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	<title>द्वैतवाद - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>imported&gt;संजीव कुमार: /* शब्द-मूल */ अनुभाग का शीर्षक दिया</title>
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		<updated>2021-05-23T10:25:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;span class=&quot;autocomment&quot;&gt;शब्द-मूल: &lt;/span&gt; अनुभाग का शीर्षक दिया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{स्रोत कम|date=जून 2015}}&lt;br /&gt;
[[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] शब्द &amp;#039;द्वैत&amp;#039;, &amp;#039;दो भागों में&amp;#039; अथवा &amp;#039;दो भिन्न रूपों वाली स्थिति&amp;#039; को निरूपित करने वाला एक शब्द है। इस शब्द के अर्थ में विषयवार भिन्नता आ सकती है। [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] अथवा [[धर्म]] में इसका अर्थ पूजा अर्चना से लिया जाता है जिसके अनुसार प्रार्थना करने वाला और सुनने वाला दो अलग रूप हैं। इन दोनों की मिश्रित रचना को &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;द्वैतवाद&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; कहा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=दृष्टि के उस पार |author=जगदीश विष्णु पुरोहित |publisher=सी॰जी॰ एण्ड कम्पनी लखनऊ |page=[https://books.google.co.in/books?id=1StVBAAAQBAJ&amp;amp;pg=PT18 १८]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;   इस सिद्धान्त के प्रथम प्रवर्तक [[मध्वाचार्य]] (1199-1303) थे।&lt;br /&gt;
==शब्द-मूल==&lt;br /&gt;
द्वैतवाद को &amp;#039;द्वित्ववाद&amp;#039; के नाम से भी जाना जाता है। द्वैतवाद के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि के अन्तिम सत् दो हैं। इसका एकत्वाद या [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवाद]] के सिद्धान्त से मतभेद है जो केवल एक ही सत् की बात स्वीकारता है। द्वैतवाद में [[जीव]], [[संसार|जगत्]], तथा [[ब्रह्म]] को परस्पर भिन्न माना जाता है। कहीं कहीं दो से अधिक सत् वाले बहुत्ववाद के अर्थ में भी द्वैतवाद का प्रयोग मिलता है। यह वेदान्त है क्योंकि इसे [[श्रुति]], [[स्मृति]], एवं [[ब्रह्मसूत्र]] के प्रमाण मान्य हैं। ब्रह्म को प्राप्त करना इसका लक्ष्य है, इसलिए यह ब्रह्मवाद है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वैतवाद 13वीं शताब्दी से शुरु हुआ। यह अलग बात है कि इसके प्रवर्तक मध्वाचार्य ने इसे पारम्परिक मत बताया है। इस मत के अनुयायी सम्पूर्ण भारत में मिलते हैं परन्तु [[महाराष्ट्र]], [[कर्नाटक]], तथा [[गोवा]] से लेकर [[कर्नाटक]] तक के पश्चिमी तट में इनकी संख्या काफी है। इनके ग्यारह [[मठ|मठों]] में से आठ कर्नाटक में ही हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्वाचार्य ने [[श्रुति]] तथा तर्क के आधार पर सिद्ध किया कि संसार मिथ्या नहीं है, जीव ब्रह्म का आभास नहीं है, और ब्रह्म ही एकमात्र सत् नहीं है। उन्होंने इस प्रकार [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवाद]] का खण्डन किया तथा पाँच नित्य भेदों को सिद्ध किया। इस कारण इस सिद्धान्त को &amp;#039;पंचभेद सिद्धान्त&amp;#039; भी कहा जाता है। पाँच भेद ये हैं -&lt;br /&gt;
