access-date=24 January 2021 |language=en}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बृहदारण्यक उपनिषद्|बृहदारण्य उपनिषद]] में एक बहुत सुन्दर संवाद है जिसमें यह प्रश्न है कि कितने देव हैं। उत्तर यह है कि वास्तव में केवल एक है जिसके कई रूप हैं। &lt;br /&gt;
*1 पहला उत्तर है एक जिसने सृष्टि की रचना की &lt;br /&gt;
*2 दूसरा उत्तर है त्रिदेव अर्थात (ब्रह्मा विष्णु महादेव)&lt;br /&gt;
*3 तीसरा उत्तर है [[33 कोटि]] अर्थात (33 प्रकार) इनमें 12 [[आदित्य]],11 रूद्र,8 वसु और 2 अश्विनी कुमार हैं।&lt;br /&gt;
*4 चौथा उत्तर हैं 3339 ये इंद्रलोक के देवता है जिनको अलग अलग कार्य मिला है जैसे इंद्र बारिश के देवता, पवन वायु के देवता, सूर्य देवता, अग्नि देवता, जल देवता, इत्यादि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[वेद]] [[मन्त्र]]ों के विभिन्न देवता है। प्रत्येक मन्त्र का देवता और [[ऋषि]], [[कीलक]]   होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== देवताओं का वर्गीकरण ==&lt;br /&gt;
देवताओं का वर्गीकरण कई प्रकार से हुआ है, इनमें चार प्रकार मुख्य हैं:-                          &lt;br /&gt;
(1) स्थान क्रम के अनुसार &lt;br /&gt;
(2) परिवार क्रम के अनुसार                &lt;br /&gt;
(3) वर्ग क्रम के अनुसार                &lt;br /&gt;
(4) समूह क्रम के अनुसार   &lt;br /&gt;
(5) 33 कोटि&lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
1. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;स्थान क्रम से वर्णित देवता&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; -- द्युस्थानीय यानी ऊपरी आकाश में निवास करने वाले देवता, मध्यस्थानीय यानी अन्तरिक्ष में निवास करने वाले देवता, और तीसरे पृथ्वीस्थानीय यानी पृथ्वी पर रहने वाले देवता माने जाते हैं। &lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
2. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;परिवार क्रम से वर्णित देवता&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; -- इन देवताओं में आदित्य, वसु, रुद्र आदि को गिना जाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
3. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;वर्ग क्रम से वर्णित देवता&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; -- इन देवताओं में इन्द्रावरुण, मित्रावरुण आदि देवता आते हैं। &lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;     &lt;br /&gt;
4. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;समूह क्रम से वर्णित देवता&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; -- इन देवताओं में सर्व देवा आदि की गिनती की जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
5. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;33 कोटि देवी-देवता&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - इनमें 12 [[आदित्य]],11 रूद्र,8 वसु और 2 अश्विनी कुमार हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ऋग्वेद में देवताओं का स्थान ==&lt;br /&gt;
[[ऋग्वेद]] के [[सूक्त|सूक्तों]] में देवताओं की स्तुतियों से देवताओं की पहचान की जाती है, इनमें देवताओं के नाम [[अग्नि देव|अग्नि]], [[वायु देव|वायु]], इन्द्र, वरुण, मित्रावरुण, अश्विनीकुमार, विश्वदेवा, [[सरस्वती]], ऋतु, मरुत, त्वष्टा, ब्रहम्णस्पति, सोम, दक्षिणा इन्द्राणी, वरुनानी, द्यौ, पृथ्वी, पूषा आदि को पहचाना गया है, और इनकी स्तुतियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। &lt;br /&gt;
जो लोग देवताओं की अनेकता को नहीं मानते है, वे सब नामों का अर्थ परब्रह्म परमात्मा वाचक लगाते है, और जो अलग अलग मानते हैं वे भी परमात्मात्मक रूप में इनको मानते है। &lt;br /&gt;
