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	<title>पूर्णसिंह - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>2409:4042:2E99:51D5:6CBF:E5BC:E462:5656: विभाग यह ट्यपींग एरर था. विवाह यह सही शब्द है ।</title>
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		<updated>2020-10-09T16:03:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;विभाग यह ट्यपींग एरर था. विवाह यह सही शब्द है ।&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Professor Puran Singh.jpg|right|thumb|300px|सरदार पूर्ण सिंह|कड़ी=Special:FilePath/Professor_Puran_Singh.jpg]]&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;पूर्णसिंह&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ([[पंजाबी]] : Punjabi: [[सरदार पूर्णसिंह]]; १८८१ - १९३१ ई.) [[भारत]] के देशभक्त, शिक्षाविद, अध्यापक, वैज्ञानिक एवं लेखक थे। वे [[पंजाबी]] कवि थे और आधुनिक पंजाबी [[काव्य]] के संस्थापकों में उनकी गणना होती है।  द्विवेदी युग के श्रेष्ठ निबंधकार सरदार पूर्ण सिंह का जन्म सीमा प्रांत जो अब पाकिस्तान में है के  एबटाबाद इटावा जिले  सलहद  गांव में 17 फरवरी सन् 1881  ईसवी  में हुआ था उनके पिता का नाम सरदार करतार सिंह भागर था उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे पूर्ण सिंह अपने माता पिता के जेष्ठ पुत्र थे उनकी पत्नी का नाम है  मायादेवी था हाईस्कूल की शिक्षा  उतीण्  करने के पश्चात लाहौर चले गए लाहौर के एक कॉलेज में इन्होंने एफ ए की परीक्षा की उतरीण की इसके बाद विशेष छात्रवृत्ति प्राप्त कर सन्1900 ईसवी  में रसायन शास्त्र के विशेष अध्ययन के लिए जापान गए और   वहां इंपीरियल यूनिवर्सिटी में अध्ययन करने लगे  जब जापान में होने वाले विश्व धर्म सभा में भाग लेने के लिए स्वामी रामतीर्थ वहां पहुंचे तो  उन्होंने वहां अध्ययन करें भारतीय विद्यार्थी से भी भेंट की इसी क्रम में सरदार पूर्ण  सिंह से स्वामी रामतीर्थ की  भेंट हुई स्वामी रामतीर्थ से प्रभावित होकर इन्होंने वही  सन्यास ले लिया और स्वामी जी के साथ बाद भारत लौट आएं स्वामी जी की मृत्यु के बाद उनके विचारों में परिवर्तन हुआ और इन्होंने विवाह करके गृहस्थ जीवन व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया इनको देहरादून के एक बहुत अच्छी यूनिवर्सिटी में अध्यापक पद पर सात सौ रुपए महीने की तनख्वाह मिलने लगी यहीं से इनके नाम के आगे अध्यापक सब जुड़ गया यह स्वतंत्र प्रवृति के व्यक्ति थे इसलिए नौकरी को निभा नहीं सके और त्याग पत्र दे दिया इसके बाद यह ग्वालियर चले गए वहां उन्होंने सिखों के 10 गुरु और स्वामी रामतीर्थ की जीवनी अंग्रेजी में लिखी ग्वालियर में इनका   लगा मन ना लगा तब यह पंजाब के एक गांव में खेती करने लगे खेती में हानि हुई और अर्थ संकट में पड़ कर नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगे उनका संबंध क्रांतिकारियों से भी  था अपने भारत के लिए इन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए देहली षड्यंत्र के मुकदमे में मास्टर अमीरचंद के साथ उनको भी पूछताछ के लिए बुलाया गया किंतु इन्होंने मास्टर अमीरचंद के साथ अपना किसी प्रकार का संबंध होने से इंकार  कर दिया वास्तव में  मास्टर अमीरचंद स्वामी रामतीर्थ के परम भक्त और गुरु भाई  थे प्राणों की रक्षा के लिए उन्होंने न्यायालय में झूठा बयान दिया इस घटना का उनके  मन पर गहरा प्रभाव पड़ा था और भीतर ही भीतर यह पश्चाताप की अग्नि में जलते रहे इस कारण भी यह अच्छी तरीके से जीवन  नहीं जी सकें  और हिंदी साहित्य की एक बड़ी प्रतिभा पूरी शक्ति से हिंदी की सेवा नहीं कर सकी सन 25 मार्च 1931 इसी में उनकी मृत्यु हो गई सरदारपुर के हिंदी में कुछ है निबंध उपलब्ध है 1  सच्ची वीरता 2 आचरण की सभ्यता 3मजदूरी और प्रेम 4 अमेरिका का मस्त योगी वाँलट हिटमैन 5 कन्यादान 6 पवित्रता इन्हीं  निबंध के बल पर इन्होंने हिंदी गध साहित्य के क्षेत्र में अपना स्थाई स्थान बना लिया है इन्होंने निबंध रचना के लिए मुख्य रूप से नैतिक विषय को ही चुना सरदार पूर्णसिंह के निबंध विचारात्मक होते हुए भावात्मक कोटि में आते हैं सरदार पूर्ण सिंह सिंह की भाषा शुद्ध खड़ी बोली है किंतु उसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ साथ फारसी अंग्रेजी के शब्द में प्रयुक्त है उन की निबंध शैली के अनेक दृश्य से निजी शैली है उनके विचार  भावुकता की लपेट में लिपटे हुए होते हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जीवन परिचय ==&lt;br /&gt;