# [[ईश्वर]] का जीव से नित्य भेद है।&lt;br /&gt;
# ईश्वर का जड़ पदार्थ से नित्य भेद है।&lt;br /&gt;
# जीव का जड़ पदार्थ ने नित्य भेद है।&lt;br /&gt;
# एक जीव का दूसरे जीव से नित्य भेद है।&lt;br /&gt;
# एक जड़ पदार्थ का दूसरे जड़ पदार्थ ने नित्य भेद है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वैतवाद में कुल दस पदार्थ माने गये हैं - द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, विशिष्ट, अंशी, शक्ति, सादृश्य, तथा अभाव। प्रथम पांच तथा अन्तिम वैशेषिक पदार्थ हैं। विशिष्ट, अंशी, शक्ति, तथा सादृश्य को जोड़ देना ही मध्व मत की वैशेषिक मत से विशिष्टता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस मत में द्रव्य बीस हैं - परमात्मा, लक्ष्मी, जीव, अव्याकृत, आकाश, प्रकृति, गुणत्रय, अहंकारतत्त्व, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, मात्रा, भूत, ब्रह्माण्ड, अविद्या, वर्ण, अन्धकार, वासना, काल, तथा प्रतिबिम्ब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वैतवाद और अद्वैतवाद का परस्पर खण्डन-मण्डन==&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;द्वैतवाद के खण्डन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के लिए अद्वैतवादी [[मधुसूदन सरस्वती]] ने न्यायामृत तथा अद्वैतसिद्धि जैसे ग्रन्थों की रचना की। इसी तरह द्वैतवाद के खण्डन के लिए [[जयतीर्थ]] ने बादावली तथा [[व्यासतीर्थ]] ने न्यायामृत नामक ग्रंथों की रचना की थी। [[रामाचार्य]] ने न्यायामृत की टीका तरंगिणी नाम से लिखी तथा अद्वैतवाद का खण्डन कर द्वैतवाद की पुनर्स्थापना की। फिर तरंगिणी की आलोचना में [[ब्रह्मानन्द सरस्वती]] ने गुरुचन्द्रिका तथा लघुचंद्रिका नामक ग्रन्थ लिखे। इन ग्रन्थों को गौड़-ब्रह्मानन्दी भी कहा जाता है। [[अप्पय दीक्षित]] ने मध्वमतमुखमर्दन नामक ग्रन्थ लिखा तथा द्वैतवाद का खण्डन किया। वनमाली ने गौड़-ब्रह्मानन्दी तथा मध्वमुखमर्दन का खण्डन किया तथा द्वैतवाद को अद्वैतवाद के खण्डनों से बचाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार के खण्डन-मण्डन के आधार उपनिषदों की भिन्न व्याख्याएं रही हैं। उदाहरण के लिए, &amp;#039;[[तत्त्वमसि|तत्त्वमसि]]&amp;#039; का अर्थ अद्वैतवादियों ने &amp;#039;वह, तू है&amp;#039; किया जबकि मध्वाचार्य ने इसका अर्थ निकाला &amp;#039;तू, उसका है&amp;#039;। इसी प्रकार &amp;#039;[[अयमात्मा ब्रह्म|अयम् आत्मा ब्रह्म]]&amp;#039; का अद्वैतवादियों ने अर्थ निकाला, &amp;#039;यह आत्मा ब्रह्म है&amp;#039;, तथा द्वैतवादियों ने अर्थ निकाला - &amp;#039;यह आत्मा वर्धनशील है&amp;#039;। इस प्रकार व्याख्याएं भिन्न होने से मत भी भिन्न हो गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
* [[वेदान्त दर्शन|वेदान्त]]&lt;br /&gt;
*[[अद्वैत वेदान्त|अद्वैतवाद]]&lt;br /&gt;
*[[द्वैताद्वैत]]&lt;br /&gt;
*[[शुद्धाद्वैत]]&lt;br /&gt;
*[[विशिष्टाद्वैत]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20151126175203/http://www.sahityakunj.net/Pustak/Jagiye_aap_devataa_hai/16_Vedant.htm वेदान्त : जागिये आप देवता हैं !]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{Authority control}}&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:दर्शन]][[श्रेणी:सिद्धान्त]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:द्वैतवाद|*]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>imported&gt;संजीव कुमार</name></author>
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