भारतीय गाथाओम और पुराणों में इन देवताओं का मानवीकरण अथवा पुरुषीकरण हुआ है, फ़िर इनकी मूर्तियाँ बनने लगी, फ़िर इनके सम्प्रदाय बनने लगे, और अलग अलग पूजा पाठ होने लगे देखें (हिन्दू धर्मशास्त्र-देवी देवता), सबसे पहले जिन देवताओं का वर्गीकरण हुआ उनमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव का उदय हुआ, इसके बाद में लगातार इनकी संख्या में वृद्धि होती चली गयी, [[निरुक्तकार यास्क]] के अनुसार,&amp;quot; देवताऒ की उत्पत्ति आत्मा से ही मानी गयी है&amp;quot;, देवताओं के सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है, कि &amp;quot;तिस्त्रो देवता&amp;quot;.अर्थात देवता तीन है, किन्तु यह प्रधान देवता है, जिनके प्रति सृष्टि का निर्माण, इसका पालन और इसका संहार किया जाना माना जाता है। [[महाभारत]] के (शांति पर्व) में इनका वर्णनक्रम इस प्रकार से किया गया है:-&lt;br /&gt;
: &amp;#039;&amp;#039; आदित्या: क्षत्रियास्तेषां विशस्च मरुतस्तथा, अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ, स्मृतास्त्वन्गिरसौ देवा ब्राहमणा इति निश्चय:, इत्येतत सर्व देवानां चातुर्वर्नेयं प्रकीर्तितम&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदित्यगण क्षत्रिय देवता, मरुदगण वैश्य देवता, अश्विनी गण शूद्र देवता, और अंगिरस ब्राहमण देवता माने गए हैं। [[शतपथ ब्राह्मण]] में भी इसी प्रकार से देवताओं को माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुद्ध बहुईश्वरवादी धर्मों में देवताओं को पूरी तरह स्वतन्त्र माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== वेद परम्परा के प्रमुख देवता ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;!--सुधार की आवश्यकता--&amp;gt;&lt;br /&gt;
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सविता, मित्र, वरुण है। &lt;br /&gt;
* [[गणेश]] (प्रथम पूज्य)&lt;br /&gt;
* [[लक्ष्मी]]&lt;br /&gt;
* [[विष्णु]]&lt;br /&gt;
* [[शिव|शंकर]]&lt;br /&gt;
* [[कृष्ण]]&lt;br /&gt;
*[[सरस्वती देवी|सरस्वती]]&lt;br /&gt;
* [[दुर्गा]]&lt;br /&gt;
* [[इन्द्र]]&lt;br /&gt;
* [[सूर्य]] &lt;br /&gt;
* [[हनुमान]]&lt;br /&gt;
* [[ब्रह्मा]]&lt;br /&gt;
* [[राम]]&lt;br /&gt;
* [[वायु देव]]ता&lt;br /&gt;
* [[आप (जल)|जल देवता]]&lt;br /&gt;
* [[अग्नि देव]]ता&lt;br /&gt;
* [[शनि (ज्योतिष)|शनि देवता]]&lt;br /&gt;
* [[पार्वती]]&lt;br /&gt;
* [[कार्तिकेय]]&lt;br /&gt;
* [[राम]]&lt;br /&gt;
* [[शेषनाग]]&lt;br /&gt;
* [[कुबेर]]&lt;br /&gt;
* [[धन्वन्तरि|धन्वंतरि]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अन्य धर्मों के पितृ देवता ==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|ईश्वर}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रथा के दार्शनिक आधार की पहली मान्यता मनुष्य में आध्यात्मिक तत्व की अमरता है। आत्मा किसी सूक्ष्म शारीरिक आकार में प्रभावाित होती है और इस आकार के माध्यम से ही आत्मा का संसरण संभव है। असंख्य जन्ममरणोपरांत आत्मा पुनरावृत्ति से मुक्त हो जाती है। यद्यपि आत्मा के संसरण का मार्ग पूर्वकर्मों द्वारा निश्चित होता है तथापि वंशजों द्वारा संपन्न श्राद्धक्रियाओं का माहात्म्य भी इसे प्रभावित करता है। धर्म में दो जन्मों के बीच एक अंत:स्थायी अवस्था की कल्पना की गई है जिसमें आत्मा के संसरण का रूप पूर्वकर्मानुसार निर्धारित होता है। पुनर्जन्म में विश्वास हिंदू तथा जैन चिंतनप्रणलियों में पाया जाता है। हिंदू दर्शन की चार्वाक पद्धति इस दिशा में अपवादस्वरूप है। अन्यथा पुनर्जन्म एवं पितरों की सत्ता में विश्वास सभी चिंतनप्रणालियों और वर्तमान पढ़ अपढ़ सभी हिंदुओं में समान रूप से पाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालाबार के नायरों में मृतकों को दान देने की रस्म दाहसंस्कार के अगले दिन प्रारंभ की जाती है और पूरे सप्ताह भर चलती है। उत्तरी भारत की नीची जातियों में मृतकों को भोजन देने की प्रथा प्रचलित है। गोंड जाति में दाहसंस्कार संबंधी रस्मों की अवधि केवल तीन दिन है। इन रस्मों की समाप्ति पर शोककर्ता