पूर्णसिंह पश्चिम सीमाप्रांत (अब [[पाकिस्तान]] में) के हजारा जिले के मुख्य नगर [[ऐब्टाबाद|एबटाबाद]] के समीप सलहद ग्राम में १७ फ़रवरी १८८१ को आपका जन्म हुआ। पिता सरदार करतार सिंह भागर सरकारी कर्मचारी थे। उनके पूर्वपुरुष जिला [[रावलपिंडी]] की कहूटा तहसील के ग्राम डेरा खालसा में रहते थे। रावलपिंडी जिले का यह भाग &amp;quot;पोठोहार&amp;#039; कहलाता है और अपने प्राकृतिक सौंदर्यं के लिये आज भी प्रसिद्ध है। पूर्णसिंह अपने माता पिता के ज्येष्ठ पुत्र थे। कानूनगो होने से पिता को सरकारी कार्य से अपनी तहसील में प्राय: घूमते रहना पड़ता था, अत: बच्चों की देखरेख का कार्य प्राय: माता को ही करना पड़ता था। पूर्णसिंह की प्रारंभिक शिक्षा तहसील हवेलियाँ में हुई। यहाँ मस्जिद के मौलवी से उन्होंने उर्दू पढ़ी और सिख धर्मशाला के भाई बेलासिंह से गुरुमुखी। रावलपिंडी के मिशन हाई स्कूल से १८९७ में एंट्रेंस परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन्‌ १८९९ में डी. ए. वी. कालेज, लाहौर, २८ सिंतबर, १९०० को वे [[टोक्यो विश्वविद्यालय|तोकियो विश्वविद्यालय]] ([[जापान]]) के फैकल्टी ऑव मेडिसिन में औषधि निर्माण संबंधी रसायन (Pharmaceutical chemistry) का अध्ययन करने के लिये &amp;quot;विशेष छात्र&amp;#039; के रूप में प्रविष्ट हो गए और वहाँ उन्होंने पूरे तीन वर्ष तक अध्ययन किया। १९०१ ई में तोकियो के &amp;quot;ओरिएंटल क्लब में भारत की स्वतंत्रता के लिये सहानुभूति प्राप्त करने के उद्देश्य से कई उग्र भाषण दिए तथा कुछ जापानी मित्रों के सहयोग से भारत-जापानी-क्लब की स्थापना की। तोकियो में वे स्वामी जी के विचारों से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनका शिष्य बनकर उन्होंने सन्यास धारण कर लिया। तोकियो के आवासकाल में लगभग डेढ़ वर्ष तक उन्होंने एक मासिक पत्रिका &amp;#039;थंडरिंग डॉन&amp;#039; (Thundering Dawn) का संपादन किया। सितंबर, १९०३ में भारत लौटने पर [[कोलकाता|कलकत्ते]] में उस समय के ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उत्तेजनात्मक भाषण देने के अपराध में वे बंदी बना लिए गए किंतु बाद में मुक्त कर दिए गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एबटाबाद में कुछ समय बिताने के बाद वे [[लाहौर]] चले गए। यहाँ उन्होंने विशेष प्रकार के तेलों का उत्पादन आरंभ किया, किंतु साझा निभ नहीं सका। तब वे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मायादेवी के साथ [[मसूरी]] चले गए और वहाँ से [[स्वामी रामतीर्थ]] से मिलने [[नई टिहरी|टिहरी]] [[गढ़वाल]] में वशिष्ठ आश्रम गए। वहाँ से लाहौर लौटने पर अगस्त, १९०४ ई. में [[विक्टोरिया डायमंड जुबली हिंदू टेक्नीकल इंस्टीट्यूट]] के प्रिंसिपल बन गए और &amp;quot;थंडरिंग डॉन&amp;quot; पुन: निकालने लगे। १९०५ में [[काँगड़ा|कांगड़ा]] के भूकंपपीड़ितों के लिये धन संग्रह किया और इसी प्रसंग में प्रसिद्ध देशभक्त [[लाला हरदयाल]] और [[डॉक्टर खुदादाद]] से मित्रता हुई जो उत्तरोत्तर घनिष्ठता में परिवर्तित होती गई तथा जीवनपर्यंत स्थायी रही। [[स्वामी रामतीर्थ]] के साथ उनकी अंतिम भेंट जुलाई १९०६ में हुई थी। १९०७ के आरंभ में वे [[देहरादून]] की प्रसिद्ध संस्था वन अनुसंधानशाला (फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट) में रसायन (केमिस्ट्री) के प्रमुख परामर्शदाता नियुक्त किए गए। इस पद पर उन्होंने १९१८ तक कार्य किया। यहाँ से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात, [[पटियाला]], [[ग्वालियर]], [[सरैया]] ([[पंजाब (भारत)|पंजाब]]) आदि स्थानों पर थोड़े थोड़े समय तक कार्य करते रहे। उन्होंने जिला शेखूपुरा (अब पश्चिमी पाकिस्तान) की तहसील [[ननकाना साहिब|ननकाना साहब]] के पास कृषि कार्य शुरू किया और १९२६ से १९३० तक वे वहीं रहे। नवंबर, १९३० में वे बीमार पड़े। रोग नेे असाध्य [[यक्ष्मा|तपेदिक]] का रूप धारण कर लिया और मार्च ३१, १९३१ को [[देहरादून]] में उनका शरीरांत हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कृतियाँ ==&lt;br /&gt;