स्नान और क्षोर द्वारा शुद्ध हो पितरों को दूध और अन्न का तर्पण करते हैं। नेपाल में &amp;#039;कमो&amp;#039; लोहारों में मृत्यु के ११वें दिन मृतक के संबंधियों के भोज का आयोजन किया जाता है। किंतु भोजन प्रारंभ होने के पूर्व प्रत्येक व्यंजन का थोड़ा थोड़ा अंश एक पत्तल पर निकालकर मृत आत्मा के लिये जंगल में भेज दिया जाता है। पत्तल ले जानेवाला व्यक्ति उसे तब तक दृष्टि से ओझल नहीं होने देता जब तक पत्तल में रखे भोजन पर कोई मक्खी या कीड़ा न बैठ जाए। ऐसा होने पर पत्तल को किसी भारी पत्थर से ढक कर वह व्यक्ति अपने साथ लाया भोजन जंगल में ही रख देता है। तदुपरांत वह गाँव में जाकर संबंधियों को मृतात्मा द्वारा उनके दान की स्वीकृति की सूचना देता है और तब भोज प्रारंभ होता है। मक्त ओरांव मृतक के अस्थि अवशेषों को शवस्थान में गाड़कर सुरक्षित रखते हैं। दिवंगत पुरखों को सूअर का मांस और ढेरों चावल भेंट में चढ़ाए जाते हैं और उठते बैठते, भोजन या धूम्रपान के अवसर पर उनका स्मरण किया जाता है। मल पहाड़ियाँ जाति में पूर्वजों की तुलना उन काष्ठस्तंभों से की जाती है जो मकान की छत को सहारा देते हैं। शव को गाड़ते समय मेछ लोग मृतात्मा की तृप्ति के लिये कब्र पर आग जलाकर उसमें भोजन और पेय पदार्थों की आहुति देते हैं। मल पहाड़ियाँ भी अक्टूबर नवंबर मास में कालीपूजा की रात्रि को मृत पुरखों के सम्मान में सूखे सन की बत्तियाँ जलाते हैं। उत्तरी भारत के अन्य भागों में इस प्रकार की रीतियाँ प्रचलित हैं। मिर्जापुर के घासिया पाँच पत्तलों में प्रतिदिन भोजन सजाकर पुरखों को भेंट चढ़ाते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे उनकी भेंट स्वीकार कर अपने वंशजों और पशुधन पर कृपादृष्टि रखें। कोलों में मृतात्मा को मुर्गे की बलि देते हैं। वे बलिस्थल पर शराब छिड़ककर संतति की सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं। राजी लोग सिर, दाढ़ी और मूँछों के बाल मुँडाकर उन्हें पूर्वजों की भेंट स्वरूप कब्र पर छोड़ देते हैं। खानाबदोश और पूर्व अपराधोपजीवी नट कबीले के लोग नदी के तट पर भोजन बनाते हैं और कपड़ा बिछा उसपर मृतात्मा के बैठने की प्रतीक्षा करते हैं। मृतक का निकटतम संबंधी एक कुल्हड़ और धुरी हाथ में लेकर नदी में डुबकी लगाता है। वह तब तक जल से बाहर नहीं आता जब तक सिर पर रखा कुल्हड़ भर न जाए। कुल्हड़ को कपड़े पर रख, उसके चारों कोनों का भी ऐसे कुल्हड़ों से दबा दिया जाता है। फिर कुल्हड़ों से घिरे इस कपड़े पर आत्मा की तृप्ति के लिये भोजन रख दिया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ भारतीय जातियों में मृतात्मा की भोजन संबंधी आवश्यकता की पूर्ति माता की ओर से संबंधियों को भोज देकर की जाती है। निचले हिमालय की तराई के भोकसा अपनी पुत्रियों के वंशजों को भोज देकर मृतात्मा की शांति की व्यवस्था करते हैं। उड़ीसा के जुआंग और उत्तरी भारत के अन्य कबीले मृतक के मामा को पुजारी का पद देते हैं। गया ओर ऐसे अन्य स्थानों में जहाँ सगे संबंधियों को पिंडदान दिया जाता है, ऐसे अवसरों पर भोजन करने के लिये ब्राह्मणों का एक विशेष वर्ग भी बन गया है। समस्त भारत में आश्विन (अगस्त सितंबर) मास में पितृपक्ष के अवसर पर वंशज पुरखों को पिंडदान देते हैं और पूरे पखवारे निकटतम पवित्र नदी में स्नान करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैसूर के कुरुवारू और नीलगिरि पहाड़ियों के येरुकुल अपने देवताओं के साथ पितरों को भी बलि देते हैं। मुंबई राज्य के ढोर कठकरी तथा अन्य हिंदू कबीले बिना छिले नारियल का पूर्वज मानकर उसकी पूजा करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{हिन्दू धर्म}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:रोमन धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:यूनानी धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:मिस्र का धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
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