अध्यापक पूर्णसिंह ने अपने प्रारंभिक जीवन में ही [[उर्दू भाषा|उर्दू]], [[पंजाबी]], [[फ़ारसी भाषा|फारसी]], [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]], [[हिन्दी|हिंदी]], [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेजी]] आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उनकी भाषा में सर्वत्र विशेष प्रकार का प्रवाह लक्षित होता है। उनकी सबसे अधिक रचनाएँ अंग्रेजी में हैं। [[देहरादून]] की [[वन अनुसंधानशाला]] (फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट) में कार्यकाल (१९०७-१९१८) के समय में उन्होंने अंग्रेजी में वैज्ञानिक विषयों से संबधित बहुत से शोधपूर्णं लेख लिखे। इस प्रकार के उनके प्रकाशित लेखों की संख्या पचास से ऊपर है। अंग्रेजी में उन्होंने जीवनी, &amp;#039;द स्टोरी ऑव स्वामी राम&amp;#039; (The Story of Swami Rama) १९२४ ; &amp;#039;दि स्केचेज फ्राम सिख हिस्ट्री&amp;#039; (The Sketches from Sikh History, 1908), &amp;#039;ऐट हिज फीट&amp;#039; (At His Feet, १९२२), &amp;#039;शॉर्ट स्टोरीज़&amp;#039; (Short Stories, १९२७), &amp;#039;वीणाप्लेयर्स&amp;#039; (Vinaplayers, १९१९), &amp;#039;सिस्टर्स ऑव दि स्पिनिंग ह्वील&amp;#039; (Sisters of the Spinning wheel, १९२१), &amp;#039;गुरु गोविंदसिंह&amp;#039; (१९१३), &amp;#039;दि लाइफ एंड टीचिंग्स्‌ आव श्री गुरु तेगबहादुर&amp;#039;, (१९०८), &amp;#039;ऑन दि पाथ्स्‌ ऑव लाइफ&amp;#039; (On the Paths of Life, 1927-30) प्रभृति रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। [[उर्दू भाषा|उर्दू]] में उनकी &amp;quot;स्वामी रामतीर्थ महाराज की असली जिंदगी पर तैराना नजर&amp;#039; (१९०६) यह एक ही रचना मिलती है। [[पंजाबी]] में उन्होंने पर्याप्त लिखा है और सुंदर लिखा है। उनके कुछ प्रमुख ग्रंथ हैं : अविचल जोत, खुले मैदान, खुले घुंड, मेरा साईकविदा दिल कविता, चुप प्रीतदा शहंशाह विओपारी, खुले लेख, निबंध (१९२९) आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;[[हिन्दी|हिंदी]]&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; में लिखे पूर्णसिंह के केवल छह निबंध ही मिलते हैं। वे हैं : सच्ची वीरता, कन्यादान, पवित्रता, आचरण की सभ्यता, मजदूरी और प्रेम और अमरीका का मस्ताना योगी वाल्ट व्हिटमैन। ये निबंध [[सरस्वती|सरस्वती]] में प्रकाशित हुए थे और इनके कारण ही सरदार पूर्णसिंह ने हिंदी के निबंधकारों में अपना विशेष स्थान बना लिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20110225022651/http://www.pressnote.in/profile_100136.html हिन्दी निबन्ध को नई दिशा दी थी अध्यापक पूर्ण सिंह ने]&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20140702091823/http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=1146&amp;amp;pageno=1 आचरण की सभ्यता] (पूर्ण सिंह का प्रसिद्ध हिन्दी निबन्ध)&lt;br /&gt;
*[https://web.archive.org/web/20170701182244/http://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%AE%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE_/_%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9 मजदूरी और प्रेम] (पूर्ण सिंह का प्रसिद्ध हिन्दी निबन्ध)&lt;br /&gt;
*[https://sites.google.com/site/kavitahindikavita/sardar-purn-singh-essary-hindi सरदार पूर्ण सिंह रचनाएं /निबन्‍ध]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:लेखक]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दी साहित्यकार]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पंजाबी कवि]]&lt;/div&gt;</summary>
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